दशहरा: आत्मविजय का संकल्प, दुर्गुणों के विसर्जन का पर्व

Dussehra: resolution of self-victory, festival of immersion of bad qualities

दशहरा केवल रावण के पुतले जलाने और उत्सव मनाने का पर्व नहीं है बल्कि अपने भीतर छिपे अहंकार, लोभ, क्रोध और अन्याय जैसी बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प है। भगवान श्रीराम की विजय और मां दुर्गा के पराक्रम से प्रेरणा लेने वाला यह पर्व सत्य, धर्म, नारी सम्मान और आत्मपरिवर्तन का संदेश देता है। सच्ची विजय तभी है, जब मनुष्य स्वयं पर विजय पाए।

योगेश कुमार गोयल

भारतीय संस्कृति और अध्यात्म में आश्विन शुक्ल दशमी का दिन विशेष महत्व रखता है। ‘विजयादशमी’ या ‘दशहरा’ के रूप में यह दिन देशभर में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह वह दिन है, जब भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर सत्य और धर्म की विजय स्थापित की थी और जब आदि शक्ति दुर्गा ने महिषासुर जैसे महाबलशाली असुर का संहार कर धरती और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त किया था। यही कारण है कि इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व कहा जाता है। भारतीय परंपरा में इस पर्व का स्वरूप केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय एकता के भाव से भी जुड़ा है। दशहरा शब्द स्वयं अपने भीतर गहन प्रतीकवाद समेटे हुए है। ‘दश’ का अर्थ है दस और ‘हरा’ का अर्थ है हर लेना, नष्ट करना या दूर करना। इस दृष्टि से दशहरा का अर्थ हुआ, मनुष्य के भीतर मौजूद दस प्रमुख अवगुणों जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, आलस्य, असत्य, अन्याय और हिंसा को नष्ट करने का संकल्प लेना। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि रावण केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक चरित्र नहीं था बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अनेक रूपों में वह आज भी विद्यमान है। यदि हम इन अवगुणों को समाप्त करने का प्रयास करें तो यही इस पर्व का वास्तविक संदेश होगा।

विजयादशमी को इतिहास में भी शुभारंभ और विजय के प्रतीक पर्व के रूप में माना जाता रहा है। कई प्राचीन राजाओं और क्षत्रियों ने युद्ध या किसी विशेष अभियान पर निकलने के लिए इसी दिन को चुना क्योंकि यह दिन विजय के लिए प्रस्थान का प्रतीक है। यही कारण है कि इसे क्षत्रियों का त्यौहार भी कहा गया है। भगवान श्रीराम द्वारा समुद्र तट पर शारदीय नवरात्रि की पूजा का प्रारंभ और उसके बाद लंका पर चढ़ाई का ऐतिहासिक प्रसंग भी इसी परंपरा से जुड़ा है। नवरात्र और विजयादशमी का गहरा संबंध है। नवरात्र के नौ दिन शक्ति की उपासना के लिए माने जाते हैं। देवी के नौ रूपों की पूजा के माध्यम से भक्त अपने भीतर शक्ति और साहस का संचार करते हैं और दसवें दिन यानी दशमी को विजय का प्रतीक मानते हैं। नवरात्र के दौरान शक्ति की उपासना का एक व्यापक सामाजिक और दार्शनिक महत्व है। यह समाज में स्त्री शक्ति के प्रति सम्मान और आदर का संदेश है। भारतीय संस्कृति में हर स्त्री को देवी स्वरूपा माना गया है। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, पार्वती, ये सभी स्वरूप उसी शक्ति के विभिन्न रूप हैं, जिन्हें हम पूजते हैं किंतु यदि वास्तविक जीवन में हम नारी को उचित सम्मान न दें, उसे गर्भ में ही मार दें, शिक्षा और अधिकारों से वंचित रखें, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखें तो देवी-पूजन की यह परंपरा खोखली सिद्ध होगी। दशहरे का वास्तविक संदेश तभी साकार होगा, जब हम समाज में प्रत्येक नारी को गरिमा, शिक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान का अधिकार देंगे।

दशहरे का सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरूप भी अत्यंत जीवंत है। उत्तर भारत में इस दिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले बनाए जाते हैं और शाम को उनका दहन किया जाता है। हजारों लोग एकत्रित होकर इस आयोजन को देखते हैं और आतिशबाजी के बीच रावण के पुतले के जलने का दृश्य सामूहिक रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बन जाता है। यह दृश्य न केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है बल्कि सामुदायिक एकता और लोक परंपराओं का भी अद्भुत उदाहरण है। बंगाल और पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन इसी काल में सम्पन्न होता है। दुर्गा प्रतिमाओं की स्थापना, पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और फिर विसर्जन, ये सब इस पर्व के सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम को और समृद्ध करते हैं। यह पर्व भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता का सशक्त प्रतीक है। लोकमान्यताओं और ग्रामीण परंपराओं में तो दशहरे का विशेष स्थान है। कई क्षेत्रों में दशहरे के दिन घरों और खेतों में बोए गए जौ को काटकर ‘ज्वारे’ के रूप में पूजा जाता है। इन्हें स्त्री के गर्भ और उसकी संतान का प्रतीक माना जाता है। बहनें अपने भाइयों के सिर पर ज्वारे रखती हैं और भाई बहनों को उपहार देते हैं। यह परंपरा भाई-बहन के पवित्र संबंध को और अधिक मजबूत करने का संदेश देती है। इस पर्व में पारिवारिक, सामाजिक और भावनात्मक संबंधों की यह गहराई भारतीय जीवन मूल्यों की विशेषता है।

पौराणिक दृष्टि से देखें तो दशहरा केवल रावण-वध तक सीमित नहीं है। महिषासुर मर्दिनी की कथा भी इसी दिन से जुड़ी है। जब महिषासुर के आतंक से देवता और मनुष्य सभी पीड़ित हो उठे थे, तब देवी दुर्गा ने नौ दिनों तक उससे युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। यह घटना शक्ति और साहस के महत्व को उजागर करती है। यह बताती है कि जब बुराई और अन्याय अपने चरम पर पहुंच जाते हैं, तब शक्ति का स्वरूप धारण कर ही उनका अंत किया जा सकता है। महिषासुर वध की कथा स्त्री शक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है, जो हमें सिखाती है कि प्रत्येक व्यक्ति में यह शक्ति निहित है कि वह अन्याय और अत्याचार का सामना कर सके। दशहरे का वास्तविक महत्व आत्मचिंतन और आत्मसुधार में निहित है। यह पर्व केवल रावण के पुतले जलाने का उत्सव नहीं है बल्कि हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हमारे भीतर कौन-कौनसे रावण अब भी जीवित हैं। अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, स्वार्थ, असत्य, ये सब रावण के ही विभिन्न रूप हैं। यदि हम हर दशहरे पर यह संकल्प लें कि कम से कम अपनी एक बुराई को समाप्त करेंगे तो धीरे-धीरे हम अपने भीतर के रावण का अंत कर पाएंगे। यही इस पर्व की सच्ची साधना और सार्थकता है।
आज के समय में जब समाज में हिंसा, असमानता, भ्रष्टाचार, शोषण और अन्याय जैसी समस्याएं व्याप्त हैं, तब दशहरे का महत्व और बढ़ जाता है। यह पर्व हमें प्रेरित करता है कि हम सामूहिक रूप से भी इन बुराईयों के विरुद्ध खड़े हों। जिस प्रकार भगवान राम ने रावण का अंत कर धर्म और सत्य की स्थापना की, उसी प्रकार हमें भी अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करना होगा। जिस प्रकार माता दुर्गा ने महिषासुर का वध किया, उसी प्रकार समाज की स्त्रियों को भी अपने अधिकारों और गरिमा की रक्षा के लिए सशक्त और आत्मनिर्भर बनना होगा। दशहरा राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक अखंडता का प्रतीक है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में यह पर्व हमें जोड़ता है। चाहे उत्तर में रामलीला और रावण-दहन की परंपरा हो या पूर्व में दुर्गा पूजा, पश्चिम में शस्त्र-पूजन हो या दक्षिण में देवी विजयादशमी उत्सव, सबका उद्देश्य एक ही है, बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देना। यह पर्व हमें अहसास कराता है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर कितनी समृद्ध है और हमारी परंपराएं किस प्रकार हमें एक सूत्र में बांधती हैं।

दशहरे का सबसे बड़ा संदेश यही है कि धर्म, सत्य, न्याय और करुणा की विजय निश्चित है। चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न लगे, अंततः अच्छाई ही विजयी होती है। यह पर्व हमें केवल उत्सव का आनंद लेने के लिए नहीं बल्कि अपने जीवन को संवारने और समाज को बेहतर बनाने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। यदि हम दशहरे को केवल बाहरी रूप में मनाने के बजाय उसके आंतरिक और दार्शनिक अर्थों को समझें और अपनाएं तो यह पर्व हमारे जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकता है। दशहरा भारतीय संस्कृति का वह अमूल्य पर्व है, जो हमें आत्मबल, संयम, शक्ति, साहस और मानवता का संदेश देता है। यह धर्म और सत्य की उस परंपरा का प्रतीक है, जो युगों-युगों से हमारी संस्कृति की आधारशिला रही है। सही मायनों में विजयादशमी का उत्सव तभी सार्थक है, जब हम अपने भीतर के रावण का वध कर सकें और अपने जीवन में अच्छाई, सत्य और प्रेम को स्थान दे सकें। यही इस पर्व का वास्तविक और शाश्वत संदेश है, जो इसे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय एकता का पर्व बनाता है।