राष्ट्रीय एकता दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक गौरव और नशामुक्त भारत के निर्माण का सामूहिक राष्ट्रीय संकल्प है
विनोद सिंह ‘तकियावाला’
भारत का इतिहास केवल राजाओं, साम्राज्यों और सत्ता परिवर्तन की गाथा नहीं है, बल्कि यह त्याग, तपस्या, संघर्ष, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता के निर्माण की अद्भुत यात्रा भी है। इस ऐतिहासिक यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिनका योगदान समय की सीमाओं से परे जाकर राष्ट्र की नियति निर्धारित करता है। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ऐसे ही महान राष्ट्रनायक थे, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बिखराव की आशंकाओं के बीच भारत की एकता और अखंडता को साकार कर इतिहास में अपना अमिट स्थान बनाया। उनकी 151वीं जयंती पर राष्ट्रीय एकता दिवस के आयोजन का वास्तविक उद्देश्य उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करने के साथ यह संकल्प लेना भी है कि जिस अखंड भारत की नींव उन्होंने रखी थी, उसे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और वैचारिक स्तर पर और अधिक सशक्त बनाया जाए।
राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह द्वारा ‘एकता दौड़’ का शुभारंभ और देशवासियों को एकता की शपथ दिलाना इसी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की परंपरा ने उनके ऐतिहासिक योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया है। यह आयोजन केवल औपचारिक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय भावना को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है, जिसने स्वतंत्रता के बाद भारत को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
अखंड भारत के निर्माण में सरदार पटेल का ऐतिहासिक योगदान
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र तो हो गया, लेकिन स्वतंत्रता के साथ ही देश के सामने अनेक गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी थीं। विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक तनाव, विस्थापन और आर्थिक कठिनाइयों के बीच सबसे बड़ी चुनौती देशी रियासतों का भारत में एकीकरण था। उस समय देश में सैकड़ों रियासतें थीं। उनके अलग-अलग राजनीतिक हित और भविष्य को लेकर अनिश्चितता भारत की एकता के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही थीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी आशंकाएँ व्यक्त की जा रही थीं कि विविधताओं से भरा भारत स्वतंत्रता के बाद एकजुट नहीं रह पाएगा।
ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी असाधारण राजनीतिक इच्छाशक्ति, कूटनीतिक कुशलता, दृढ़ निर्णय क्षमता और राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की भावना से असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संभव कर दिखाया। तत्कालीन रियासतों के एकीकरण में उन्होंने वी.पी. मेनन के सहयोग से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संवाद, समझदारी, दूरदर्शिता और आवश्यकतानुसार दृढ़ता का परिचय देते हुए उन्होंने अनेक रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराया। गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि सरदार साहब ने मात्र 1218 दिनों में अखंड भारत की रचना कर वह कार्य कर दिखाया, जिसे अनेक नेता अपने पूरे जीवनकाल में भी नहीं कर पाते।
सरदार पटेल का योगदान केवल राजनीतिक और भौगोलिक एकीकरण तक सीमित नहीं था। उन्होंने भारत की राष्ट्रीय चेतना को एक सूत्र में बाँधने का कार्य भी किया। उनकी दृष्टि में भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से निर्मित भूखंड नहीं, बल्कि एक साझा सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा राष्ट्र था। यही कारण है कि आज भी उनका व्यक्तित्व राष्ट्रीय एकता और अखंडता का प्रभावशाली प्रतीक बना हुआ है।
विविधता में एकता ही भारत की वास्तविक शक्ति
भारत की विशेषता उसकी विविधता है। यहाँ अनेक भाषाएँ, बोलियाँ, धर्म, पंथ, वेशभूषाएँ, खान-पान और सांस्कृतिक परंपराएँ हैं। इसके बावजूद भारत की राष्ट्रीय पहचान एक साझा सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी रही है। अमित शाह ने राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर इसी भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषाई, सांस्कृतिक और पारंपरिक विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है।
आज वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच इस विचार की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। किसी भी राष्ट्र की मजबूती केवल उसकी आर्थिक समृद्धि या सैन्य क्षमता से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसकी सामाजिक एकजुटता, आपसी विश्वास और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में विविधताओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। संवाद, सहिष्णुता, समावेशी सोच और परस्पर सम्मान के माध्यम से ही ऐसा समाज निर्मित हो सकता है, जहाँ अलग-अलग पहचान रखने वाले नागरिक एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए आगे बढ़ें।
राष्ट्रीय एकता का अर्थ किसी भाषा, संस्कृति या परंपरा को दूसरी पर थोपना नहीं, बल्कि सभी को समान सम्मान और अवसर प्रदान करते हुए राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना है। यही भावना भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को विशिष्ट पहचान देती है।
नशामुक्त भारत : विकसित भारत की पहली शर्त
राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर अमित शाह ने नशामुक्त भारत के संकल्प को विकसित भारत की परिकल्पना से जोड़कर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विकसित भारत की कल्पना का पहला चरण नशामुक्त भारत का निर्माण है। सरकार ने 31 दिसंबर 2029 तक देश को नशे से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। उनके अनुसार, नशामुक्त भारत का निर्माण देश के युवाओं और उनके भविष्य के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक होगा।
यह विषय केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और मानव संसाधन की गुणवत्ता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। भारत की सबसे बड़ी पूँजी उसकी युवा शक्ति, प्रतिभा, ऊर्जा और नवाचार की क्षमता है। यदि युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आ जाए तो व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ परिवार, समाज और राष्ट्र की विकास यात्रा भी प्रभावित होती है। नशा व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक क्षमता को कमजोर करने के साथ सामाजिक अपराध, आर्थिक संकट और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याओं को भी जन्म देता है।
इसलिए नशामुक्त भारत का संकल्प केवल सरकारी अभियान बनकर नहीं रहना चाहिए। इसमें परिवार, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जागरूकता, खेल एवं रचनात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहन, नशे की अवैध तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण तथा प्रभावित लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। युवाओं को शिक्षा, कौशल, रोजगार और उद्यमिता के अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी है। नशामुक्त समाज का निर्माण तभी संभव है, जब रोकथाम, जागरूकता, उपचार और पुनर्वास को व्यापक सामाजिक अभियान का स्वरूप दिया जाए।
सोमनाथ से राष्ट्रीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण तक
भारत की राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण आधार उसकी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत है। सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण इसी चेतना का ऐतिहासिक उदाहरण है। विदेशी आक्रमणों और विध्वंस के बावजूद इस मंदिर का पुनर्निर्माण भारतीय समाज की अदम्य इच्छाशक्ति, आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक बना। सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की संकल्पना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
अमित शाह ने कहा कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के माध्यम से देश ने सभ्यता और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का अनुभव किया है। यह प्रसंग बताता है कि राष्ट्र निर्माण केवल प्रशासनिक और आर्थिक विकास से पूरा नहीं होता। इसके लिए अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों, सांस्कृतिक मूल्यों और विरासत के प्रति सम्मान भी आवश्यक है। आधुनिक भारत को अपनी सभ्यतागत चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए आगे बढ़ना होगा।
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी : राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक
सरदार पटेल के विराट व्यक्तित्व और योगदान को वैश्विक पहचान दिलाने में गुजरात के केवड़िया स्थित ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए इस विशाल प्रतिमा की परिकल्पना को आगे बढ़ाया और उसका शिलान्यास किया। आज यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा के रूप में भारत के राष्ट्रीय गौरव और लौह पुरुष के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
अमित शाह ने कहा कि लंबे समय तक सरदार पटेल को उनके योगदान के अनुरूप सम्मान नहीं मिला और उन्हें भुलाने के प्रयास भी किए गए, लेकिन सूर्य के प्रकाश को कोई ढक नहीं सकता। ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का मूल्यांकन राजनीतिक दृष्टिकोण से ऊपर उठकर उनके वास्तविक योगदान के आधार पर होना चाहिए। सरदार पटेल का राष्ट्र के प्रति समर्पण किसी राजनीतिक दल या विचारधारा की सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। वे सम्पूर्ण भारत की साझा राष्ट्रीय विरासत हैं। उनके योगदान का सम्मान करना और नई पीढ़ी को उनके विचारों से परिचित कराना प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।
राष्ट्रीय संकल्प से विकसित भारत की ओर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में धारा 370 का निरसन, नक्सलवाद के विरुद्ध कार्रवाई, एक देश-एक कर प्रणाली तथा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी पहलें देश की विकास यात्रा में महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में सामने आई हैं। विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सहभागी महसूस करे।
राष्ट्रीय एकता दिवस का वास्तविक महत्व इसी व्यापक दृष्टिकोण में निहित है। सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक एकीकरण का जो ऐतिहासिक दायित्व निभाया था, आज की पीढ़ी के सामने सामाजिक एकता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की जिम्मेदारी है। देशभर के पुलिस बलों की परेड के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा का संदेश भी इसी भावना को अभिव्यक्त करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय एकता को केवल एक दिन के आयोजन, शपथ या प्रतीकात्मक दौड़ तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे प्रत्येक नागरिक के व्यवहार और जीवन का हिस्सा बनाया जाए। राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध, संविधान के प्रति सम्मान, सामाजिक सद्भाव, अनुशासन और सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदारी ही मजबूत भारत की आधारशिला हैं।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने दृढ़ संकल्प से बिखरी हुई रियासतों को एक राष्ट्र के सूत्र में बाँधा था। आज उसी राष्ट्र को विकसित, आत्मनिर्भर, नशामुक्त और विश्व के अग्रणी देशों में स्थापित करने का संकल्प हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। उनकी 151वीं जयंती पर सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके आदर्शों को केवल स्मरण न करें, बल्कि उन्हें अपने राष्ट्रीय चरित्र और कार्यसंस्कृति में आत्मसात करें। अखंड भारत की विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए एक सशक्त, समरस और विकसित भारत का निर्माण ही लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रति हमारी वास्तविक कृतज्ञता होगी।




