उत्तर प्रदेश की बिसात: ‘इंडिया’ के भीतर समाजवादी पार्टी का ‘समीकरण’ और गहराता संकट

The Uttar Pradesh Chessboard: The Samajwadi Party's 'Equation' within 'INDIA' and the Deepening Crisis

अशोक भाटिया

२०२४ के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के भीतर ‘इंडिया’ गठबंधन ने एक अप्रत्याशित और ऐतिहासिक सफलता दर्ज की थी। राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ भाजपा को राज्य में करारी शिकस्त देकर समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, जबकि कांग्रेस को भी ६ सीटें हासिल हुई थीं। चुनावी अंकगणित के इस चमत्कार ने विपक्षी कुनबे में नया उत्साह भरा था। लेकिन राजनीति का यह शाश्वत नियम है कि चुनावी विजय जितनी जल्दी पिछली असफलताओं को धुंधला करती है, उससे कहीं अधिक तेजी से भविष्य के अंतर्विरोधों को जन्म देती है। वर्तमान समय में, जब राज्य की निगाहें 2027 के आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की ओर मुड़ चुकी हैं, समाजवादी पार्टी के लिए इंडिया गठबंधन के भीतर रणनीतिक, संगठनात्मक और वैचारिक चुनौतियां नए सिरे से सिर उठाने लगी हैं। गठबंधन की इस नाव को उत्तर प्रदेश के जटिल राजनीतिक समंदर में आगे बढ़ाना अखिलेश यादव के लिए फूल नहीं, बल्कि कांटों की सेज साबित हो रहा है।

गठबंधन की राजनीति में सीटों का बंटवारा हमेशा से सबसे संवेदनशील और टकराव पैदा करने वाला बिंदु रहा है। 2024 की चुनावी सफलता के बाद, कांग्रेस पार्टी के हौसले बुलंद हैं और वह उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई ज़मीन को वापस पाने के लिए आतुर है। कांग्रेस ने सार्वजनिक मंचों से यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से कम से कम 150 सीटों पर दावा ठोकना चाहती है। कांग्रेस का तर्क है कि राहुल गांधी की जनसभाओं, भारत जोड़ो यात्राओं और दलित-पिछड़ा वर्ग में उनके बढ़ते आकर्षण के कारण पार्टी का जनाधार बढ़ा है।

इसके विपरीत, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनके रणनीतिकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ मुख्य लड़ाई समाजवादी पार्टी ही लड़ रही है। सपा सूत्रों के अनुसार, पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभा वार आंकड़ों को आधार बना रही है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिन सीटों पर जीत दर्ज की या जहां वह दूसरे नंबर पर रही, उसके आधार पर सपा कांग्रेस को लगभग 53 से 55 सीटें देने का प्रस्ताव रख रही है। अखिलेश यादव ने पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में स्वयं 350 सीटों पर मुस्तैदी से तैयारी करने का निर्देश देकर कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया है। सपा सांसद एसपी सिंह पटेल का यह बयान कि ‘कांग्रेस को 150 सीटें देना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है’, दोनों दलों के बीच जमीनी स्तर पर मौजूद अविश्वास की खाई को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। वाराणसी के शिक्षक और स्नातक खंड विधान परिषद चुनावों में कांग्रेस द्वारा सपा उम्मीदवारों के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतार देना, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि शीर्ष स्तर पर भले ही एकजुटता के दावे किए जा रहे हों, लेकिन धरातल पर दरारें साफ दिखाई दे रही हैं।

कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी सांगठनिक संरचना में बड़ा बदलाव करते हुए एक ब्राह्मण चेहरा (आराधना मिश्रा) को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जबकि इमरान मसूद के रूप में एक प्रभावी मुस्लिम चेहरा और राजेंद्र पाल गौतम के रूप में बड़े दलित चेहरे को कमान सौंपी है। कांग्रेस का यह नया ‘कॉकटेल’ सपा के मूल वोट बैंक—विशेषकर अल्पसंख्यकों और दलितों—को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास है। यदि मुस्लिम और दलित मतदाता समाजवादी पार्टी के बजाय सीधे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पाले में जाने लगे, तो सपा की क्षेत्रीय प्रधानता कमजोर होगी। राहुल गांधी द्वारा युवाओं, बेरोजगारों और वंचितों के मुद्दों को लगातार उठाए जाने से सपा के लिए यह संकट पैदा हो गया है कि वह उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति की ‘अगुआ’ बनी रहे या कांग्रेस के राष्ट्रीय नैरेटिव के पीछे चलने को मजबूर हो।

गठबंधन सरकारों या चुनावी समझौतों का सबसे बड़ा दोष यह होता है कि इसके कारण ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है। जब समाजवादी पार्टी किसी सीट को गठबंधन के तहत कांग्रेस के लिए छोड़ती है, तो उस क्षेत्र में सालों से पसीना बहा रहे सपा के स्थानीय नेता और कार्यकर्ताओं का राजनीतिक भविष्य दांव पर लग जाता है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता दशकों से एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी जंग लड़ते आए हैं। ऐसे में, अचानक उन्हें एक-दूसरे के लिए वोट मांगने के लिए राजी करना बेहद जटिल कार्य है।

यदि कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया कि पार्टी नेतृत्व उनकी अनदेखी कर रहा है, तो सांगठनिक शिथिलता आने का खतरा बढ़ जाता है। २०२४ के चुनाव में ‘संविधान बचाने’ का एक बड़ा भाव था, जिसने दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को एक मंच पर ला दिया था。 लेकिन विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों, विधायक की उपलब्धता और व्यक्तिगत समीकरणों पर लड़े जाते हैं। ऐसे में, क्या सपा का समर्पित कैडर उन सीटों पर पूरी ताकत लगाएगा जो कांग्रेस के कोटे में जाएंगी? यह सवाल अखिलेश यादव को लगातार परेशान कर रहा है।

भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि गठबंधन केवल कागजों पर या नेताओं के हाथ मिलाने से सफल नहीं होते। २०१७ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी ‘यूपी के लड़कों’ (अखिलेश और राहुल) ने हाथ मिलाया था, लेकिन परिणाम बेहद निराशाजनक रहे थे, क्योंकि सपा का वोट बैंक कांग्रेस उम्मीदवारों को तो ट्रांसफर हो गया, लेकिन कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक सपा के पाले में नहीं आ पाया था।२०२७ के चुनाव में भी यह खतरा बरकरार है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी भले ही वर्तमान में हाशिए पर दिखाई दे रही हो, लेकिन मायावती का साइलेंट दलित वोट बैंक अभी भी किसी भी बड़े उलटफेर की क्षमता रखता है। यदि दलित और अति-पिछड़े मतदाताओं को लगा कि सपा-कांग्रेस गठबंधन में उनकी उचित हिस्सेदारी नहीं है, तो वे भाजपा या पुनः बसपा की ओर रुख कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम जैसे दल भी मुस्लिम बहुल सीटों पर सपा के समीकरण को बिगाड़ने की ताक में रहते हैं। हालांकि अखिलेश यादव ने एआईएमआईएम के साथ किसी भी गठबंधन से साफ इनकार कर दिया है, लेकिन त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबलों में वोटों का मामूली बिखराव भी सीधे तौर पर भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है।

गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी मूलतः एक क्षेत्रीय दल है जिसका संपूर्ण अस्तित्व उत्तर प्रदेश की सत्ता और राजनीति पर निर्भर है। दूसरी ओर, कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है जिसका मुख्य लक्ष्य २०२९ के आम चुनाव में केंद्र की सत्ता हासिल करना है। इन दोनों प्राथमिकताओं में एक बुनियादी विरोधाभास है। कांग्रेस चाहती है कि क्षेत्रीय दल उसे राष्ट्रीय स्तर पर नेता स्वीकार करें और राज्यों में उसे अधिक राजनीतिक स्पेस दें। लेकिन सपा जैसी मजबूत क्षेत्रीय पार्टियां जानती हैं कि एक बार अगर उन्होंने कांग्रेस को अपने घर में पैर जमाने की खुली छूट दे दी, तो उनका अपना अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

बिहार में राजद, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की चिंताएं एक जैसी हैं। अखिलेश यादव के सामने चुनौती यह है कि वे ‘इंडिया’ गठबंधन के वफादार साथी भी बने रहें ताकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-विरोधी धर्मनिरपेक्ष छवि बरकरार रहे, और साथ ही उत्तर प्रदेश के भीतर कांग्रेस को इस हद तक हावी न होने दें कि सपा का अपना आधार सिकुड़ जाए।

समाजवादी पार्टी के लिए इंडिया गठबंधन एक दोधारी तलवार की तरह है। यह भाजपा विरोधी मतों के ध्रुवीकरण को रोकने और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक मंच पर लाने का सबसे सशक्त माध्यम है। लेकिन इसके भीतर पनप रही सीटों की महत्वाकांक्षा, सांगठनिक अंतर्विरोध और नेतृत्व का आंतरिक संघर्ष सपा की राह को बेहद कठिन बना रहा है।अखिलेश यादव ने यह स्पष्ट घोषणा की है कि “जो गठबंधन पहले था, वही गठबंधन आगे रहेगा” और वे इंडिया गठबंधन को ही आगे बढ़ाएंगे। लेकिन इस संकल्प को हकीकत में बदलने के लिए केवल बयानों की नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बड़े राजनीतिक लचीलेपन, व्यावहारिक सीट-बंटवारे और कार्यकर्ताओं के बीच आपसी समन्वय की आवश्यकता होगी। यदि समय रहते सीट शेयरिंग के विवाद और सांगठनिक मतभेदों को नहीं सुलझाया गया, तो २०२४ की ऐतिहासिक जीत का उत्साह २०२७ के आते-आते केवल एक सुनहरी याद बनकर रह जाएगा। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर समाजवादी पार्टी के लिए असली परीक्षा अब शुरू हुई है।