नरेंद्र तिवारी
भारत कि सांस्कृतिक विरासत तीज, त्योहारों, उत्सवों से साल भर जगमगाती रहती है। इस जगमग के मध्य महापर्व दीपावली सूर्य के मानिंद दुनियाँ को भारतीय सांस्कृतिक विरासत कि श्रेष्टता से अवगत कराता प्रतीत होता है। दीपावली मुख्य रूप से अंधीयारे से उजियारे, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान कि विजय का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर और राक्षसराज रावण का वध करके अयोध्या लौटे थै, उनके स्वागत मे अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाकर अयोध्या नगरी को रोशन किया था। कार्तिक मास कि अमावस्या को दीपावली का पर्व दुनियाँ भर मे मनाया जाता है। यह उत्सव धनतेरस से प्रारम्भ होकर भाई दूज याने पांच दिवस तक चलता है। दीपावली के पूर्व घर, दुकान, प्रतिष्ठान रंग-रोगन से सजाए जाते है। बाजार रोशनी से जगमगा उठते है। मानसून के उपरांत दीपावली का आगमन सफाई के वैज्ञानिक संदेशो को भी समाहित किये हुए है। बारिश कि समाप्ति और शरद ऋतू के आगमन के समय अत्यधिक नमी के कारण किट पतंगो और बैक्टेरिया और हानिकारक किटों का प्रभाव अधिक रहता है जो सफाई पुताई और दीपक कि रोशनी से निकलने वाली गर्मी से नष्ट होते है। वातावरण शुद्ध होता है।
श्री राम के 14 वर्षीय वनवास के उपरांत अयोध्या लौटने का यह प्रसंग जनमानस को इस बात का संदेश देता है कि जीवन सुख-दुख के समावेश का क्रम है। वनवास वचन है, श्री राम के संघर्ष कि कहानी है। वनवास श्री राम के जीवन का सबसे महत्वपूर्व प्रसंग है जो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाता है। अयोध्या के राजसी वैभव से वँचित राम वनों के दुर्गम रास्तों से गुजरे उनके साथ उनकी पत्नी सीता एवं भाई लक्ष्मण भी थै। वनवास और माता सीता के अपहरण कि कहानी जग प्रसिद्ध है। श्री राम का चरित्र जमीनी वास्तविकताओं से रूबरू कराता है। प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास कि राम से जुडी प्रेरणादायी पंक्तियाँ है-
‘क्या है वनवास राम से पूछो, इसका संत्रास राम से पूछो।
वन मे कैसे सुखी रहा जाए,
इसका अभ्यास राम से पूछो।’
यह पंक्तियाँ श्री राम के जीवन के सघर्ष और धैर्य को दर्शाती है। महलों का सुख छोड़कर चौदह वर्ष जंगल मे भटकने की पीड़ा और उसका गहरा संत्रास क्या होता है। लेकिन कठिन और विषम परिस्थियो से विचलित होने के बजाय, हर हाल मे सुखी रहने की कला भी श्री राम के जीवन मे समाहित है।
श्री राम का जीवन आदर्श, मर्यादा और कोमल मानवीय गुणों से परिपूर्ण है। समानता का संदेश हो या न्याय की स्थापना साधारण मानवीय जीवन के समस्त पहलुओं को स्पर्श करता श्री राम का विराट चरित्र रोशनी के इस महापर्व पर यह संदेश देता है की प्रकाश चंहू और पहुँचे धरा पर अंधेरा कही रह न जाए कविराज गोपालदास नीरज के शब्दों मे –
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
नीरज की कविता पूरी धरती और मानवता के लिए रोशनी की कामना करती है। प्रगति का प्रकाश हर घर फैले, सृजन और नवाचार का उजाला सम्पूर्ण मानवता को रोशन करें। दीपावली पर्व की मूल भावना भी इसी संदेश और विचार से जुडी है। गरीबी, अशिक्षा, अनीति के अंधीयारे से मानवता मुक्त हो, शिक्षा, ज्ञान और नव निर्माण के उजियारे से सारी दुनियाँ प्रकाशित हो। श्री राम का जीवन दर्शन बरसों से दुनियाँ का पथ प्रदर्शन करता आ रहा है। इस दर्शन मे विश्व कल्याण की भावना है, यह दर्शन समानता और न्याय की स्थापना का संदेश देता है।
दुनियाँ के लोग उसी दर्शन, ज्ञान और विचार को ग्रहण करते है जो मानवता के कल्याण का संदेश देते है। रावण रूपी विचार हर दौर मे रहे किंतु उनकी उम्र लम्बी नहीं रही, दुनियाँ पर ताकत, बल और हिंसा से शासन स्थापना की रावणी प्रवृत्तियाँ अब भी अपना रूप दिखाती है। हिंसा और बारूद के बल पर दुनियाँ को अपने इशारे पर चलाने की यह अनीति दुनियाँ को चलाने की नीति कभी नहीं बन पाई।
भारत का विचार दुनियाँ मे श्रेष्ठता का भाव इसलिए ही रखता है की हमने मानवता के कल्याण के विचार को स्थापित किया है। रामराज्य इसी शासन व्यवस्था का नाम है, जहां शिक्षा, ज्ञान और न्याय का उजियारा समान रूप से मानवता का कल्याण करें। दीपावली प्रकाश का पर्व है, प्रकाश की अपनी प्रकृति है, वह रुकता नहीं फ़ैलता है। प्रकाशित करता है। दीपावली की मंगल भावना भी सबके कल्याण की है।





