प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
कैंसर के इलाज की हर अगली खुराक के साथ परिवार की एक उम्मीद जुड़ी होती है। ऐसे में जब निर्माता खुदरा विक्रेता को दवा लगभग ₹2,700 (पीटीआर – प्राइस टू रिटेलर) में बेचता है, लेकिन उस पर एमआरपी ₹27,000 छपी होती है, तो यह केवल कीमत बढ़ना नहीं, मजबूरी को दस गुना महंगा करना है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ—जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता—के सामने यही तथ्य आया तो अदालत ने इसे मरीजों के साथ “दिनदहाड़े डकैती” बताया। यह टिप्पणी उस कठोर सच को सामने लाती है, जहां किसी अपने को बचाने के लिए परिवार जमीन बेचता है, गहने गिरवी रखता है और जीवनभर की बचत झोंक देता है, फिर भी दवा की कीमत के आगे असहाय रहता है। दवा का काम जीवन बचाना है, परिवार की जमा-पूंजी खत्म करना नहीं। जीवनरक्षक दवाओं की कीमत ऐसी होनी चाहिए, जहां इलाज की उम्मीद मजबूत हो और आर्थिक विवशता कमजोर।
दवा पर मुनाफा अनुचित नहीं, लेकिन जीवनरक्षक दवा की कीमत मनमानी कैसे स्वीकार्य हो? सवाल है—मुनाफे की सीमा कौन तय करेगा? एनपीपीए (राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण) के तहत अनुसूचित दवाओं के अधिकतम निर्धारित मूल्य की व्यवस्था है, लेकिन बड़ी संख्या में दवाएं गैर-अनुसूचित हैं। याचिका में लगभग 82 प्रतिशत दवाओं के इसी दायरे में होने और शुरुआती कीमत तय करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। यही नियमन की बड़ी कमजोरी है। कीमत तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी न हो, तो एमआरपी अधिकतम खुदरा मूल्य नहीं, मरीज की मजबूरी की अधिकतम कीमत बन सकती है। सवाल सीधा है—जब दवा खुदरा विक्रेता को ₹2,700 (पीटीआर) में मिलती है, तो ₹27,000 की एमआरपी किस आधार पर?
कीमत तब समस्या है, जब नियम हों और निगरानी गायब। दवा मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 ने कीमतों पर नियंत्रण का ढांचा बनाया, लेकिन गैर-अनुसूचित दवाओं की मूल्य-व्यवस्था और निगरानी अब भी सवालों में है। एनपीपीए गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर निगाह रखता है और सामान्य परिस्थितियों में सालाना मूल्यवृद्धि की सीमा 10 प्रतिशत है। फिर भी शुरुआती कीमत और बाजार मूल्य के बीच असामान्य अंतर खत्म नहीं हुआ। सवाल है—जिस व्यवस्था का काम मरीज को कीमत की मनमानी से बचाना है, उसकी निगाह तब क्यों पड़ती है, जब दवा उसकी पहुंच से बाहर हो चुकी होती है? अदालत ने अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया है। सवाल एक विभाग का नहीं, पूरी नियामक व्यवस्था का है—जब मरीज की जेब कट रही थी, तब निगरानी तंत्र कहां था?
मरीज अस्पताल पहुंचता है इलाज के लिए, लेकिन कई बार वहीं उसकी खरीदने की मजबूरी शुरू हो जाती है। आरोप है कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को अपनी इन-हाउस फार्मेसी से दवा लेने के लिए बाध्य करते हैं, जिससे बाहर उपलब्ध सस्ती दवा का विकल्प लगभग खत्म हो जाता है। बीमारी में मरीज के पास न मोलभाव की ताकत होती है, न विकल्प तलाशने का समय। डॉक्टर पर भरोसा, अस्पताल पर निर्भरता और दवा की तत्काल जरूरत—तीनों उसे ऐसा खरीदार बना देते हैं, जिसके पास “नहीं” कहने का विकल्प नहीं बचता। या तो महंगी दवा खरीदिए या इलाज के जोखिम को स्वीकार कीजिए। बाजार इसे बिक्री कह सकता है, लेकिन मरीज के लिए यह मजबूरी है। मजबूरी से कमाया हर अतिरिक्त रुपया केवल व्यापारिक लाभ नहीं, गंभीर नैतिक सवाल है।
मरीज की जेब का बोझ जब सरकारी खजाने तक पहुंचे, तो मामला केवल महंगी दवा का नहीं रहता। अस्पताल ऊंची कीमत पर दवा खरीदता है और सरकारी योजना से प्रतिपूर्ति लेता है। यानी बढ़ी कीमत सार्वजनिक धन पर भी बोझ बनती है। अदालत के सामने आयुष्मान भारत सहित सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में बढ़ी दवा कीमतों पर प्रतिपूर्ति को लेकर चिंता जताई गई, जिसे अदालत ने स्पष्ट धोखाधड़ी और टैक्सपेयर के पैसे का नुकसान बताया। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का उद्देश्य गरीब परिवारों को इलाज के आर्थिक बोझ से बचाना है। कीमतों में पारदर्शिता कमजोर हो, तो राहत का पैसा मरीज तक पहुंचने के बजाय मूल्य-श्रृंखला में कहीं और जा सकता है। यह केवल सरकारी धन का नुकसान नहीं, कल्याणकारी व्यवस्था के भरोसे पर चोट है।
कीमत का अंतर जितना बड़ा, जवाबदेही का सवाल उतना सीधा। दवा निर्माता, वितरक, विक्रेता, अस्पताल और नियामक—हर कड़ी की भूमिका है; किसी एक को दोषी ठहराने से समस्या खत्म नहीं होगी। लेकिन ₹2,700 (पीटीआर) की दवा जब ₹27,000 की एमआरपी तक पहुंचती है, तो इस अंतर का पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। वास्तविक लागत कितनी है, निर्माता का लाभ कितना, वितरक कितना जोड़ता है, अस्पताल कितना बढ़ाता है और मरीज कितना चुकाता है—पूरी मूल्य-श्रृंखला पारदर्शी क्यों नहीं हो सकती? एनपीपीए के पास कीमतों की निगरानी और शिकायत की व्यवस्था है, लेकिन सवाल निगरानी के अस्तित्व का नहीं, उसकी प्रभावशीलता का है—क्या वह असामान्य कीमत को मरीज की मजबूरी बनने से पहले रोक सकती है?
स्वास्थ्य का अधिकार तब बेमानी है, जब इलाज मरीज की पहुंच से बाहर हो। कैंसर से लड़ते परिवार के सामने बीमारी होनी चाहिए, दवा की कीमत नहीं। ₹2,700 (पीटीआर) की दवा ₹27,000 की एमआरपी पर बिकना सिर्फ दस गुना कीमत नहीं, उस व्यवस्था का आईना है जो यह अंतर रोक नहीं पाई। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इसी मौन पर सवाल उठाया है। अब सरकार को मूल्य-नियंत्रण की खामियां दूर, नियामक को सक्रिय और दवा की पूरी मूल्य-श्रृंखला पारदर्शी करनी होगी; अस्पतालों में मरीज की दवा खरीदने की स्वतंत्रता भी सुनिश्चित करनी होगी। अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को है। लेकिन असली सवाल आज का है—जीवन बचाने वाली दवा परिवार को आर्थिक संकट में धकेले, तो जवाबदेह कौन? अदालत का “दिनदहाड़े की डकैती” कहना केवल टिप्पणी नहीं, पूरे स्वास्थ्य तंत्र के सामने खड़ा सवाल है।





