कनाडा यूरेनियम डील: भारत की ऊर्जा क्रांति या पर्यावरणीय संकट की शुरुआत?

Canada Uranium Deal: India's Energy Revolution or the Beginning of an Environmental Crisis?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

ऊर्जा के मोर्चे पर भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ भविष्य की दिशा तय हो रही है—एक ऐसा भविष्य जहाँ बिजली की कमी अतीत बन जाए, कारखानों की चिमनियों से उठता धुआँ कम हो और हर घर तक पहुँचने वाली ऊर्जा कोयले की कालिख नहीं बल्कि स्वच्छ स्रोतों से पैदा हो। यह सपना केवल विकास का नहीं, बल्कि जलवायु सुरक्षा का भी है। लेकिन इस उजले भविष्य की राह में कुछ अंधेरे भी छिपे हैं। मार्च 2026 में भारत और कनाडा के बीच हुई अरबों डॉलर की यूरेनियम डील ने इसी द्वंद्व को फिर सामने ला खड़ा किया है। एक ओर यह समझौता ऊर्जा सुरक्षा और कम कार्बन उत्सर्जन का वादा करता है, तो दूसरी ओर खनन, रेडिएशन और पर्यावरणीय खतरों की चिंता भी बढ़ाता है। सवाल है कि क्या यह डील भारत के क्लाइमेट भविष्य को सुरक्षित बनाएगी या यह विकास की ऐसी कीमत होगी जिसे पर्यावरण और आदिवासी समुदायों को चुकाना पड़ेगा?

ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग की दिशा में भारत-कनाडा समझौता एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह केवल व्यापारिक सौदा नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक भी है। इस डील के तहत कनाडा की खनन कंपनी कैमेको भारत को 2027 से 2035 के बीच लगभग 22 मिलियन पाउंड यूरेनियम देगी, जिससे भारत के 24 परमाणु रिएक्टरों को ईंधन मिलेगा। भारत की वर्तमान परमाणु ऊर्जा क्षमता लगभग 8.88 गीगावाट है, जिसे सरकार 2047 तक लगभग 100 गीगावाट तक बढ़ाने का लक्ष्य रखती है। इसके लिए छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और उन्नत परमाणु तकनीकों पर सहयोग की भी चर्चा है। बढ़ती ऊर्जा मांग और रूस जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर वैश्विक दबाव के बीच यह समझौता भारत को एक वैकल्पिक और अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा मार्ग दे सकता है, इसलिए इसे ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच परमाणु ऊर्जा को अक्सर एक संभावित समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन और 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है। इस परिप्रेक्ष्य में परमाणु ऊर्जा एक स्थिर बेसलोड प्रदान कर सकती है, जो सौर और पवन ऊर्जा की अनियमितता को संतुलित करती है। अध्ययनों के अनुसार परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन कोयले से कई गुना कम होता है, इसलिए यह जलवायु परिवर्तन से निपटने का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। लेकिन ऊर्जा के इस स्वच्छ चेहरे के पीछे एक जटिल वास्तविकता भी छिपी है—यूरेनियम के खनन, प्रसंस्करण और अपशिष्ट प्रबंधन की प्रक्रिया पर्यावरणीय जोखिमों से भरी हुई है।

ऊर्जा की चमकदार बहस में यूरेनियम खनन के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव अक्सर दबकर रह जाते हैं। खदानों से निकलने वाले रेडियोधर्मी टेलिंग्स यानी अपशिष्ट में थोरियम और रेडियम जैसे तत्व मौजूद रहते हैं, जो लंबे समय तक मिट्टी और जल स्रोतों को दूषित कर सकते हैं। कनाडा के सस्कैचेवान क्षेत्र में स्थित कई यूरेनियम खदानों के आसपास भूजल प्रदूषण और वन्यजीवों पर प्रभाव को लेकर समय-समय पर चिंताएँ उठती रही हैं। हालांकि, नियामक रिपोर्ट्स में कुछ साइटों पर सफाई प्रयास चल रहे हैं। भारी मात्रा में पानी के उपयोग और खनन के दौरान उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन भी इस प्रक्रिया को पूरी तरह “स्वच्छ” नहीं रहने देते। यही कारण है कि कई पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा के पूरे जीवन चक्र को ध्यान में रखे बिना इसे जलवायु समाधान के रूप में प्रस्तुत करना अधूरा दृष्टिकोण है।

इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पहलू आदिवासी समुदायों से जुड़ा हुआ है। कनाडा में जिन क्षेत्रों में यूरेनियम खनन होता है, वहाँ डेने, क्री और मेटिस जैसे इंडिजिनस समुदाय सदियों से रहते आए हैं। कई सामाजिक संगठनों का दावा है कि इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को रेडिएशन से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा है। फेफड़ों के कैंसर, जेनेटिक विकार और अन्य बीमारियों के मामलों को लेकर वर्षों से चिंता व्यक्त की जाती रही है। कई आदिवासी समूहों का आरोप है कि उनकी जमीनों का इस्तेमाल खनन के लिए किया जाता है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उनकी सहमति और अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।

परमाणु ऊर्जा की यह बहस केवल वैश्विक नहीं, भारत में भी उतनी ही तीव्रता से गूंजती है। झारखंड की जादुगुडा यूरेनियम खदान इसका सबसे चर्चित उदाहरण है, जहाँ स्थानीय हो, संताल और मुंडा आदिवासी दशकों से स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को उठाते रहे हैं। कई अध्ययनों में इस क्षेत्र में जन्मजात विकृतियों, कैंसर और अन्य बीमारियों के मामलों को लेकर सवाल उठे हैं। स्वतंत्र अध्ययन इसकी पुष्टि करते हैं, हालांकि यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड इसे अस्वीकार करता है। टेलिंग पॉन्ड्स से रिसाव की घटनाएँ और जल स्रोतों में भारी धातुओं की मौजूदगी ने स्थानीय लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। इन परिस्थितियों में जब परमाणु ऊर्जा विस्तार की बात होती है, तो यह सवाल भी उठता है कि क्या विकास की कीमत हमेशा उन्हीं समुदायों को चुकानी पड़ेगी जो पहले से ही हाशिये पर हैं।

इन चुनौतियों के बावजूद समाधान की संभावनाएँ भी मौजूद हैं। यदि परमाणु ऊर्जा को वास्तव में जलवायु समाधान बनाना है तो खनन से लेकर अपशिष्ट प्रबंधन तक हर चरण में कड़े पर्यावरणीय मानकों को लागू करना होगा। मजबूत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। आदिवासी समुदायों के लिए “फ्री, प्रायर एंड इन्फॉर्म्ड कंसेंट” यानी पूर्व सहमति की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही नई तकनीकों जैसे छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और उन्नत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों पर भी गंभीर निवेश जरूरी है। इससे परमाणु ऊर्जा के जोखिमों को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।

ऊर्जा, पर्यावरण और न्याय के चौराहे पर खड़ी भारत-कनाडा यूरेनियम डील एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन गई है। अंततः यह केवल ऊर्जा का सवाल नहीं है, बल्कि विकास, पर्यावरण और न्याय के बीच संतुलन की भी कसौटी है। यदि यह समझौता जिम्मेदार नीतियों और मजबूत निगरानी के साथ लागू किया जाता है, तो यह भारत के क्लाइमेट लक्ष्यों को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन अगर पर्यावरणीय जोखिमों और आदिवासी अधिकारों की अनदेखी की गई, तो यह डील एक नई समस्या का कारण भी बन सकती है। इसलिए असली सवाल यही है—क्या हम ऐसा विकास मॉडल चुनेंगे जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ प्रकृति और मानव गरिमा की भी रक्षा करे? भारत के क्लाइमेट भविष्य का उत्तर शायद इसी संतुलन में छिपा है।