मजबूत लोकतंत्र के लिये दागी नेताओं से मुक्ति जरूरी

Freedom from tainted politicians is essential for a strong democracy

ललित गर्ग

भारतीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता के बाद अनेक उपलब्धियां अर्जित की हैं। आज भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति होने के साथ-साथ विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के साथ देश आर्थिक, तकनीकी और वैश्विक नेतृत्व की नई ऊंचाइयों को छूने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है। किंतु यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता अथवा तकनीकी विकास में नहीं, बल्कि उसकी राजनीति और शासन व्यवस्था की नैतिकता में निहित होती है। यदि लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखना है तो राजनीति को अपराध, भ्रष्टाचार और स्वार्थ की गिरफ्त से मुक्त करना ही होगा। आजादी के बाद से लगभग हर सरकार ने भ्रष्टाचार-मुक्त शासन, पारदर्शी प्रशासन और स्वच्छ राजनीति का वादा किया। अनेक आयोग बने, कानून बने और चुनाव सुधारों की चर्चाएं भी हुईं, लेकिन जब भी कोई ठोस एवं प्रभावी सुधार लागू करने का प्रयास हुआ, राजनीतिक दलों ने अपने-अपने हितों के अनुसार उसका समर्थन अथवा विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि राजनीतिक शुचिता का प्रश्न आज भी अधूरा है। विडंबना यह है कि अब तक कोई ऐसा खाका सामने नहीं आ सका है, जिससे सिर्फ स्वच्छ छवि के लोगों को ही जनप्रतिनिधि बनने का अवसर मिले। यह और बड़ी विडम्बना है कि जिस विषय पर पूरे राष्ट्र की सहमति होनी चाहिए, वही विषय राजनीतिक टकराव का माध्यम बन जाता है।

आए दिन संसद और विधानसभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद चुने गए जनप्रतिनिधियों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता तो जताई जाती है, मगर उसके हल को लेकर कोई ठोस पहल नहीं होती। संविधान के तहत केवल दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों को ही पद से हटाया जा सकता है और इस संबंध में संवैधानिक पद पर बैठे नेताओं को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसी संदर्भ में भाजपा सरकार फिर से एक सौ तीसवें संविधान संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने की तैयारी में है, जिसके तहत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य मंत्रियों को पाँच साल से ज्यादा सजा के प्रावधान वाले गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार किए जाने और लगातार तीस दिनों तक हिरासत में रखे जाने पर पद से हटाने का प्रस्ताव है। अगर विधेयक की जांच के बाद संयुक्त संसदीय समिति इसे अपनी मंजूरी दे देती है, तो संसद के मानसून सत्र में इस पर बहस की संभावना है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष अगस्त में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में यह विधेयक पेश किया था। हालांकि विपक्षी दलों की ओर से उठाई गई कई आपत्तियों के बाद इसकी जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया था, लेकिन कांग्रेस सहित ज्यादातर विपक्षी दलों ने अपनी चिंताओं को नजरअंदाज किए जाने की आशंका के मद्देनजर समिति का बहिष्कार कर दिया था।

निश्चित ही संसद और विधानसभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधियों की बढ़ती संख्या लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। यदि कोई जनप्रतिनिधि हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, आतंकवाद अथवा संगठित अपराध जैसे गंभीर मामलों में लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में है, तो क्या वह जनता का प्रतिनिधित्व करने का नैतिक अधिकार बनाए रखता है? यह प्रश्न केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नैतिकता से जुड़ा हुआ प्रश्न है। हालांकि इस प्रकार के कानून पर कई संवैधानिक प्रश्न भी उठते हैं। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को तब तक निर्दोष मानता है जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए। केवल आरोप के आधार पर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को पद से हटाना राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार भी बन सकता है। विपक्षी दलों की यह आशंका पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकती कि यदि पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं होंगे तो सत्ता में बैठी सरकारें विरोधियों के विरुद्ध जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर सकती हैं। इसलिए किसी भी नए कानून में प्राकृतिक न्याय, न्यायिक समीक्षा और निष्पक्ष जांच की सुदृढ़ व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। लेकिन इन आशंकाओं के कारण सुधार की पूरी प्रक्रिया को रोक देना भी उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में सुधार का अर्थ किसी दल को लाभ या हानि पहुंचाना नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को मजबूत करना है। यदि कानून संतुलित, पारदर्शी और न्यायसंगत हो तो वह लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि अधिक विश्वसनीय बनाता है।

भारत की राजनीति में अनेक ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जिन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए। बिहार में लालू प्रसाद यादव से लेकर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल तथा उनके कुछ मंत्रियों तक, विभिन्न राजनीतिक दलों के अनेक नेता ऐसे रहे हैं जो गंभीर आरोपों अथवा जेल में रहने के बावजूद सत्ता पर बने रहने का प्रयास करते रहे। यह किसी एक दल का प्रश्न नहीं है, लगभग सभी बड़े राजनीतिक दल समय-समय पर इस आलोचना के घेरे में रहे हैं। जेल से सरकार चलाने अथवा संवैधानिक पद पर बने रहने की मानसिकता लोकतंत्र की गरिमा के अनुकूल नहीं कही जा सकती। यह सही है कि कानून अपना कार्य करेगा और न्यायालय अंतिम निर्णय देगा, किंतु सार्वजनिक जीवन केवल कानूनी वैधता से नहीं चलता, उसका आधार नैतिक वैधता भी होती है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि आदर्शों का भी प्रतीक होता है। यदि उसके ऊपर गंभीर आरोप हों और वह फिर भी पद से चिपका रहे, तो जनता का लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर पड़ता है। राजनीति में पद त्यागना पराजय नहीं, बल्कि नैतिक साहस का परिचायक होता है।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत का जो लक्ष्य रखा है, उसमें आर्थिक प्रगति के साथ सुशासन, डिजिटल पारदर्शिता, भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन और जनभागीदारी पर विशेष बल दिया गया है। विकसित भारत केवल ऊंची इमारतों, एक्सप्रेस-वे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तेज आर्थिक विकास से नहीं बनेगा, वह तभी बनेगा जब शासन चलाने वाले व्यक्तियों की विश्वसनीयता भी उतनी ही मजबूत होगी। विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखने वाले राष्ट्र की राजनीति भी विश्व के लिए आदर्श बननी चाहिए। आज आवश्यकता केवल कानून बदलने की नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति बदलने की भी है। राजनीतिक दलों को चुनावी टिकट देते समय उम्मीदवार के चरित्र, सार्वजनिक जीवन, सामाजिक सेवा और नैतिक छवि को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय कई बार राजनीतिक दलों से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट देने का कारण सार्वजनिक करने को कह चुका है, किंतु व्यवहार में इसमें अपेक्षित परिवर्तन दिखाई नहीं देता। यदि राजनीतिक दल स्वयं आत्मानुशासन नहीं अपनाएंगे, तो केवल कानून से समस्या का समाधान संभव नहीं होगा।

इसके साथ ही न्यायिक प्रक्रिया में भी व्यापक सुधार अपेक्षित हैं। जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों का वर्षों तक लंबित रहना लोकतंत्र के लिए घातक है। विशेष न्यायालयों द्वारा समयबद्ध सुनवाई, निष्पक्ष जांच और शीघ्र निर्णय की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि न निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक संदेह के घेरे में रहे और न दोषी व्यक्ति कानून की तकनीकी जटिलताओं का लाभ उठाकर जनता का प्रतिनिधित्व करता रहे। लोकतंत्र की सफलता केवल संविधान से नहीं, बल्कि राजनीतिक चरित्र से सुनिश्चित होती है। जब तक राजनीति में नैतिकता, सेवा, त्याग और उत्तरदायित्व की भावना नहीं आएगी, तब तक भ्रष्टाचार और अपराध का दुष्चक्र पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, किंतु राष्ट्रीय हित से जुड़े सुधारों का विरोध केवल राजनीतिक लाभ-हानि के आधार पर नहीं होना चाहिए। यदि किसी प्रस्ताव में कमियां हैं तो उन्हें सुधारने के सुझाव दिए जाएं, लेकिन सुधार की दिशा को अवरुद्ध करना लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचायक नहीं माना जा सकता।

आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत का स्वप्न है, तो दूसरी ओर राजनीति की विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित करने की चुनौती भी है। इन दोनों लक्ष्यों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। आर्थिक विकास और नैतिक विकास समानांतर चलेंगे तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा। समय की पुकार है कि सत्ता और विपक्ष दोनों दल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर लोकतंत्र की पवित्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। देश की राजनीति को आपराधिक छवि के लोगों से मुक्त करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए जो कानून बने, उसमें अपराधों की प्रकृति स्पष्ट किए जाने से लेकर ऐसे सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है, ताकि महज बदले या किसी सरकार को अस्थिर करने की मंशा से इसका दुरुपयोग न हो सके।