महेन्द्र तिवारी
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि जनता के विश्वास, राजनीतिक दलों की लोकप्रियता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता की कसौटी भी हैं। जब चुनाव परिणामों को लेकर विवाद होता है, तब मतदान की प्रक्रिया पर भी सवाल उठने लगते हैं। पिछले कुछ समय से इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। विपक्ष के कई नेता बैलेट पेपर से चुनाव कराने की माँग करते रहे हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए बैलेट पेपर से हुए चुनावों ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है। सवाल यह है कि बैलेट पेपर से चुनाव कराने पर आखिर क्या बदला? क्या इससे चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता साबित हुई, क्या राजनीतिक समीकरण बदले या केवल आरोप-प्रत्यारोप का एक नया अवसर मिला?
23 अक्टूबर 2026 को चार राज्यों में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों के लिए मतदान हुआ। इन चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों के स्थान पर मतपत्रों का इस्तेमाल किया गया। मतगणना के दौरान भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों ने कई सीटों पर सफलता प्राप्त की। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी उपस्थिति मजबूत की, जबकि बिहार में जन सुराज पार्टी ने भी विधान परिषद में अपना खाता खोला। कांग्रेस को शुरुआती परिणामों में किसी सीट पर सफलता नहीं मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी स्थिति का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर राजनीतिक टिप्पणी की और सवाल किया कि बैलेट पेपर से हुए चुनावों में पार्टी कितनी सीटें जीत पाई। इस टिप्पणी ने मतदान प्रणाली को लेकर चल रही बहस को फिर चर्चा में ला दिया।
हालाँकि, अंतिम परिणामों ने इस राजनीतिक चर्चा को एक नया मोड़ दिया। महाराष्ट्र के नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से पराजित कर दिया। इस सीट पर मतगणना लंबी चली और दूसरी वरीयता के मतों की गणना के बाद परिणाम सामने आया। नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय होने के साथ-साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह क्षेत्र भी है। ऐसे क्षेत्र में कांग्रेस की जीत ने भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी की। इससे स्पष्ट होता है कि चुनाव के शुरुआती रुझानों और अंतिम परिणामों में अंतर हो सकता है। इसलिए पूरी मतगणना समाप्त होने से पहले किसी दल की जीत या हार का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
इन चुनावों से पहला बदलाव मतदान के तरीके में दिखाई दिया। इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के स्थान पर मतपत्रों का उपयोग किया गया और मतदाताओं ने अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में मतपत्र पर निर्धारित तरीके से वरीयता दर्ज की। लेकिन केवल मतदान का माध्यम बदलने से मतदाताओं की राजनीतिक पसंद नहीं बदल जाती। मतदाता किसी उम्मीदवार को उसकी लोकप्रियता, राजनीतिक विचारधारा, स्थानीय कामकाज, संगठन की सक्रियता और अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद के आधार पर चुनते हैं। इस दृष्टि से बैलेट पेपर से हुए चुनावों ने यह नहीं बताया कि कौन-सी मतदान प्रणाली राजनीतिक दलों को अधिक सीटें दिलाती है। उन्होंने केवल यह दिखाया कि मतपत्रों से मतदान होने पर भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों की क्षमता महत्त्वपूर्ण बने रहते हैं।
दूसरा बदलाव राजनीतिक बहस में दिखाई दिया। विपक्ष लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में बैलेट पेपर से हुए चुनावों के परिणामों को भाजपा ने विपक्ष की दलीलों के जवाब के रूप में प्रस्तुत किया। उसका तर्क रहा कि जब मतपत्रों से चुनाव हुए, तब भी कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। दूसरी ओर, विपक्ष यह कह सकता है कि विधान परिषद के सीमित निर्वाचन क्षेत्रों के परिणामों की तुलना लोकसभा और विधानसभा चुनावों से सीधे नहीं की जा सकती। दोनों पक्षों की दलीलों को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी राजनीतिक दल की हार अपने आप में मतदान प्रणाली में गड़बड़ी या उसकी पूर्ण निष्पक्षता का प्रमाण नहीं होती।
तीसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष विधान परिषद के चुनावों का स्वरूप है। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सामान्य मतदाताओं के बजाय निर्धारित पात्रता वाले मतदाता मतदान करते हैं। इन क्षेत्रों में शिक्षकों, शिक्षाविदों और पंजीकृत स्नातकों की समस्याएँ चुनावी निर्णय को प्रभावित करती हैं। उम्मीदवारों का व्यक्तिगत संपर्क, स्थानीय संगठन, शिक्षा संबंधी मुद्दे और मतदाताओं के बीच उनकी विश्वसनीयता विशेष भूमिका निभाते हैं। इसलिए इन चुनावों को पूरे देश के मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। लोकसभा चुनावों में मतदाताओं का दायरा कहीं अधिक व्यापक होता है और राष्ट्रीय नेतृत्व, महँगाई, रोजगार, कृषि, सुरक्षा तथा शासन जैसे मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि क्या बैलेट पेपर से चुनाव कराने पर चुनावी पारदर्शिता बढ़ जाती है? इसका उत्तर केवल चुनाव परिणाम देखकर नहीं दिया जा सकता। मतपत्रों के माध्यम से मतदान में मतदाता अपनी पसंद कागज पर दर्ज करता है। इससे मतों की भौतिक जाँच की सुविधा मिल सकती है, लेकिन मतपत्रों की छपाई, सुरक्षित परिवहन, भंडारण, मतगणना और अमान्य मतों का निर्धारण जैसी चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। दूसरी ओर, इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों में तकनीकी सुरक्षा, निर्धारित जाँच, सुरक्षित रखरखाव और प्रक्रिया की निगरानी महत्त्वपूर्ण होती है। किसी भी प्रणाली की विश्वसनीयता उसके सुरक्षा उपायों, पारदर्शिता और शिकायतों के निष्पक्ष निवारण पर निर्भर करती है।
यह भी समझना जरूरी है कि मतदान प्रणाली और चुनावी निष्पक्षता एक-दूसरे से जुड़े होने के बावजूद अलग-अलग विषय हैं। निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची की शुद्धता, उम्मीदवारों को समान अवसर, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, मतदाताओं की स्वतंत्रता, चुनाव अधिकारियों की निष्पक्षता और मतगणना की विश्वसनीयता भी आवश्यक हैं। यदि इन पहलुओं में कोई कमी हो, तो केवल बैलेट पेपर अपना आप में हर समस्या का समाधान नहीं बन सकता। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों के इस्तेमाल मात्र से हर चुनाव स्वतः निष्पक्ष सिद्ध नहीं हो जाता। किसी भी आरोप का निर्णय राजनीतिक बयानबाजी के बजाय प्रमाणों और निर्धारित जाँच प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।
कांग्रेस के लिए इन चुनावों का परिणाम संगठनात्मक आत्ममंथन का अवसर है। पार्टी को यह समझना होगा कि केवल मतदान प्रणाली पर सवाल उठाने से मतदाताओं का समर्थन प्राप्त नहीं होता। स्थानीय नेतृत्व, प्रभावी उम्मीदवारों का चयन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनता से नियमित संवाद भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर, भाजपा को भी इन परिणामों को अपनी राजनीतिक श्रेष्ठता का अंतिम प्रमाण मानने से बचना चाहिए। अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में मिली सफलता और असफलता को उनके स्थानीय संदर्भ में ही समझना चाहिए।
अंततः, बैलेट पेपर से चुनाव कराने पर मतदान का माध्यम बदला, लेकिन लोकतंत्र की मूल कसौटियाँ नहीं बदलीं। मतदाता का विश्वास, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, पारदर्शी मतगणना और परिणामों की विश्वसनीयता आज भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं। नागपुर में कांग्रेस की जीत यह भी बताती है कि शुरुआती रुझान अंतिम निर्णय नहीं होते और चुनावी मुकाबले में अंतिम मतगणना तक प्रतीक्षा करनी चाहिए।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि बैलेट पेपर से चुनाव कराने पर किस दल को कितनी सीटें मिलीं, बल्कि यह है कि क्या चुनाव प्रक्रिया पर जनता का विश्वास मजबूत हुआ। लोकतंत्र की सफलता किसी एक दल की जीत या हार से नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था से तय होती है जिसमें प्रत्येक मतदाता का मत सुरक्षित रहे, हर शिकायत की निष्पक्ष जाँच हो और राजनीतिक दल प्रमाणों का सम्मान करते हुए जनता के निर्णय को स्वीकार करें। मतदान का माध्यम चाहे कोई भी हो, लोकतंत्र की वास्तविक जीत तभी होगी जब चुनाव निष्पक्ष हों और जनता का विश्वास कायम रहे।




