दीपावली केवल त्योहार नहीं, अपनों के मिलन का नाम है: जहाँ अपने हों, वहीं दीपावली है

Diwali is not just a festival, it is the name of meeting with loved ones: Wherever there are loved ones, there is Diwali.

डॉ. विजय गर्ग

दीपावली भारतीय संस्कृति का एक ऐसा त्योहार है, जिसका नाम सुनते ही मन में रोशनी, खुशियाँ, मिठास, प्रेम और अपनत्व की भावना जाग उठती है। सामान्यतः दीपावली को दीप जलाने, घर सजाने, मिठाइयाँ बाँटने और पटाखे चलाने का त्योहार माना जाता है, लेकिन इसकी वास्तविक सुंदरता इन बाहरी परंपराओं से कहीं अधिक है। दीपावली वास्तव में अपने परिवार, रिश्तेदारों, मित्रों और प्रियजनों से मिलने, साथ बैठने और खुशियाँ बाँटने का त्योहार है।

हमारे जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हमारे अपने होते हैं। पैसा, बड़े घर, महँगे कपड़े और शानदार सजावट कुछ समय के लिए खुशी दे सकते हैं, लेकिन मन को वास्तविक सुकून अपनों की उपस्थिति से मिलता है। जब घर में माता-पिता का आशीर्वाद, बच्चों की किलकारियाँ, भाई-बहनों की हँसी और बुजुर्गों के अनुभवों की खुशबू होती है, तो साधारण-सा घर भी स्वर्ग से कम नहीं लगता।

आज की तेज रफ्तार जिंदगी ने मनुष्य को बहुत व्यस्त कर दिया है। नौकरी, व्यवसाय, पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों के कारण परिवार के सदस्यों के पास एक-दूसरे के लिए समय कम रह गया है। कई बार एक ही घर में रहने वाले लोग भी मोबाइल फोन और अपने कामों में इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास आपस में बातचीत करने का समय नहीं होता। ऐसे में दीपावली हमें रुककर अपने रिश्तों की ओर फिर से देखने का अवसर देती है।

यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि रिश्तों को जीवित रखने के लिए समय, स्नेह और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। वर्षों से दूर रह रहे रिश्तेदारों से मिलना, पुराने मित्रों से बातचीत करना, नाराज अपनों को मनाना और बुजुर्गों के पास बैठकर उनका हालचाल पूछना भी दीपावली मनाने का एक सुंदर तरीका है।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हर व्यक्ति की दीपावली एक जैसी नहीं होती। किसी घर में नए कपड़े और मिठाइयाँ आती हैं, जबकि किसी गरीब परिवार के लिए दो समय की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता है। किसी बुजुर्ग की दीपावली बच्चों की प्रतीक्षा में गुजर जाती है और किसी अकेले व्यक्ति के लिए त्योहार का दिन भी सामान्य दिन जैसा होता है। ऐसे लोगों के साथ खुशियाँ बाँटना ही त्योहार की वास्तविक सार्थकता है।

दीपावली हमें यह संदेश भी देती है कि रोशनी केवल घरों में ही नहीं, बल्कि दिलों में भी होनी चाहिए। यदि हमारे मन में ईर्ष्या, नफरत, क्रोध और अहंकार है, तो हजारों दीप जलाने के बावजूद जीवन में अंधकार रह सकता है। इसलिए हमें अपने मन में प्रेम, क्षमा, सहनशीलता और दूसरों के प्रति सम्मान के दीप जलाने चाहिए।

इस अवसर पर हमें बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना चाहिए, बच्चों को पारिवारिक मूल्यों से जोड़ना चाहिए और युवाओं को रिश्तों का महत्व समझाना चाहिए। उपहारों की कीमत से अधिक उनके पीछे छिपा प्रेम मायने रखता है। किसी को दिया गया थोड़ा-सा समय, प्रेम भरा शब्द या मुस्कान भी महँगे उपहारों से अधिक मूल्यवान हो सकती है।

हमें यह भी प्रयास करना चाहिए कि दीपावली पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाई जाए। मिट्टी के दीपक जलाकर, बिजली की अनावश्यक खपत कम करके, पटाखों से परहेज करके और जरूरतमंदों की सहायता करके हम इस त्योहार को और भी अर्थपूर्ण बना सकते हैं।

अंत में, दीपावली का वास्तविक अर्थ महँगी सजावट, बड़ी पार्टियों या दिखावे में नहीं, बल्कि प्रेम, मेल-मिलाप, सम्मान और अपनत्व में छिपा हुआ है। यदि परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर हँसें, बातचीत करें और एक-दूसरे की खुशियों का हिस्सा बनें, तो एक साधारण-सा दीपक भी जीवन को रोशन कर सकता है।

क्योंकि दीपावली की वास्तविक रौनक दीपों की संख्या से नहीं, बल्कि अपनेपन की गर्माहट से मापी जाती है। सच तो यह है कि जहाँ अपने होते हैं, वहीं दीपावली होती है।