त्योहारी लिक्विडिटी बनाम राजकोषीय असंतुलन

ELGI's AB Series gives new direction to industrial technology

अशोक भाटिया

केन्द्र सरकार द्वारा दीवाली और त्योहारों के ठीक मुहाने पर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महंगाई भत्ते और महंगाई राहत में तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी को मंजूरी देना महज एक प्रशासनिक या नियमित वित्तीय निर्णय नहीं है, बल्कि यह सुस्त पड़ती घरेलू मांग को पुनर्जीवित करने और व्यापक आर्थिक संतुलन साधने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा नीतिगत कदम है। इस निर्णय के तहत डीए को मूल वेतन के 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 53 प्रतिशत कर दिया गया है, जो 1 जुलाई 2026 से प्रभावी माना जाएगा। इस फैसले से देश के लगभग 49.18 lakh केंद्रीय कर्मचारियों और 64.89 lakh पेंशनभोगियों की जेब में सीधे तौर पर अतिरिक्त नकदी पहुँचेगी, जो त्योहारी सीजन के दौरान उपभोक्ता वस्तुओं, ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और खुदरा बाजार में मांग को एक नया संवेग देने का काम करेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था के वर्तमान परिदृश्य में, जहां निजी उपभोग में आंशिक सुस्ती और खाद्य मुद्रास्फीति को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं, वहां एक करोड़ से अधिक परिवारों की क्रय शक्ति को सीधे तौर पर बढ़ाना बाजार में तरलता या लिक्विडिटी का प्रवाह तेज करने का एक प्रभावी शॉर्ट-टर्म जरिया साबित हो सकता है। परंतु, अर्थशास्त्र का यह शाश्वत नियम है कि कोई भी वित्तीय प्रोत्साहन मुफ्त में नहीं आता; इस लोक-लुभावन और तात्कालिक राहत देने वाले कदम के पीछे राजकोषीय घाटे का एक भारी-भरकम गणित और राजकोषीय असंतुलन का एक गंभीर अंतर्निहित जोखिम भी छिपा हुआ है जिसे नीति निर्माताओं द्वारा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस निर्णय के आर्थिक निहितार्थों को समझने के लिए सबसे पहले बाजार में इसके माध्यम से होने वाले लिक्विडिटी के तात्कालिक प्रभाव का विश्लेषण करना आवश्यक है। दीवाली, धनतेरस और भाईदूज जैसे बड़े त्योहारों के दौरान भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से बड़े पैमाने पर खरीदारी और निवेश की प्रवृत्ति होती है। पिछले कुछ तिमाहियों से यह देखा जा रहा था कि ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में मध्यम वर्ग बढ़ती रोजमर्रा की महंगाई, विशेषकर खाद्य वस्तुओं के दामों में उछाल के कारण अपने गैर-जरूरी खर्चों में कटौती कर रहा था। केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन और पेंशनभोगियों की आय में इस तीन प्रतिशत की वृद्धि से बाजार में करीब 9,448.35 crore रुपये की अतिरिक्त नकदी सीधे खर्च के रूप में प्रवाहित होने का अनुमान है। जब यह पैसा बाजार में आता है, तो यह केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक आर्थिक गुणक प्रभाव पैदा करता है। कर्मचारी इस अतिरिक्त आय का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, नए वस्त्रों, और त्योहार से जुड़ी सेवाओं पर खर्च करेंगे, जिससे अंततः विनिर्माण क्षेत्र और खुदरा व्यापारियों को भारी राहत मिलेगी। बाजार में वस्तुओं की बिक्री बढ़ने से जीएसटी संग्रह में भी वृद्धि होगी, जो एक तरह से सरकार के कर राजस्व को वापस समृद्ध करने में मदद करेगा। इस दृष्टिकोण से, यह फैसला त्योहारी सीजन में सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए एक आवश्यक और सामयिक ‘बूस्टर डोज’ की तरह दिखाई देता है।

परंतु, इस सिक्के का दूसरा पहलू राजकोषीय स्वास्थ्य और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले दीर्घकालिक दबाव से जुड़ा है, जो व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में सरकार ने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.9 प्रतिशत तक सीमित रखने का एक बेहद महत्वाकांक्षी और अनुशासित लक्ष्य रखा है। ऐसे समय में, जब वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों के कारण देश के निर्यात और राजस्व प्राप्ति पर दबाव बना हुआ है, तब खजाने पर करीब साढ़े नौ हजार करोड़ रुपये का यह अतिरिक्त वार्षिक भार राजकोषीय अनुशासन की राह को कठिन बना सकता है। यह अतिरिक्त खर्च सरकार को विकासोन्मुखी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे कि रेलवे, राजमार्गों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण से अपने संसाधनों को मोड़ने पर मजबूर कर सकता है। अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांत बताते हैं कि जब सरकार राजस्व व्यय (जैसे वेतन, पेंशन और भत्ते) पर अधिक खर्च करती है, तो उसका पूंजीगत व्यय पर सकारात्मक प्रभाव कम हो जाता है, जबकि पूंजीगत व्यय ही वह इंजन है जो दीर्घकाल में रोजगार के नए अवसर पैदा करता है और वास्तविक आर्थिक विकास को गति देता है। इसलिए, तात्कालिक मांग बढ़ाने का यह नुस्खा कहीं राजकोषीय विवेक पर भारी न पड़ जाए, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।

इसके अतिरिक्त, इस तीन प्रतिशत की डीए बढ़ोतरी के पीछे मुद्रास्फीति या महंगाई का एक ऐसा दुष्चक्र भी काम कर रहा है जो इस वित्तीय राहत के वास्तविक प्रभाव को काफी हद तक कम कर देता है। डीए की गणना अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर की जाती है, जिसका सीधा मतलब है कि सरकार यह बढ़ोतरी तभी करती है जब बाजार में महंगाई पहले ही बढ़ चुकी होती है। अर्थात, कर्मचारियों को मिलने वाली यह अतिरिक्त राशि किसी नई समृद्धि का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह केवल उनके जीवन स्तर को महंगाई के थपेड़ों से बचाने और उनकी घटी हुई क्रय शक्ति को पुनः संतुलित करने का एक रक्षात्मक उपाय है। विडंबना यह है कि जब बाजार में एक साथ इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का प्रवाह होता है, तो वह खुद मांग-प्रेरित मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकता है। त्योहारों के मौसम में जब आपूर्ति की तुलना में अचानक मांग बढ़ जाती है, तो व्यापारी और सेवा प्रदाता कीमतें बढ़ा देते हैं, जिससे महंगाई का एक नया दौर शुरू होने का खतरा रहता है। यदि यह नकदी प्रवाह बाजार में कीमतों को और ऊपर ले जाता है, तो इस डीए बढ़ोतरी का वास्तविक लाभ न केवल केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बेअसर हो जाएगा, बल्कि समाज का वह असंगठित क्षेत्र और गरीब वर्ग, जिसे डीए जैसी कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है, इस बढ़ती महंगाई की चक्की में पीसने के लिए मजबूर हो जाएगा।

इस पूरे आर्थिक विमर्श के केंद्र में भारत का वह विशाल असंगठित और निजी क्षेत्र भी है, जो देश के कार्यबल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है और जो इस प्रकार की किसी भी सरकारी मूल्य-सूचकांक आधारित सुरक्षा तंत्र से पूरी तरह वंचित है। केंद्रीय कर्मचारियों को मिलने वाली यह राहत जहां एक तरफ एक छोटे और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की क्रय शक्ति को सुरक्षित रखती है, वहीं दूसरी तरफ यह देश के भीतर एक गहरे आर्थिक विभाजन को भी रेखांकित करती है। निजी क्षेत्र के कर्मचारियों, दैनिक वेतनभोगियों और छोटे उद्यमियों को महंगाई के थपेड़ों को अपने सीमित संसाधनों के दम पर ही झेलना पड़ता है। जब सरकार केवल सरकारी कार्यबल के लिए भत्तों में वृद्धि करती है, तो यह देश की कुल मांग को एक सीमित दायरे में ही प्रभावित कर पाती है, जबकि व्यापक आर्थिक सुधार के लिए समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े असंगठित क्षेत्र की आय में वृद्धि होना अनिवार्य है। इसलिए, नीति निर्माताओं को यह सोचना होगा कि क्या केवल एक विशिष्ट वर्ग को वित्तीय प्रोत्साहन देकर पूरी अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक और टिकाऊ मांग पैदा की जा सकती है, या इसके लिए अधिक व्यापक और समावेशी नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है जो ग्रामीण मजदूरी और कृषि आय को बढ़ाने पर केंद्रित हो।

गौरतलब है कि इस ३% डीए बढ़ोतरी का यह आर्थिक संदेश एक अत्यंत जटिल संतुलन साधने की कला को प्रदर्शित करता है, जहां सरकार को तात्कालिक जन-आकांक्षाओं, त्योहारों की लिक्विडिटी और दीर्घकालिक राजकोषीय विवेक के बीच एक बेहद पतली लकीर पर चलना पड़ रहा है। अल्पकाल में यह निर्णय निश्चित रूप से त्योहारी बाजार में रौनक लाएगा, व्यापारियों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरेगा और उपभोक्ता धारणा को सकारात्मक बनाए रखने में एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाएगा। लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक सेहत के नजरिए से, यह सरकार को अपने राजस्व स्रोतों को बढ़ाने, कर अनुपालन को और अधिक कड़ा करने तथा गैर-उत्पादक खर्चों में कटौती करने की चेतावनी भी देता है ताकि राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पटरी से न उतरे। भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती इस बात में निहित नहीं है कि हम महंगाई के पीछे भागते हुए भत्तों में कितनी वृद्धि करते हैं, बल्कि इसमें है कि हम मुद्रास्फीति की अंतर्निहित वजहों को कितना नियंत्रित रख पाते हैं और पूंजीगत निवेश के जरिए स्थायी रोजगार के कितने अवसर पैदा कर पाते हैं। सरकार ने त्योहारी लिक्विडिटी का जो दांव खेला है, उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले महीनों में यह राजकोषीय असंतुलन को बढ़ाए बिना वास्तविक आर्थिक विकास दर में कितनी तब्दीली ला पाता है।