डॉ. वंदना शर्मा
AI यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का आविष्कार मानव जीवन को आसान बनाने के लिए हुआ था। कहा गया था कि यह इंसान का सहायक बनेगा, उसकी मुश्किलें कम करेगा। पर आज लगता है हम सहायक को ही मालिक बना बैठे हैं, और इसका दुरुपयोग वरदान से बड़ा अभिशाप बनता जा रहा है।
आज सबसे बड़ा संकट है – सच और झूठ में फर्क मिट जाना। AI से बनी फेक न्यूज, डीपफेक वीडियो और एडिटेड तस्वीरें इतनी असली लगती हैं कि आम आदमी तो क्या, पढ़ा-लिखा वर्ग भी धोखा खा जाता है। किसी के भी सम्मान की धज्जियां चंद मिनटों में उड़ाई जा रही हैं। एक अफवाह, एक झूठा वीडियो और किसी का बना-बनाया जीवन तहस-नहस। और यह सब क्यों? सिर्फ TRP के लिए, सिर्फ कुछ लाइक्स और व्यूज के लिए। जब उद्देश्य ही सस्ती लोकप्रियता हो जाए, तो वहां नैतिकता की उम्मीद करना बेईमानी ही है।
इसका सबसे बुरा असर हमारे बच्चों पर पड़ रहा है। जब से स्मार्टफोन हर हाथ में आया है और इंटरनेट मुफ्त जैसा सस्ता हुआ है, तब से हमारे बच्चों के सपने बदल गए हैं। आज का बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या वैज्ञानिक बनने का सपना कम देखता है, उसे यूट्यूबर बनना है, इंस्टाग्राम स्टार बनना है। इसमें बुराई नहीं है, पर जब ज्ञान, मेहनत और संस्कार के बिना रातों-रात प्रसिद्धि चाहिए, तो रास्ता छोटा और अक्सर अश्लील हो जाता है।
आज बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब लाइक्स की दौड़ में वह परोस रहे हैं जो हमारे संस्कारों ने हमें कभी सिखाया ही नहीं। गाली-गलौज, अभद्रता, नग्नता को कंटेंट का नाम दे दिया गया है। इसी कारण समाज में नैतिक पतन साफ दिखाई देता है। परिवार टूट रहे हैं। तलाक, धोखा, अपमान अब अपराध नहीं, एक आम बात लगने लगी है। करने वाले को शर्म तक नहीं आती, क्योंकि उसे तो हजारों लाइक्स मिल रहे हैं।
तो इसका समाधान क्या है? क्या सोशल मीडिया को बैन कर देना समाधान है? शायद नहीं। आग से डर कर चूल्हा जलाना बंद नहीं किया जाता, आग का सही उपयोग सीखा जाता है।
सबसे पहले हमें अपनी शिक्षा और शिक्षक को फिर से सम्मान देना होगा। ऐसी शिक्षा किस काम की जहां डिग्रीधारी अपने ही देश के खिलाफ नारे लगाए, खुलेआम मां-बहन की गालियां दे? पहले कहा जाता था कि अनपढ़ और पढ़े-लिखे में भाषा और संस्कार का फर्क होता है। आज वह फर्क भी मिटता जा रहा है। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो जानकारी के साथ-साथ चरित्र भी बनाए।
दूसरा सबसे बड़ा स्तंभ है – महिला और माँ। राष्ट्र का निर्माण संसद में नहीं, घर की देहरी पर होता है। एक माँ अपने बच्चों को जैसे संस्कार देगी, वैसा ही नागरिक देश को मिलेगा। यह बड़ी जिम्मेदारी है। जब माँ ही अश्लीलता को आधुनिकता समझ कर उसका समर्थन करने लगेगी, तो हम अपने बच्चों को अपराध के रास्ते पर जाने से कैसे रोकेंगे? जब माता-पिता ही संस्कारहीन आचरण करेंगे, तो बच्चे कहाँ से संस्कारी बनेंगे?
इसलिए AI को दोष देने से पहले हमें खुद को देखना होगा। AI एक औजार है, चलाने वाला हाथ हमारा है। हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा कि तकनीक का उपयोग कैसे करना है, उसके पीछे कैसे नहीं भागना है। उन्हें किताबों से, कहानियों से, अपने धर्म और संस्कृति से फिर से जोड़ना होगा।
तकनीक को मानवता पर हावी नहीं होने देना है, बल्कि मानवता के लिए तकनीक का उपयोग करना है। यही सच्ची प्रगति होगी।





