एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
वैश्विक स्तरपर भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,जहां चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं,बल्कि जनता की आकांक्षाओं,असंतोष,विश्वास और परिवर्तन की इच्छा को व्यक्त करने का संवैधानिक माध्यम भी हैं।यहां लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में आम मतदाता अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं,जबकि विधान परिषद की कुछ सीटों पर शिक्षक,स्नातक स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि तथा राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य जैसे अलग-अलग वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलता है।राज्यसभा के माध्यमसे राज्यों का प्रतिनिधित्व संसद के उच्च सदन में होता है। इस बहुस्तरीय व्यवस्था का मूल उद्देश्य यही है कि लोकतंत्र में केवल संख्या ही नहीं,बल्कि विभिन्न सामाजिक,शैक्षणिक और संस्थागत अनुभवों की आवाज़ भी सुना जाए।दिनांक 29 अक्टूबर 2026 को शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से आए नतीज़ो का विशेष महत्व इसलिए है कि इनमें मतदाता बनने के लिए निर्धारित पात्रता और पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। ऐसे मतदाताओं से शिक्षा,रोजगार, प्रशासन, सार्वजनिक सेवाओं और विकास संबंधी मुद्दों पर विचार करने की अपेक्षा की जाती है।हालांकि,किसी मतदाता की शैक्षणिक योग्यता अपने आप में उसके राजनीतिक विवेक की गारंटी नहीं होती;लोकतंत्र की असली ताक़त स्वतंत्र निर्णय,जागरूकता और निष्पक्ष मतदान में सटीकता से निहित है।
साथियों बात अगर हम 23 अक्टूबर का मतदान,29 अक्टूबर2026 को आए नतीजों की चर्चा कर इसको समझने की करें तो,23 अक्टूबर 2026 को चार राज्यों उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए मतदान हुआ।इन चुनावों में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र शामिल थे तथा मतदान मतपत्रों के माध्यम से कराया गया।मतगणना कई जगह लंबी चली और 29 अक्टूबर को सामने आए नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में जगह बना ली। मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार,28 सीटों में भाजपा ने 13 सीटें जीतीं,जबकि समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत की और जन सुराज पार्टी ने बिहार में विधान परिषद में अपना खाता खोला।इस चुनाव में एनडीए के कुल 16 सीटें जीतने का आंकड़ा भी राजनीतिक चर्चा में सामने आया है,लेकिन भाजपा और उसके सहयोगियों के परिणामों को अलग- अलग समझना आवश्यक है।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि किस गठबंधन नेकितनी सीटें जीतीं,बल्कि यह भी है कि किन क्षेत्रों में मतदाताओं ने स्थापित राजनीतिक समीकरणों से अलग फैसला सुनाया।
साथियों, मेरे लिए भी यह चुनाव व्यक्तिगत रूप से लोकतांत्रिक सहभागिता का अनुभव रहा,क्योंकि मैंने 23 अक्टूबर 2026 को स्नातक मतदाता निर्वाचन क्षेत्र से अपने मताधिकार का प्रयोग किया।मतदान केंद्र पर अन्य मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी देखकर यह महसूस हुआ कि लोकतंत्र में प्रत्येक मत का अपना महत्व है।शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान करने वाला प्रत्येक नागरिक अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर उम्मीदवार का चयन करता है।इसलिए इन नतीजों को केवल राजनीतिक दलों की जीत-हार के चश्मे से नहीं,बल्कि मतदाता की अपेक्षाओं, स्थानीय समस्याओं, उम्मीदवार की पहुंच और संगठनात्मक सक्रियता के संदर्भ में भी सटिका से देखना चाहिए।
साथियों बात अगर हम कांग्रेस नेत्री का वायरल वीडियो और ‘गढ़ ध्वस्त’ होने का दावा इसको समझने की करें तो 29 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर कांग्रेस की एक नेत्री और प्रवक्ता का वीडियो चर्चा में आया,जिसमें भाजपा की हार को लेकर तीखी राजनीतिक टिप्पणी की गई।वीडियो में कथित तौर पर कहा गया कि बैलेट से चुनाव होने पर भाजपा के गढ़ ढह गए और बड़े नेताओं के क्षेत्रों में पार्टी को झटके लगे। इस बयान को विपक्ष की राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखना उचित होगा, न कि पूरे चुनाव का निष्पक्ष निष्कर्ष मान लेना। चुनाव परिणामों की व्याख्या में विपक्ष अपनी बात रखेगा और सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धियों तथा जीती गई सीटों को सामने रखेगा। लोकतांत्रिक विमर्श में दोनों पक्षों के दावों को वास्तविक परिणामों और निर्वाचन क्षेत्र के आंकड़ों की कसौटी पर परखना आवश्यक है।मतपत्रों से मतदान होना अपने आप में किसी दल की हार या जीत का कारण सिद्ध नहीं करता; मतदान प्रणाली और परिणाम के बीच संबंध स्थापित करने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए।इस चुनाव का वास्तविक संदेश स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के बदलते रुझान, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और राजनीतिक दलों की जमीनी तैयारी में तलाशना अधिक सार्थक होगा।
साथियों बात अगर हम वाराणसी:प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में सपा की सफलता का राजनीतिक अर्थ को समझने की करें तो, वाराणसी का परिणाम इसलिए विशेष चर्चा में है क्योंकि प्रधानमंत्री इसी लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं,इसलिए यहां के विधान परिषद चुनावों को राजनीतिक दल अपने संगठन और स्थानीय जनाधार की स्थिति समझने के अवसर के रूप में देख सकते हैं। समाजवादी पार्टी ने वाराणसी की शिक्षक और स्नातक,दोनों सीटों पर सफलता हासिल की।उत्तर प्रदेश की घोषित सीटों के परिणामों में भाजपा ने छह और सपा ने पांच सीटें जीतीं।यह नतीजा भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर आत्ममंथन का विषय हो सकता है, लेकिन इसे प्रधानमंत्री के प्रति पूरे देश के मतदाताओं के रुख का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।वाराणसी संभाग के राजनीतिक महत्व को समझने के लिए इसके आठ जिलों वाराणसी,जौनपुर,गाजीपुर,बलिया,चंदौली,भदोही, मिर्जापुर और सोनभद्र,की सामाजिक एवं राजनीतिक विविधता पर ध्यान देना होगा।इन जिलों में जातीय समीकरण स्थानीय नेतृत्व, शिक्षकों की समस्याएं,रोजगार शिक्षा व्यवस्था, ग्रामीण विकास और सरकारी सेवाओं से जुड़ी अपेक्षाएं अलग- अलग प्रभाव डाल सकती हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बढ़त मिली थी, लेकिन विधान परिषद के चुनावों में मतदाता समूह सीमित और अलग पात्रता वाला होता है।इसलिए शिक्षक और स्नातक मतदाताओं का फैसला आगामी विधानसभा चुनाव में पूरे क्षेत्र की जनता के मतदान व्यवहार का सीधा प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।फिर भी, दोनों वाराणसी सीटों पर सपा की सफलता भाजपा के स्थानीय संगठन के लिए यह विचार करने का अवसर है कि क्या उम्मीदवारों के चयन, मतदाताओं से संपर्क और पेशेवर वर्गों की समस्याओं पर सटिका से पर्याप्त ध्यान दिया गया था।
साथियों बात अगर हम नागपुर: संघ मुख्यालय मुख्यमंत्री व केंद्रीय परिवहन मंत्री का गृहछेत्र और भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्र में कांग्रेस की जीत को समझने की करें तो, महाराष्ट्र का नागपुर राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है और यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह क्षेत्र भी है।ऐसे क्षेत्र में स्नातक निर्वाचन सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी की जीत ने परिणामों को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया।वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को कुल 3,271 मतों से पराजित किया।उन्हें 67,231 मत मिले,जबकि कोहले को 63,960 मत प्राप्त हुए ऐसी जानकारी मीडिया से प्राप्त हुई।इस मुकाबले की एक विशेषता मतगणना की प्रक्रिया भी रही। प्रथम वरीयता के मतों में भाजपा उम्मीदवार को बढ़त मिली थी,लेकिन आवश्यक मत- कोटा पूरा नहीं होने के कारण अगली वरीयताओं के मतों की गणना की गई और अंतिम परिणाम बदल गया। इससे स्पष्ट होता है कि विधान परिषद के स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में मतपत्रों पर वरीयता क्रम का कितना महत्व हो सकता है।इस जीत को केवल किसी दल के गढ़ में सेंध लगने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी समझना जरूरी है कि स्नातक मतदाताओं के बीच उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान,पूर्व कार्य,स्थानीय संपर्क और स्वतंत्र उम्मीदवारों को मिले मतों का अंतिम परिणाम पर प्रभाव पड़ सकता है।नागपुर में कांग्रेस की सफ़लता भाजपा के लिए संगठनात्मक समीक्षा का विषय अवश्य है,लेकिन इससे संघ के प्रभाव या पूरे महाराष्ट्र की राजनीतिक स्थिति के समाप्त होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
साथियों बात अगर हम पटना: पांच बार के एमएलसी नवल किशोर यादव की हार क़े संदेश को समझने की करें तो, बिहार की राजधानी पटना में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम भी महत्वपूर्ण रहा। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पांच बार विधान परिषद सदस्य रह चुके नवल किशोर यादव को राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार सिंह ने पराजित किया। उपलब्ध परिणाम विवरण के अनुसार,डॉ.संजीव को4,487 मत और नवल किशोर यादव को 3,430 मत मिले, अर्थात जीत का अंतर 1,057 मत रहा, ऐसी जानकारी मीडिया से आई लगातार चुनाव जीतने वाले प्रतिनिधि की हार यह याद दिलातीहै कि राजनीतिक अनुभव और पुराना जनाधार अपने आप में भविष्य की जीत सुनिश्चित नहीं करते। शिक्षक मतदाताओं की अपेक्षाएं,शिक्षा संस्थानों की समस्याएं,सेवा-संबंधी मुद्दे, उम्मीदवार की उपलब्धता और स्थानीय संगठन की सक्रियता परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। बिहार की इन चुनावी सीटों पर एक और उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि चारों मौजूदा शिक्षक एमएलसी अपनी सीटें नहीं बचा सके। इससे संकेत मिलता है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव की प्रवृत्ति केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं थी।पटना के परिणाम को बांकीपुर विधानसभा सीट के घटनाक्रम से जोड़कर भी राजनीतिक चर्चा की जा रही है। हालांकि, अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों, अलग मतदाता समूहों और अलग चुनावी परिस्थितियों के नतीजों को एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।किसी विधानसभा उपचुनाव में हार और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में हार के पीछे अलग- अलग स्थानीय परिस्थितियां हो सकती हैं। भाजपा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उसके स्थानीय प्रतिनिधि और संगठन उन मतदाताओं की अपेक्षाओं को समझ पा रहे हैं, जिनके समर्थन के आधार पर उनका पुराना प्रभाव कायम रहा है।
साथियों,बात अगर हम क्या ये परिणाम2027 के चुनावों का संकेत हैं? इसको समझने की करें तो,इन चुनावों का सबसे व्यापक राजनीतिक अर्थ यह है कि किसी भी दल के लिए स्थापित प्रभाव को स्थायी मान लेना जोखिमपूर्ण हो सकता है। वाराणसी में सपा की सफलता, नागपुर में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी की जीत और पटना में आरजेडी के डॉ. संजीव की सफलता अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में सामने आई हैं। दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगियों ने चार राज्यों की कुल 28 सीटों में 16 पर जीत दर्ज की। इस प्रकार परिणामों में सत्तारूढ़ गठबंधन की उपलब्धि और कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसे मिली चुनौती, दोनों पहलू मौजूद हैं। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले इन परिणामों को राजनीतिक दलों के लिए एक संकेतक के रूप में देखना उपयोगी है, लेकिन इन्हें विधानसभा चुनाव का निर्णायक पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता। विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक मतदाता पूरे विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते। विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों की संख्या, गठबंधन, स्थानीय मुद्दे, जातीय-सामाजिक समीकरण सरकार का प्रदर्शन और व्यापक जनमत जैसे अनेक कारक प्रभाव डालेंगे। इसलिए किसी एक चुनावी परिणाम से पूरे प्रदेश में राजनीतिक परिवर्तन की घोषणा करना जल्दबाजी होगी।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि लोकतंत्र का संदेश, गढ़ से बड़ा मतदाता का विश्वास 23 अक्टूबर को हुए मतदान और 29 अक्टूबर तक स्पष्ट हुए परिणामों ने एक बार फिर लोकतंत्र की उस विशेषता को सामने रखा है जिसमें मतदाता अपने विवेक के अनुसार फैसला करता है। शिक्षक, स्नातक, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि और आम मतदाता, सभी की लोकतांत्रिक भूमिका अलग- अलग है,लेकिन हर वैध मत का सम्मान समान रूप से आवश्यक है।किसी दल की जीत उसके लिए जनता का विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी बढ़ाती है, जबकि हार उसे अपनी नीतियों, उम्मीदवारों और संगठन की समीक्षा करने का अवसर देती है।कांग्रेस नेत्री के वायरल वीडियो की राजनीतिक भाषा अपनी जगह है,लेकिन लोकतंत्र का निष्कर्ष किसी वायरल नारे से नहीं, बल्कि प्रमाणित परिणामों और उनके व्यापक संदर्भ से निकाला जाना चाहिए।भाजपा और एनडीए की 16 सीटों की उपलब्धि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, और न ही वाराणसी, नागपुर तथा पटना जैसे क्षेत्रों में मिले झटकों को बिना विश्लेषण के खारिज किया जा सकता है।अंततः लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक गढ़ स्थायी नहीं होता; उसे बनाए रखने के लिए जनता का विश्वास, जवाबदेही,स्थानीय समस्याओं का समाधान और निरंतर संवाद आवश्यक हैं। लोकतंत्र में सबसे बड़ा संदेश यही है,कुर्सी कितनी मजबूत है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मतदाता का विश्वास कितना मजबूत है।





