तो क्या अमित शाह के सवालों से बैकफुट पर है कांग्रेस

So is Congress on back foot due to Amit Shah's questions?

मुख्य चुनाव आयुक्त को एसआईआर के बहाने हटाने की मुहिम कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियां लगातार चला रही हैं। खासकर राहुल गांधी काफी आक्रामक तेवर बनाए हुए हैं। वह अपने हर बयान में यह दावा कर रहे हैं कि बीजेपी को जनता नहीं चुनाव आयोग जितवा रहा है। लेकिन जब गृह मंत्री अमित शाह ने बीजेपी की ओर से मोर्चा संभाला और पुराने चुनावों का हवाला देते हुए कांग्रेस से पूछ लिया कि जब कई राज्यों में दशकों से कांग्रेस की सरकारें नहीं बनी है, तो कांग्रेसी नेता परेशान हो गए?आखिर कितनी सच्चाई है अमित शाह के आरोपों में?

विवेक शुक्ला

मुख्य चुनाव आयुक्त को एसआईआर के बहाने हटाने की मुहिम कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियां लगातार चला रही हैं। खासकर राहुल गांधी काफी आक्रामक तेवर बनाए हुए हैं। वह अपने हर बयान में यह दावा कर रहे हैं कि बीजेपी को जनता नहीं चुनाव आयोग जितवा रहा है। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद का दुरुपयोग पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और संघ प्रमुख मोहन भागवत के लिए कर रहे हैं, हालांकि संघ का किसी भी चुनाव से कोई लेना देना नहीं होता, क्योंकि वह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है।

बीजेपी भी राहुल और उनकी पार्टी नेताओं के बयानों और तर्कों का लगातार जवाब दे रही है। लेकिन जब गृह मंत्री अमित शाह ने बीजेपी की ओर से मोर्चा संभाला और पुराने चुनावों का हवाला देते हुए कांग्रेस से पूछ लिया कि जब कई राज्यों में दशकों से कांग्रेस की सरकारें नहीं बनी है, तो मौजूदा एसआईआर और चुनाव आयोग पर उसका ठीकरा फोड़ने का क्या औचित्य है। शाह की बात कांग्रेस के नेताओं को चुभ गईऔर एक सुर से सभी बड़े कांग्रेसी अजब ग़ज़ब तर्क देने लगे।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने अमित शाह से यह आंकड़ा मांग लिया कि कितने घुसपैठियों की पहचान की गई है, उन्हें मतदाता सूची से हटाया गया है, या देश से बाहर निकाला गया है। पवन खेड़ा ने जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल की तैनाती पर सवाल खड़ा कर दिया। के सी वेणुगोपाल ने अमित शाह के बयान पर यह प्रतिक्रिया दी कि गृह मंत्री अभी से ही अगले चुनाव का परिणाम बता रहे हैं, जिससे साबित होता है कि बीजेपी चुनाव को प्रभावित करती है। पर किसी भी कांग्रेस के नेता ने अमित शाह के मूल सवालों का जवाब नहीं दिया। शाह ने सीधे आरोप लगाया कि राहुल गांधी घुसपैठियों को बचाने के लिए एसआईआर को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल गांधी की हुड़दंग नीति की आलोचना करते हुए यह सलाह दी कि विरोध से पहले एक बार आत्मनिरीक्षण कर ले, कि कांग्रेस कब से चुनाव हार रही है। यदि काँग्रेस ईमानदार विश्लेषण करने की हिम्मत करे तो उसे समझ आ जाएगा कि उसकी लगातार पराजय का मूल कारण उसकी नीतियों और कार्यपद्धति में है ना कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में।

कांग्रेस को आम चुनाव में पूर्ण बहुमत मिले 42 साल हो गए। 1984 के आम चुनाव में काँग्रेस को 533 सीटों पर हुए चुनाव में 415 सीटें मिलीं थीं। तब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ समय बाद ही चुनाव हुआ था। उसके बाद से हुए सभी लोकसभा चुनाव में काँग्रेस बहुमत क्या उसके आस पास भी नहीं पहुँच सकी। 1984 के बाद 1991 तक राजीव गांधी के नेतृत्व में कॉंग्रेस ने लोकसभा के दो चुनाव लड़े, तब भी उसे बहुमत प्राप्त नहीं हुआ।

1999 के लोकसभा के चुनाव के आते-आते सोनिया गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व अपने हाथों में लिया और उस साल का चुनाव परिणाम काँग्रेस के लिए सबसे खराब रहा। 545 सीटों पर हुए चुनाव में काँग्रेस को केवल 114 सीटें मिलीं। केंद्र में अटल विहारी वाजपेयी की तब सरकार बनी थी। 2014 में भी सोनिया गांधी ही कॉंग्रेस का नेतृत्व कर रही थी और तब उस चुनाव का परिणाम कॉंग्रेस के लिए शर्मनाक था, लोक सभा में केवल 44 कॉंग्रेसी सांसद सदन में जीत कर आए थे। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी काँग्रेस के सर्वोच्च नेता रहे, तब भी तो काँग्रेस का प्रदर्शन नहीं सुधरा। 2019 में 49 और 2024 के लोकसभा चुनाव में काँग्रेस के 99 उम्मीदवार ही सदन में पहुँच सके। जाहिर है कॉंग्रेस की इस दयनीय स्थिति के लिए एसआईआर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि प्रक्रिया 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद ही शुरू हुई है।

अमित शाह का संदेश साफ था। वह काँग्रेस के नेता को यह बताना चाहते थे कि घमंड और परिवरवाद को भारतीय मतदाता पसंद नहीं कर सकते।

यह सच है कि कभी पूरे देश पर राज करने वाली काँग्रेस दो तिहाई हिस्से से गायब है। कुछ राज्यों में तो सत्ता से काँग्रेस को बाहर हुए कई दशक बीत गए। तमिलनाडु में कॉंग्रेस का मुख्यमंत्री बने 60 साल हो गए। पश्चिम बंगाल में 1970 के बाद फिर कभी काँग्रेस सत्ता में नहीं आई। उत्तरप्रदेश में भी अपने दम पर सरकार बनाए हुए काँग्रेस को लगभग 40 साल होने वाले हैं। गुजरात और उड़ीसा भी काँग्रेस का मुख्यमंत्री बने तीन दशक हो चुके। पूर्वोत्तर के राज्यों, दिल्ली और बिहार- झारखंड में भी काँग्रेस नेतृत्व देने में विफल रही है। कॉंग्रेस अपना ही चेहरा वास्तविकता के आईने में देखने के लिए तैयार नहीं हैं।

इसलिए जब गृह मंत्री अमित शाह ने जब कहा कि दिल्ली में कुछ हजार की भीड़ इकट्ठा करने से चुनाव नहीं जीता जा सकता, तो कॉंग्रेसी आग बबूले हो गए। गांवों, खेतों, कस्बों और दूर-दराज के इलाकों में लोगों तक पहुंचकर जनता की सेवा करने की शाह की सीख भी राहुल गांधी को पसंद नहीं आई। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के उपचुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई, इसका भी मलाल कॉंग्रेस नेतृत्व को नहीं हुआ। किसी ने भी अपने ऊपर हार की जिम्मेदारी नहीं ली। राहुल गांधी ने भी कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन जनता का भरोसा जीतने के बजाए राहुल गांधी झूठ के शोर से सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लगातार बीजेपी की जीत और अपनी हार नजर ही नहीं आ रही हैं। अमित शाह ने स्पष्ट कहा कि कई महीनों से चुनाव आयोग और बीजेपी के खिलाफ बनावटी मुहिम का जनता ने ही जवाब दे दिया है। हाल के दिनों में हुए कई स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने फिर से जनता का आशीर्वाद प्राप्त किया है। गुजरात. राजस्थान और त्रिपुरा में निकाय और ग्राम समिति चुनावों में भाजपा के उम्मीदवार सफल रहे। तो बहुत साफ है कि कांग्रेस को फिलहाल अपनी गिरेबान में कायदे से देखने की जरूरत है।