अशोक भाटिया
भारतीय राजनीति के समकालीन परिदृश्य में विपक्षी एकजुटता का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा ‘ईन्डिया’ गठबंधन इस समय अपने अस्तित्व के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के विजय रथ को रोकने के साझा संकल्प के साथ शुरू हुआ यह गठबंधन अब विभिन्न राज्यों में आंतरिक कलह, आपसी अविश्वास और नेतृत्व के टकराव की गंभीर बीमारी से ग्रसित दिखाई दे रहा है। पश्चिम बंगाल से लेकर जम्मू-कश्मीर और पंजाब से लेकर दक्षिण के तमिलनाडु तक, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के बीच मची रार केवल सीटों के गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैचारिक वर्चस्व, क्षेत्रीय अस्मिता और दूरगामी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का एक जटिल अंतर्विरोध बन चुकी है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि राष्ट्रीय मंचों पर हाथ मिलाने और एक फ्रेम में मुस्कुराती तस्वीरें खिंचवाने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती, जहाँ हर दल अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने और बढ़ाने के लिए एक-दूसरे के खून का प्यासा नजर आता है।
गठबंधन के इस आंतरिक बिखराव का सबसे मुकम्मल और पुराना उदाहरण पश्चिम बंगाल में देखने को मिलता है। यहाँ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस , कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच का त्रिकोणीय द्वंद्व किसी भी राजनीतिक विश्लेषक के लिए एक पहेली की तरह रहा है। राष्ट्रीय बैठकों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच सौहार्द के दावे चाहे जो भी किए जाएं, बंगाल की धरती पर कदम रखते ही यह सौहार्द एक कड़वे संघर्ष में तब्दील हो जाता है। कांग्रेस ने राज्य में तृणमूल कांग्रेस और वामदलों के साथ अपने पुराने गठबंधन को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है और आगामी उपचुनावों सहित भविष्य की चुनावी राजनीति में अकेले उतरने का आत्मघाती या साहसिक फैसला किया है।
इस रार की जड़ें बहुत गहरी हैं। ममता बनर्जी का राजनीतिक उदय ही कांग्रेस के विरोध की कोख से हुआ था, और वे भली-भांति जानती हैं कि राज्य में कांग्रेस या वामदलों को थोड़ी भी राजनीतिक आक्सीजन देना उनके अपने अभेद्य किले में सेंध लगाने जैसा होगा। दूसरी ओर, बंगाल कांग्रेस की प्रादेशिक इकाई यह मानती रही है कि टीएमसी के सामने घुटने टेकने से राज्य में कांग्रेस का काडर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। यही कारण है कि केंद्रीय नेतृत्व की मजबूरियों को दरकिनार कर राज्य स्तर पर दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ न केवल उम्मीदवार उतार रहे हैं, बल्कि तीखे राजनीतिक हमले भी कर रहे हैं। जब गठबंधन के दो प्रमुख घटक एक-दूसरे को ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानकर लड़ रहे हों, तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर एक एकजुट विकल्प मानना जनता के साथ एक बड़ा छलावा प्रतीत होता है।
इसी तरह की एक नई और वैचारिक रार उत्तर भारत के मुहाने पर स्थित जम्मू-कश्मीर में देखने को मिल रही है। यहाँ विधानसभा चुनावों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने मिलकर सरकार तो बना ली, लेकिन यह सत्ता की साझेदारी एक सहज गठबंधन की तरह काम नहीं कर पा रही है। हाल ही में एक सार्वजनिक और आधिकारिक कार्यक्रम के दौरान वंदे मातरम बजाने पर कांग्रेस नेताओं द्वारा जताई गई आपत्ति ने दोनों दलों के बीच के वैचारिक फासले को चौड़ा कर दिया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के शीर्ष नेतृत्व ने इस पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए स्पष्ट रूप से संदेश दिया कि कांग्रेस को अपने सहयोगियों पर अपनी नीतियां और शर्तें थोपने का कोई अधिकार नहीं है।
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नेशनल कॉन्फ्रेंस खुद को कश्मीर घाटी की पहचान और स्वायत्तता के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में देखती है, जबकि कांग्रेस को जम्मू क्षेत्र में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए राष्ट्रवाद के मोर्चे पर रक्षात्मक रुख छोड़ना पड़ता है। सत्ता में होने के बावजूद दोनों दलों के बीच यह वैचारिक खींचतान यह बताती है कि एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम के अभाव में केवल सत्ता का लालच किसी गठबंधन को वैचारिक मजबूती नहीं दे सकता। यह रार आने वाले दिनों में प्रशासनिक फैसलों और नीतियों के क्रियान्वयन में और अधिक कड़वाहट पैदा कर सकती है।
यदि हम पंजाब की ओर रुख करें, तो यहाँ की कहानी ‘ईन्डिया’ गठबंधन के विरोधाभासों का सबसे अनोखा अध्याय है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय स्तर पर इस गठबंधन के स्तंभ हैं, लेकिन पंजाब में वे एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक दोनों दलों ने राज्य में अलग-अलग चुनाव लड़कर यह साबित किया है कि वे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रख सकते। पंजाब कांग्रेस के नेताओं का स्पष्ट मानना है कि राज्य में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के खिलाफ आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाए बिना वे अपनी प्रादेशिक प्रासंगिकता को बहाल नहीं कर सकते
इस बाहरी रार के साथ-साथ पंजाब कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी ने संकट को और गहरा कर दिया है। पार्टी के भीतर नेताओं की आपसी सिरफुटव्वल और वर्चस्व की लड़ाई इतनी बढ़ गई है कि केंद्रीय आलाकमान को स्थिति को संभालने के लिए अचानक राज्य प्रभारियों और संगठनात्मक ढांचे में फेरबदल करना पड़ा है। जब एक प्रमुख राष्ट्रीय दल अपने ही घर को व्यवस्थित नहीं रख पा रहा हो और अपने सबसे बड़े राष्ट्रीय सहयोगी के खिलाफ राज्य में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हो, तो गठबंधन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। पंजाब की यह रार साबित करती है कि क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक शून्यता को भरने की होड़ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर भारी पड़ रही है।
गठबंधन के भीतर यह दरार केवल उत्तर और पूर्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत में भी इसके भूकंपीय झटके महसूस किए जा रहे हैं। तमिलनाडु का हालिया राजनीतिक घटनाक्रम इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। वर्षों पुराने और बेहद सफल माने जाने वाले द्रमुक -कांग्रेस गठबंधन का टूटना इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस को एक बड़े भाई के रूप में स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। द्रमुक -कांग्रेस ने कांग्रेस पर गठबंधन धर्म न निभाने और राष्ट्रीय राजनीति की आड़ में क्षेत्रीय हितों को नुकसान पहुँचाने का सीधा आरोप लगाया है।
इस बिखराव के बीच कांग्रेस ने राज्य की राजनीति में एक नए खिलाड़ी, सुपरस्टार थलापति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्ट्री कड़गम’ का हाथ थामने का प्रयास किया है, लेकिन यहाँ भी विवाद ने पैर पसार लिए हैं। यह विवाद किसी नीतिगत मुद्दे पर नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर शुरू हुआ है। TVK के उत्साही कार्यकर्ता और नेता जहाँ अपने सुप्रीमो विजय को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने की महात्वाकांक्षा पाले हुए हैं, वहीं कांग्रेस के लिए राहुल गांधी के अलावा किसी अन्य नाम पर विचार करना भी पाप के समान है। कांग्रेस के प्रादेशिक नेताओं ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि देश के प्रधानमंत्री पद का चेहरा केवल राहुल गांधी ही होंगे। यह टकराव दिखाता है कि ‘ईन्डिया’ गठबंधन के भीतर भविष्य की सत्ता को लेकर किस कदर अपरिपक्वता और महत्वाकांक्षाओं का टकराव हावी है।
इन प्रमुख राज्यों के अलावा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर चल रही रार, तथा बिहार और झारखंड में क्रमशः आरजेडी और झामुमो के साथ कांग्रेस के असहज संबंध यह रेखांकित करते हैं कि गठबंधन का संकट सार्वभौमिक है। क्षेत्रीय दलों की नजर में कांग्रेस अब वह राष्ट्रीय वटवृक्ष नहीं रही, जिसके साए में वे अपनी राजनीति चमका सकें। क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस को एक ऐसे ‘कमजोर साझीदार’ के रूप में देखते हैं जो सीटें तो ज्यादा मांगता है, लेकिन उन्हें अपने दम पर जिताने की क्षमता खो चुका है। वहीं, कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस मनोवैज्ञानिक दबाव से उबर नहीं पा रहा है कि वह देश की सबसे पुरानी और एकमात्र अखिल भारतीय विपक्षी पार्टी है, इसलिए नेतृत्व का अधिकार स्वतः उसके पास होना चाहिए।
इस पूरे परिदृश्य का लब्बोलुआब यह है कि ‘ईन्डिया’ गठबंधन एक ऐसी नाव की तरह नजर आ रहा है जिसके मल्लाह अलग-अलग दिशाओं में चप्पू चला रहे हैं। जब तक गठबंधन के तमाम घटक दल अपनी व्यक्तिगत और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को तिलांजलि देकर एक साझा, पारदर्शी और ठोस राष्ट्रीय एजेंडा तैयार नहीं करते, तब तक ‘ईन्डिया’ गठबंधन केवल एक चुनावी अवसरवाद का ढांचा बनकर रह जाएगा। यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने राज्यों में चल रही इस रार को समय रहते संवाद और आपसी समन्वय से नहीं सुलझाया, तो वे सत्ताधारी दल को एक मजबूत विकल्प देने के ऐतिहासिक अवसर को गंवा देंगे। राजनीति केवल गणित नहीं, बल्कि रसायन शास्त्र भी है; जब तक विभिन्न दलों के कार्यकर्ताओं के दिलों का रसायन नहीं मिलेगा, तब तक केवल नेताओं के हाथ मिलाने से मतपेटियों में चमत्कार की उम्मीद करना बेमानी होगा।





