भारत के स्पेस मिशन में निजी क्षेत्र की भागेदारी कितनी अहम

How important is private sector participation in India's space mission?

भारत को स्पेस सुपरपावर बनाता प्राइवेट सेक्टर

विवेक शुक्ला

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सोमवार को पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) मिशन में एक निजी क्षेत्र की भागीदारी रही। पहली बार, हैदराबाद की निजी कंपनी ध्रुवा स्पेस ने सात सैटेलाइट प्रदान किए, जो इसरो के मिशन का हिस्सा बने। इस ताजा मिशन में निजी क्षेत्र की भागेदारी से साफ है कि भारत के अंतरिक्ष इकोसिस्टम में निजी कंपनियों का योगदान रहने वाला है।

निजी क्षेत्र को फंडिंग, रेगुलेटरी सपोर्ट और तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत है। इसरो के साथ साझेदारी से ये दूर हो सकती हैं। निजी क्षेत्र की भूमिका कितनी अहम है? इसरो के मिशनों में निजी कंपनियां अब सैटेलाइट निर्माण, लॉन्च व्हीकल विकास और डेटा सेवाओं में सक्रिय हैं। ध्रुवा स्पेस के सात सैटेलाइट्स पीएसएलवी मिशन में शामिल होने से पता चलता है कि निजी क्षेत्र सस्ते, नवीन समाधान प्रदान कर रहा है। इससे लॉन्च क्षमता बढ़ रही है और लागत कम हो रही है। पहले इसरो अकेले ही सब कुछ संभालता था, लेकिन अब 300 से अधिक स्टार्टअप्स इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। कंपनियां जैसे स्काईरूट एयरोस्पेस, सेलेस्टियल एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमोस और पिक्सेल स्पेस सैटेलाइट लॉन्च और अर्थ ऑब्जर्वेशन में योगदान दे रही हैं। निजी क्षेत्र की भागीदारी से इसरो को बड़े मिशनों पर फोकस करने का मौका मिलता है, जबकि छोटे कार्य निजी कंपनियां संभालती हैं।

इस संदर्भ में, गुरुग्राम के युवा वैज्ञानिकों का एक समूह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनमें से कई आईआईटी के छात्र हैं, और टीम का नेतृत्व युवा वैज्ञानिक श्रेयांस जैन कर रहे हैं। उनकी कंपनी, सेलेस्टियल एयरोस्पेस, एक क्रांतिकारी बैलून-सहायता प्राप्त रॉकेट लॉन्च सिस्टम विकसित कर रही है। इस तकनीक में एक बड़ा बैलून रॉकेट को ऊपरी वायुमंडल तक ले जाता है, जहां हवा पतली होती है और प्रतिरोध कम। वहां से रॉकेट प्रज्वलित होता है, जिससे ईंधन की बचत होती है और पेलोड क्षमता 2-3 गुना बढ़ जाती है।

श्रेयांस बताते हैं, “जमीन से लॉन्च करने में घनी हवा और गुरुत्वाकर्षण से लड़ना पड़ता है, जिससे ईंधन बर्बाद होता है। हमारा तरीका कुशल है और लागत कम करता है।” उनकी टीम हाई-प्रेशर इन्फ्लेटेबल संरचनाओं पर काम कर रही है, जो गर्म गैसों से संचालित होती हैं। भविष्य में न्यूक्लियर प्रोपल्शन जैसी उन्नत तकनीकें जोड़ी जा सकती हैं, जो ग्रहों के बीच तेज यात्रा सक्षम करेंगी।

यह नवाचार इसरो के मिशनों से सीधे जुड़ा है। इसरो के पीएसएलवी मिशन में निजी क्षेत्र की भागीदारी दिखाती है कि कैसे युवा उद्यमी राष्ट्रीय प्रयासों को मजबूत कर रहे हैं। कई महीनों के अकेले शोध के बाद, श्रेयांस ने आईआईटी ग्रेजुएट्स और युवा वैज्ञानिकों की टीम बनाई। अब वे विंड टनल टेस्ट और छोटे प्रयोग कर रहे हैं, लक्ष्य 2026 के अंत तक प्रोटोटाइप लॉन्च करना है। टीम ने भारत और विदेश में पेटेंट फाइल किए हैं, और अंतिम लक्ष्य ऑर्बिटल लॉन्च है। निजी क्षेत्र अंतरिक्ष मिशनों में बड़ी भूमिका निभा रहा है, जो भारत के सपनों के लिए अनिवार्य है।

यह भूमिका भारत के लिए कितनी जरूरी है? भारत की स्पेस इकोनॉमी वर्तमान में लगभग 9 बिलियन डॉलर की है, जो वैश्विक बाजार का 2-3% है। सरकार का लक्ष्य 2033 तक इसे 44 बिलियन डॉलर तक पहुंचाना है। निजी क्षेत्र इस लक्ष्य की कुंजी है। 2020 से शुरू हुए सुधारों ने इसे संभव बनाया है। इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023, आईएन-स्पेस (इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथोराइजेशन सेंटर) का गठन और 100% एफडीआई की अनुमति ने निजी कंपनियों को प्रोत्साहित किया है। इससे स्वदेशी तकनीक विकसित हो रही है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण है। कृषि, आपदा प्रबंधन, टेलीकॉम और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में स्पेस टेक्नोलॉजी की मदद से समाज का विकास हो रहा है। उदाहरण के लिए, अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स फसल पूर्वानुमान और बाढ़ चेतावनी में उपयोगी हैं।

निजी क्षेत्र की भागीदारी रोजगार सृजन भी कर रही है। युवा वैज्ञानिक जैसे श्रेयांस जैन की टीम आईआईटी छात्रों को अवसर दे रही है, जो अन्यथा विदेश जा सकते थे। इससे ब्रेन ड्रेन रुकता है और स्थानीय नवाचार बढ़ता है। वैश्विक स्तर पर, भारत को लॉन्च प्रदाता के रूप में स्थापित करने में निजी क्षेत्र मदद कर रहा है। स्पेसएक्स जैसी कंपनियों की तरह, भारतीय स्टार्टअप्स सस्ते लॉन्च प्रदान कर सकते हैं, जो विकासशील देशों के लिए आकर्षक है। इससे विदेशी मुद्रा अर्जित होती है और भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ती है।

सेलेस्टियल एयरोस्पेस जैसी कंपनियां बड़े बदलाव ला सकती हैं। सेलेस्टियल एयरोस्पेस की बैलून तकनीक ईंधन बचत से पर्यावरण अनुकूल भी है, जो सस्टेनेबल स्पेस एक्सप्लोरेशन की दिशा में कदम है। भविष्य में, निजी क्षेत्र मंगल मिशन या स्पेस टूरिज्म में योगदान दे सकता है।

बेशक, इसरो के मिशनों में निजी क्षेत्र की भूमिका न केवल अहम है, बल्कि भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं के लिए अनिवार्य है। श्रेयांस जैन जैसे युवा इनोवेटर्स इस परिवर्तन के प्रतीक हैं। उनकी सेलेस्टियल एयरोस्पेस कंपनी पीएसएलवी जैसे मिशनों से प्रेरित होकर नई ऊंचाइयां छू रही है। निजी क्षेत्र से नवाचार, लागत कमी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जो भारत को स्पेस सुपरपावर बनाएगा। यह आत्मनिर्भरता, आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण की कुंजी है। जैसे-जैसे स्टार्टअप्स बढ़ेंगे, भारत का अंतरिक्ष भविष्य और उज्ज्वल होगा।