सौरभ वार्ष्णेय
शेयर बाजार को अक्सर अर्थव्यवस्था की सेहत का आईना कहा जाता है। लेकिन बाजार केवल आर्थिक आंकड़ों, कंपनियों के प्रदर्शन और वैश्विक परिस्थितियों से ही प्रभावित नहीं होता। राजनीतिक स्थिरता, चुनावी परिणाम, सरकार की नीतियां, अंतरराष्ट्रीय संबंध और राजनीतिक नेतृत्व के सार्वजनिक बयान भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान शेयर बाजार को लेकर दिए गए राजनीतिक बयानों और चुनाव परिणाम के बाद बाजार में आई तेज गिरावट ने इसी सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया था कि आखिर राजनीति और शेयर बाजार के बीच संबंध की सीमा क्या होनी चाहिए?
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा शेयर बाजार की संभावित दिशा को लेकर की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कांग्रेस नेता और तत्कालीन लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने गंभीर सवाल उठाए थे। राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी से जांच की मांग की थी। उनका आरोप था कि चुनाव परिणाम से पहले निवेशकों के बीच बाजार में तेजी की उम्मीद पैदा की गई और चुनाव परिणाम के शुरुआती रुझानों के बाद बाजार में अचानक बड़ी गिरावट देखने को मिली।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 19 और 28 मई को दिए गए उन बयानों का हवाला दिया था, जिनमें शेयर बाजार के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की संभावना का उल्लेख किया गया था। इसी तरह उन्होंने अमित शाह के 13 मई के एक साक्षात्कार का भी उल्लेख किया, जिसमें निवेशकों से चार जून से पहले शेयर खरीदने और चुनाव परिणाम के बाद बाजार में तेजी की संभावना से संबंधित टिप्पणी का हवाला दिया गया था।
इसके बाद घटनाक्रम ने राजनीतिक विवाद को और बढ़ा दिया। एक जून को लोकसभा चुनाव के एग्जिट पोल सामने आए। अधिकांश प्रमुख एग्जिट पोल में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले गठबंधन की बड़ी जीत का अनुमान व्यक्त किया गया। इसके अगले कारोबारी दिन, तीन जून को शेयर बाजार में जबरदस्त तेजी दिखाई दी और सेंसेक्स तथा निफ्टी ने रिकॉर्ड स्तर बनाए। बाजार की इस तेजी को व्यापक रूप से एग्जिट पोल से बनी निवेशकों की सकारात्मक धारणा से जोड़ा गया।
लेकिन चार जून को तस्वीर अचानक बदल गई। वास्तविक चुनाव परिणामों के शुरुआती रुझानों में एग्जिट पोल के अनुमानों से अलग राजनीतिक स्थिति उभरने लगी। बाजार में इसका तत्काल असर दिखाई दिया और सेंसेक्स तथा निफ्टी में भारी गिरावट दर्ज हुई। एक ही कारोबारी सत्र में बाजार में पांच प्रतिशत से अधिक की गिरावट ने निवेशकों के बीच चिंता पैदा कर दी। चुनावी अनिश्चितता और सरकार के संभावित स्वरूप को लेकर बदलती अपेक्षाओं को बाजार की प्रतिक्रिया के प्रमुख कारणों में गिना गया।
यहीं से राजनीतिक सवाल भी खड़े हुए। राहुल गांधी ने पूछा कि यदि राजनीतिक नेतृत्व के बयानों से निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है तो ऐसे बयानों की जिम्मेदारी और पारदर्शिता को लेकर स्पष्ट व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए? उन्होंने एग्जिट पोल के आसपास बड़े निवेशकों की गतिविधियों की जांच की मांग भी की। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री द्वारा शेयर बाजार को लेकर दिए गए बयानों, संबंधित मीडिया साक्षात्कारों और बाजार की गतिविधियों के बीच संभावित संबंधों की जांच की आवश्यकता जताई।
हालांकि, इन आरोपों को भाजपा ने खारिज किया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने राहुल गांधी के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा था कि बाजार के कुल बाजार पूंजीकरण में बदलाव को सीधे निवेशकों के वास्तविक नुकसान के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं है। भाजपा की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया है और बाद की बाजार गतिविधियों को केवल चुनाव परिणाम से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि बाजार में गिरावट अपने आप में किसी राजनीतिक या वित्तीय अनियमितता का प्रमाण नहीं होती। शेयर बाजार में कीमतें अपेक्षाओं, जोखिम, मांग-आपूर्ति, वैश्विक बाजारों, विदेशी निवेश, ब्याज दरों, आर्थिक आंकड़ों और राजनीतिक घटनाक्रम सहित अनेक कारकों से प्रभावित होती हैं। चुनाव परिणाम जैसी बड़ी घटना निश्चित रूप से निवेशकों की अपेक्षाओं को बदल सकती है।
लेकिन दूसरी ओर यह प्रश्न भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है कि जब देश के शीर्ष राजनीतिक पदों पर बैठे लोग किसी संवेदनशील वित्तीय बाजार की दिशा को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी करते हैं, तो क्या ऐसी टिप्पणियों के प्रभाव और उनके संदर्भ की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए? इसका उत्तर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि प्रमाण, बाजार के आंकड़ों और नियामकीय जांच से मिलना चाहिए।
विशेष रूप से यह देखा जाना चाहिए कि चुनाव परिणामों के आसपास किन श्रेणियों के निवेशकों ने किस प्रकार के कारोबार किए, बाजार में असामान्य गतिविधि हुई या नहीं, सार्वजनिक बयानों और कारोबार के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित होता है या नहीं और उपलब्ध नियामकीय निगरानी में किसी नियम का उल्लंघन पाया गया या नहीं। यदि कोई अनियमितता नहीं मिलती है तो वह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए, ताकि अनावश्यक संदेह दूर हो सके।
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। शेयर बाजार का कुल बाजार पूंजीकरण घटने का अर्थ यह नहीं होता कि उतनी ही राशि प्रत्येक निवेशक की जेब से निकल गई। बाजार पूंजीकरण बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों के मूल्य के आधार पर बदलता है। इसलिए किसी एक दिन के बाजार पूंजीकरण में बड़ी गिरावट को सीधे वास्तविक निवेशक नुकसान के बराबर मानना आर्थिक रूप से पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता।
फिर भी राजनीतिक नेतृत्व को शेयर बाजार के प्रति अपनी सार्वजनिक जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए। करोड़ों छोटे निवेशक राजनीतिक नेताओं के वक्तव्यों को बाजार संकेत के रूप में देख सकते हैं। ऐसे में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा बाजार की दिशा को लेकर की गई टिप्पणियों में अतिरिक्त सावधानी और तथ्यात्मक आधार आवश्यक है।
लोकतंत्र में विपक्ष का सवाल पूछना उतना ही जरूरी है जितना सरकार का जवाब देना। लेकिन गंभीर आरोपों का अंतिम समाधान राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र और विश्वसनीय तथ्यों से होना चाहिए। यदि किसी मामले में संदेह है तो जांच एजेंसियां और नियामक संस्थाएं उपलब्ध आंकड़ों की जांच करें और निष्कर्ष सार्वजनिक करें।
शेयर बाजार को राजनीति से पूरी तरह अलग करना संभव नहीं है, क्योंकि सरकार की आर्थिक नीतियां, बजट, कर व्यवस्था, विनिवेश, नियमन और अंतरराष्ट्रीय समझौते सीधे कंपनियों और निवेशकों को प्रभावित करते हैं। लेकिन राजनीतिक बयान और बाजार संकेत के बीच एक जिम्मेदार दूरी बनाए रखना लोकतांत्रिक और वित्तीय दोनों दृष्टियों से आवश्यक है।
2024 का चुनावी घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने एक बुनियादी सवाल सामने रखा. क्या राजनीतिक बयान बाजार की दिशा बदल सकते हैं और यदि हां, तो उनकी जवाबदेही कितनी होनी चाहिए? इसका उत्तर किसी दल के आरोप या प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी आंकड़ों, नियामकीय जांच और स्वतंत्र निष्कर्षों से ही मिल सकता है।
निवेशकों के लिए भी यह जरूरी है कि वे केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर निवेश संबंधी निर्णय न लें। बाजार में निवेश आर्थिक आंकड़ों, कंपनी के मूलभूत प्रदर्शन, जोखिम और दीर्घकालिक परिस्थितियों के अध्ययन पर आधारित होना चाहिए। राजनीति बाजार को प्रभावित कर सकती है, लेकिन बाजार की हर गिरावट को राजनीतिक साजिश मान लेना उतना ही अनुचित है जितना राजनीतिक प्रभाव की किसी भी संभावना को बिना जांच के पूरी तरह नकार देना।





