ओ पी उनियाल
देहरादून : उत्तराखण्ड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। हालांकि, अभी चुनाव की तारीख घोषित नहीं हुई है। लेकिन राजनीतिक दल जन मुद्दों की तरफ जनमानस का ध्यान खींचने का अपना-अपना प्रयास करने लगे हैं। किसी भी चुनाव से पहले हर दल अपनी-अपनी खूबियां आमजन तक पहुंचाने की जुगत में जुटने लगता है। राजनीतिक दलों के आपसी आरोप-प्रत्यारोपों की शुरुआत, रुके हुए विकास कार्यों में सक्रियता दिखाने, भित्तरघात करने, जनता को झूठे वायदों का पुलिंदा थमाने और दल-बदलने का खासा अवसर यही तो होता है।
उत्तराखण्ड में दो प्रमुख राष्ट्रीय दल पृथक राज्य बनने के बाद से ऐसा खेला खेलते आ रहे हैं कि तीसरे की क्या मजाल जो यहां धमक पड़े। इन दो दलों ने यहां के जनमानस पर न जाने कौन-सी जादू की छड़ी घुमा रखी है कि वह इनके जाल से बाहर ही नहीं निकल पा रहा है।
‘थोथा चना बाजे घना’ या ‘थोथे गाल बजाना’ वाली कहावत चरितार्थ करने वाले इन दलों की मेहरबानी के चलते राज्य के पर्वतीय भूभाग से वहीं के मूल निवासी धड़ाधड़ पलायन करते जा रहे हैं। गांव खाली होते जा रहे हैं। हर कोई शहरों की तरफ रुख कर रहा है। राज्य बनने के बाद से यह स्थिति ज्यादा देखने को मिलती रही है। सत्ता में जो दल आता है वह पहाड़ के विकास की डुगडुगी बड़े जोर-शोर से बजाता तो है, मगर धरातल पर पर्वतीय क्षेत्र में विकास की स्थिति हमेशा ही डगमगायी नजर आती रही है। न ढांचागत विकास, न सुनियोजित योजना। केन्द्र और राज्य सरकार की अनगिनत योजनाएं चल रही हैं लेकिन विकास पर कभी अफसरशाही हावी तो कभी राजनीति व इनके बीच मध्यस्थता करने वाले हावी। कुल मिलाकर अधूरे विकास का नमूना बनता जा रहा है उत्तराखंड का पर्वतीय भूभाग।
सवाल यह खड़ा होता है कि क्या कभी राजनीतिग्यों ने गहराई से इसका कारण जानना चाहा? यदि कारण जाना तो उसका समाधान क्यों नहीं किया गया?





