सिंहासन डोल उठा है

the throne has shaken

तनवीर जाफ़री

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े,मतदाता सूची से कथित तौर पर करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जाने,एस आई आर/स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न को रद्द करने व चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा 2023 का क़ानून रद्द करने आदि के विरोध में गत दस 10 अक्टूबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अभूतपूर्व सुरक्षा,लॉक डाउन, भारी जन आक्रोश और व्यापक गिरफ़्तारियों का माहौल रहा। इस प्रदर्शन को रोकने के लिए प्रशासन ने पूरी दिल्ली को एक क़िले के रूप में तब्दील कर दिया था। दिल्ली पुलिस सहित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लगभग 40 हज़ार जवानों को तैनात किया गया था। 57 मेट्रो स्टेशन पूरी तरह बंद थे। मध्य दिल्ली की ओर आने वाली कई ट्रेनों को रद्द या री-रूट किया गया था। धारा 163 पूर्ववर्ती 144 लागू करके किसी भी प्रकार की सभा या जुलूस पर पूर्ण रोक लगा दी गई थी। जंतर-मंतर जाने वाले सभी रास्तों पर कई स्तरों की भारी बैरिकेडिंग की गई थी। मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया गया और मध्य दिल्ली के प्रमुख स्कूल, कॉलेज तथा बाज़ार बंद रहे। आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने देश भर में व्यापक धरपकड़ की। सी जे पी के प्रमुख नेताओं को दिल्ली में एयर इंडिया के विमान के अंदर से ही हिरासत में ले लिया गया। अनेक प्रमुख नेता व सामाजिक कार्यकर्ता गिरफ़्तार किये गये,कई पत्रकारों को भी जहाँ दिल्ली में गिरफ़्तार किया गया वहीँ महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी को मुंबई पुलिस ने चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने से पहले ही हिरासत में ले लिया और उन्हें मुंबई में प्रदर्शन में शामिल होने के लिये अगस्त क्रांति मैदान जाते समय गिरफ़्तार कर लिया गया। पुलिस ने जंतर-मंतर पर लगभग 2,500 से 3,000 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। प्रदर्शन से पहले ही पुलिस ने संदिग्धों और छात्र कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए रात भर तलाशी अभियान चलाकर 100 से अधिक लोगों को निवारक नजरबंदी में लिया था।

इन बंदिशों के बावजूद युवाओं, छात्रों और नागरिकों का भारी आक्रोश सड़कों पर फूट पड़ा। प्रदर्शनकारियों के कई जत्थों ने इंडिया गेट और संसद मार्ग के पास पुलिस बैरिकेड्स को लांघने की कोशिश की, जिससे माहौल काफ़ी तनावपूर्ण हो गया। जब पुलिस ने मुख्य प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर को पूरी तरह सील कर दिया, तो आक्रोशित जनता और छात्र संगठनों ने रणनीति बदलते हुए सफ़दरजंग फ़्लाई ओवर, दिल्ली हाट, राजघाट और कनॉट प्लेस जैसे अलग-अलग इलाक़ों को ही प्रदर्शन स्थल में परिवर्तित कर दिया। अफ़रातफ़री के इसी वातावरण में कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर के आसपास पुलिस, प्रदर्शनकारियों के पीछे दौड़ती और उन्हें लाठियों के बल पर खदेड़कर बसों में भरती नज़र आई। कड़ी सुरक्षा के बीच प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं, जिसमें कई लोगों के घायल होने की ख़बरें आईं। पुलिस की मौजूदगी में ही सादे लिबास में सत्ता समर्थक भाजपा और आर एस एस के तथाकथित गुंडों का कायरों की तरह एक मासूम बच्ची पर टूटना, प्रदर्शनकारी बच्चियों को मारना,नोचना व उन्हें खींचना पूरे देश को विचलित कर गया। कहाँ तो मोदी सरकार बेटी बचाओ का नारा देती है तो कहाँ सत्ता समर्थक गुंडे देश की बहन बेटियों के साथ इस तरीक़े का घिनौना व शर्मनाक व्यवहार करते हैं ? जिस प्रधानमंत्री के क़ाफ़िले को कभी एम्बुलेंस को रास्ता देते प्रचारित किया गया था आवागमन ठप्प होने के कारण उसी प्रधानमंत्री की नाकों के नीचे अनेक मरीज़ व तीमारदार दवा इलाज से वंचित व परेशान दिखाई दिये। कुछ उपद्रवी तत्वों के हाथों में तलवारें देखे जाने की खबरें आईं, जिससे हिंसक टकराव की स्थिति पैदा हो गई।दिल्ली में हुए इस अभूतपूर्व पारगमन प्रतिबंध और बड़े पैमाने पर हुई गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी विशेषज्ञों और विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

भारत के इन प्रदर्शनों व जन आक्रोश ने पूरे विश्व का ध्यान भी आकर्षित किया है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त ने 10 अक्टूबर को ही दिल्ली में बड़े पैमाने पर हुई गिरफ़्तारियों पर गहरी चिंता व्यक्त की। संयुक्त राष्ट्र ने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का सम्मान करे और “मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए” सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं को तुरंत रिहा करे। इसके जवाब में जेनेवा में भारत के स्थायी मिशन ने संयुक्त राष्ट्र की इस टिप्पणी को “भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप” बताया। भारत ने स्पष्ट किया कि देश का संविधान शांतिपूर्ण सभा की गारंटी देता है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार क़ानून के दायरे में पुलिस के पास है।” वैश्विक मीडिया संस्थानों भी इस आंदोलन को प्रमुख स्थान दिया।अंतरराष्ट्रीय मीडिया का सामान्य निष्कर्ष यह रहा कि दिल्ली में बुनियादी पारगमन सुविधाओं जैसे मेट्रो और रास्ते को बंद करना और शांतिपूर्ण मार्च से पहले ही नेताओं को हवाई जहाज़ व घरों से हिरासत में लेना आदि लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन की श्रेणी में आता है।

परन्तु वास्तविकता तो यही है कि अब आने वाले दिनों में दिल्ली सहित देश के तमाम शहरों के ‘जंतर मंतर’ बनने की संभावना है। इन्हीं मांगों के साथ 12 अक्टूबर को कांग्रेस सहित पूरा विपक्षी इण्डिया गठबंधन और देश के युवा बड़ी संख्या में एक बार फिर सड़कों पर उतरने जा रहे हैं। पूरी संभावना है कि इस बार भी जनता की यह आवाज़ पूरे देश में पहले से कहीं ज़्यादा गूंजेगी। विपक्ष की ओर से चेतावनी दी जा चुकी है कि जितनी पुलिस लानी है जितने गुंडे बुलाने हैं, बुला लीजिए। हम डरने और पीछे हटने वाले नहीं हैं। 12 अक्टूबर सोमवार को ही विपक्ष का मुख्य न्यायाधीश से भी मिलने का कार्यक्रम है। विपक्ष दल मुख्य न्यायाधीश से यह बतायेंगे कि जब दिल्ली की सड़कों पर संविधान को तार-तार किया जा रहा है और लोकतंत्र को कुचला जा रहा है, तब कानून के संरक्षक आंखों पर पट्टी डाल कर नहीं बैठ सकते। संविधान की धज्जियां उड़ेंगी तो विपक्ष चुप नहीं बैठ सकता। जवाबदेही तय करना ही होगी। ऐसा लगता है कि ये लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है। युवा आक्रोश को दबाने की जितनी भी कोशिश सरकार करेगी उतना ही यह आंदोलन और तीव्र हो सकता है। अब तो राम धरी सिंह दिनकर की यह पंक्तियाँ ही धरातल पर साकार होती नज़र आती हैं कि…
“सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो।
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है।