मुट्ठी भर अमीरों की कीमत चुका रही हैं पूरी दुनिया

The whole world is paying the price of a handful of rich people

ललित गर्ग

दुनिया आज एक ऐसे विरोधाभास के दौर से गुजर रही है, जहां एक ओर विकास, समृद्धि और आधुनिकता के नए कीर्तिमान स्थापित किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गरीबी, भुखमरी, हिंसा, विस्थापन और पर्यावरणीय विनाश की चुनौतियां लगातार विकराल होती जा रही हैं। प्रश्न यह है कि जब दुनिया के पास पर्याप्त संसाधन हैं, विज्ञान और तकनीक ने अभूतपूर्व प्रगति की है, तब भी करोड़ों लोग जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष क्यों कर रहे हैं? अंतरराष्ट्रीय संस्था ऑक्सफैम की रिपोर्ट ‘डिजास्टर डिवाइड’ इसी प्रश्न का एक असहज, किंतु विचारोत्तेजक उत्तर प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट बताती है कि जलवायु संकट केवल प्रकृति की नाराजगी नहीं, बल्कि आर्थिक असमानता, अनियंत्रित उपभोग और संसाधनों पर मुट्ठी भर लोगों के बढ़ते नियंत्रण का परिणाम भी है। दुनिया की लगभग 80 लाख आबादी वाले सबसे धनी 0.1 प्रतिशत वर्ग की जीवनशैली और निवेश से होने वाला कार्बन उत्सर्जन करोड़ों नहीं, अरबों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, यह वर्ग दुनिया के सबसे गरीब 44 प्रतिशत लोगों की तुलना में अधिक कार्बन प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। यह असमानता केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनहीनता का ऐसा दस्तावेज है, जिसमें कुछ लोगों की विलासिता की कीमत पूरी मानवता चुका रही है। निजी विमान, विशाल नौकाएं, अत्यधिक ऊर्जा खपत और प्रदूषणकारी उद्योगों में निवेश आधुनिक अमीरी के प्रतीक बन गए हैं, जबकि दूसरी ओर गरीब आबादी स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही है। सवाल यह नहीं कि किसी व्यक्ति के पास कितनी संपत्ति है, बल्कि यह है कि उसकी संपन्नता का सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्य कौन चुका रहा है।

इस संकट का सबसे भयावह पक्ष यह है कि जलवायु आपदाएं भी अमीर और गरीब के बीच भेदभाव करने लगी हैं। बाढ़ एक ही समय में अमीर की आलीशान कोठी और गरीब की झोपड़ी तक पहुंचती है, लेकिन दोनों के परिणाम अलग होते हैं। अमीर सुरक्षित स्थानों पर चले जाते हैं, बीमा और आधुनिक सुविधाओं से नुकसान की भरपाई कर लेते हैं, जबकि गरीब अपना घर, खेत, पशुधन और आजीविका गंवाकर वर्षों पीछे चला जाता है। ऑक्सफैम के अनुसार, अधिक आर्थिक असमानता वाले देशों में बाढ़ से होने वाली मौतें सात गुना तक अधिक होती हैं। इतना ही नहीं, रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों का उत्सर्जन भविष्य में लगभग 19 लाख अतिरिक्त गर्मी-संबंधी मौतों का कारण बन सकता है। इनमें 78 प्रतिशत मौतें निम्न एवं निम्न-मध्यम आय वाले देशों में होने का अनुमान है। आर्थिक असमानता का यह अंतर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। जब समाज में संसाधनों, अवसरों और अधिकारों का वितरण अन्यायपूर्ण हो जाता है, तब असंतोष जन्म लेता है। बेरोजगारी, महंगाई, खाद्य संकट, जल संकट और विस्थापन सामाजिक तनाव को बढ़ाते हैं। धीरे-धीरे यही तनाव आक्रोश, विद्रोह, अपराध, सामुदायिक संघर्ष और हिंसा का रूप ले सकता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक हिंसा के पीछे केवल अमीरी-गरीबी का अंतर है, लेकिन जब विकास का लाभ सीमित हाथों में सिमटता है और संकट का बोझ बहुसंख्यक आबादी पर पड़ता है, तब सामाजिक शांति की नींव कमजोर होना स्वाभाविक है। विडंबना यह है कि कुछ बड़े निवेशक पहले प्रदूषणकारी उद्योगों से मुनाफा कमाते हैं और फिर उन्हीं आपदाओं से निपटने, सफाई तथा पुनर्निर्माण के कारोबार में लाभ अर्जित करते हैं। ऑक्सफैम का ‘डिस्ट्रॉय एंड रीबिल्ड इंडेक्स’ 217 कंपनियों के माध्यम से इसी दोहरे मुनाफे की पड़ताल करता है। यह सचमुच ऐसी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जहां किसी के लिए आपदा भी अवसर बन जाती है और किसी के लिए जीवनभर का अभिशाप।

भारत के संदर्भ में यह चेतावनी और भी गंभीर है। भारत की विशाल आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि, निर्माण, छोटे व्यवसायों और असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है। किसान अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और तापमान वृद्धि से जूझ रहा है। मजदूर भीषण गर्मी में काम करने को विवश है और महानगरों की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले परिवार जलभराव तथा गर्मी की दोहरी मार झेल रहे हैं। विश्व बैंक के अनुसार, भारत की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी ऐसे जिलों में रहती है जो जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाओं के जोखिम में हैं। वहीं, देश के 57 प्रतिशत जिलों में रहने वाली लगभग 76 प्रतिशत आबादी अत्यधिक गर्मी के उच्च या बहुत उच्च जोखिम का सामना कर रही है। भारत के लिए चुनौती केवल आर्थिक विकास की गति बढ़ाना नहीं, बल्कि विकास को न्यायपूर्ण, समावेशी और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है। विकसित भारत 2047 का स्वप्न तभी सार्थक होगा, जब विकास की चमक अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन तक पहुंचे। यदि एक ओर महानगरों में विलासिता और उपभोग के नए कीर्तिमान बनें और दूसरी ओर गांवों में किसान पानी, बिजली और आजीविका के लिए संघर्ष करता रहे, तो विकास की तस्वीर अधूरी ही रहेगी। विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखने वाले भारत को दुनिया के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत करना होगा कि आर्थिक समृद्धि और प्रकृति के संरक्षण के बीच संतुलन संभव है। इसके लिए कुछ बुनियादी प्राथमिकताएं आवश्यक हैं। संपन्न वर्ग और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की जवाबदेही तय हो, विलासितापूर्ण उपभोग पर उचित कर व्यवस्था बने, स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहन मिले और जल, जंगल तथा जमीन के संरक्षण को विकास की अनिवार्य शर्त बनाया जाए। साथ ही, जलवायु आपदाओं से प्रभावित किसानों, मजदूरों और कमजोर समुदायों के लिए सामाजिक सुरक्षा, बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएं तथा पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था हो। विकास का लाभ केवल पूंजी के स्वामियों तक सीमित न रहे, बल्कि श्रम करने वाले हाथों तक भी पहुंचे।

भारत की सांस्कृतिक चेतना में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘अपरिग्रह’ जैसे जीवन-मूल्य सदियों से प्रतिष्ठित रहे हैं। महात्मा गांधी का ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ केवल व्यक्तिगत आचरण का संदेश नहीं, बल्कि संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व का दर्शन है। जैन दर्शन का अपरिग्रह भी यही सिखाता है कि आवश्यकता से अधिक संग्रह अंततः समाज में असंतुलन पैदा करता है। प्रकृति हमारी संपत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। अंततः ऑक्सफैम की ‘डिजास्टर डिवाइड’ रिपोर्ट दुनिया के सामने एक बुनियादी नैतिक प्रश्न खड़ा करती है-क्या विकास का अर्थ कुछ लोगों की असीमित समृद्धि और बहुसंख्यक मानवता की बढ़ती विवशता है? पृथ्वी किसी एक वर्ग की जागीर नहीं, न ही उसके संसाधनों पर किसी मुट्ठी भर लोगों का एकाधिकार हो सकता है। आज आवश्यकता अमीरी को अपराध मानने की नहीं, बल्कि अमीरी के साथ जवाबदेही जोड़ने की है। याद रखना होगा कि जब समाज में विषमता की खाई बहुत गहरी हो जाती है, तब असंतोष की आग सीमाओं में नहीं बंधती। धरती को बचाना है तो विकास की दिशा बदलनी होगी, समृद्धि को संवेदना से जोड़ना होगा और अर्थव्यवस्था को मानवता के प्रति जवाबदेह बनाना होगा। क्योंकि जिस विकास में प्रकृति सुरक्षित नहीं और मनुष्य सम्मानित नहीं, वह विकास नहीं, विनाश की प्रस्तावना है।