अशोक भाटिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चंडीगढ़ की रैली में पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद मनीष तिवारी से बड़ी गर्मजोशी के साथ मिले। पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी और अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के बीच मची खींचतान के बीच मनीष तिवारी से हाथ मिलाया और बातचीत की।चंडीगढ़ से सांसद तिवारी आधिकारिक प्रोटोकॉल के तहत इस कार्यक्रम में शामिल हुए। हालांकि, प्रधानमंत्री के साथ उनकी बातचीत ने सबका ध्यान खींचा है और राजनीतिक बहस को हवा दी है, साथ ही इस मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हैं।
यह बैठक इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि मनीष तिवारी ने हाल ही में कांग्रेस की ओर से 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए संगठनात्मक नियुक्तियों और चुनाव समितियों की घोषणा करने पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इसमें उन्हें कोई भी जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी।सोशल मीडिया पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए तिवारी ने संकेत दिया कि पार्टी नेतृत्व में व्याप्त असुरक्षा इस निर्णय के पीछे का कारण हो सकती है। प्रधानमंत्री मोदी से उनकी मुलाकात के बाद से यह अटकलें तेज हो गई हैं कि भारतीय जनता पार्टी वरिष्ठ कांग्रेस नेता से संपर्क साधने का प्रयास कर रही है। जब प्रधानमंत्री ने तिवारी से बात की तब बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी वहां मौजूद थे।
आज हालत यह है कि आज भारतीय राजनीति में जब भी कोई विपक्षी दल का नेता सत्ता पक्ष के शीर्ष नेतृत्व से सार्वजनिक मंच पर मुस्कुराकर हाथ मिलाता है, तो देश के राजनीतिक गलियारों में अफवाहों का बाजार गर्म होना एक सामान्य परिपाटी बन चुका है। इस मुलाकात और मंच साझा करने की तस्वीरों के सामने आते ही सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया में यह अटकलें तेजी से दौड़ने लगीं कि क्या मनीष तिवारी कांग्रेस का दामन छोड़ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने जा रहे हैं?
यह पहली बार नहीं है जब मनीष तिवारी के राजनीतिक भविष्य और उनकी पार्टी बदलने को लेकर कयास लगाए गए हों। बीते कुछ वर्षों में, विशेषकर २०२४ के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भी उनके भाजपा में जाने और पंजाब की लुधियाना सीट से चुनाव लड़ने की अफवाहें उड़ी थीं, जिनका उनके कार्यालय ने खंडन किया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन अटकलों को बार-बार हवा मिलने के पीछे कुछ ठोस कारण रहे हैं। मनीष तिवारी कांग्रेस के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो वैचारिक रूप से प्रखर हैं और कई राष्ट्रीय सुरक्षा तथा विदेश नीति के मुद्दों पर अपनी ही पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग, राष्ट्र-प्रथम की सोच के साथ राय रखने के लिए जाने जाते हैं। चाहे वह पूर्व में सैन्य सुधारों का मुद्दा रहा हो या अग्निपथ योजना पर उनकी व्यक्तिगत टिप्पणियां, उन्होंने हमेशा एक स्वतंत्र विचारक की छवि पेश की है।
इसके अतिरिक्त, हाल के दिनों में पंजाब कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक बदलावों और चंडीगढ़ की राजनीति में स्थानीय स्तर पर पार्टी के भीतर उनकी उपेक्षा या असंतोष की खबरें भी छन-छनकर बाहर आती रही हैं। जब किसी पार्टी के भीतर एक कद्दावर और बौद्धिक नेता खुद को हाशिए पर महसूस करता है, तो विरोधी दल के साथ उसकी किसी भी सामान्य मुलाकात को ‘डील’ या ‘पार्टी बदलने की भूमिका’ के रूप में देखा जाना स्वाभाविक हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी गर्मजोशी से भरी बातचीत और मंच पर दिखा सामंजस्य इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण संदेह के चश्मे से देखा गया।
मनीष तिवारी का यह स्पष्टीकरण कि “विकास की आवश्यकताओं को दलगत राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए”, आधुनिक भारतीय राजनीति के एक बहुत बड़े कड़वे सच की ओर इशारा करता है। आज के दौर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संबंध इतने कटु हो चुके हैं कि स्वस्थ संवाद या सार्वजनिक शिष्टाचार की गुंजाइश लगभग समाप्त हो गई है। यदि विपक्ष का कोई नेता प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी केंद्रीय मंत्री के साथ विकासात्मक मुद्दों पर सहयोग करता है या उनकी सराहना करता है, तो उसकी अपनी ही पार्टी के भीतर उसे ‘संदिग्ध’ मान लिया जाता है।
मनीष तिवारी ने स्वयं को ‘ओल्ड स्कूल’ यानी पुराने ख्यालों का बताकर देश को उस दौर की याद दिलाई है जब जवाहरलाल नेहरू विपक्ष के अटल बिहारी वाजपेयी को भविष्य का प्रधानमंत्री बताते थे, या जब नरसिम्हा राव ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए विपक्षी नेता वाजपेयी को भेजा था। आज की राजनीति में यह सहिष्णुता और शिष्टाचार गायब हो चुका है। अब राजनीति केवल ‘शत्रुता’ और ‘पूर्ण समर्पण’ के दो छोरों के बीच सिमट कर रह गई है। तिवारी का यह कदम एक सांसद के रूप में अपने क्षेत्र के विकास के लिए सरकार के प्रमुख के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का एक संवैधानिक दायित्व भी था, जिसे राजनीति के अति-ध्रुवीकरण ने एक दलबदल के तमाशे में तब्दील करने की कोशिश की।
इस पूरे घटनाक्रम के बहाने हमें भारतीय राजनीति में वैचारिक निष्ठा के गिरते स्तर पर भी बात करनी होगी। पिछले एक दशक में जिस तरह से विभिन्न राज्यों में रातों-रात सरकारें बदली हैं और नेताओं ने अपनी दशकों पुरानी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को दरकिनार कर विरोधी दलों की सदस्यता ली है, उसने जनता के मन में नेताओं के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है। आज जनता के लिए यह विश्वास करना कठिन हो गया है कि कोई नेता केवल शिष्टाचार के नाते किसी विरोधी दल के नेता से मिल रहा है। मतदाता मानकर चलता है कि हर मुलाकात के पीछे कोई न कोई गुप्त राजनीतिक सौदा अवश्य छिपा है।
मनीष तिवारी ने इस अविश्वास के माहौल को तोड़ने का प्रयास किया है। उनका यह कहना कि हर बात को कांग्रेस बनाम भाजपा के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, एक परिपक्व लोकतंत्र की निशानी है। एक मजबूत लोकतंत्र वह नहीं है जहां सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे का चेहरा भी न देखना चाहें, बल्कि वह है जहां संसद के भीतर तीखी बहस हो, लेकिन संसद के बाहर और देश के विकास के मुद्दों पर दोनों पक्ष एक साथ खड़े दिखाई दें।
भले ही मनीष तिवारी ने भाजपा में शामिल होने की खबरों को पूरी तरह खारिज कर दिया हो, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के लिए यह घटना एक चेतावनी की तरह है। पार्टी को यह सोचना होगा कि उसके वरिष्ठ, अनुभवी और बौद्धिक नेताओं को लेकर बार-बार इस तरह की अफवाहें क्यों उड़ती हैं? क्या पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, संवाद और वरिष्ठ नेताओं को उचित सम्मान देने की प्रक्रिया में कोई कमी रह गई है? जब पार्टी अपने प्रखर वक्ताओं और जमीन से जुड़े नेताओं की चिंताओं को दूर नहीं कर पाती, तब ऐसी अफवाहों को फैलने के लिए उपजाऊ जमीन मिल जाती है।
कांग्रेस को समझना होगा कि केवल आक्रामक राजनीति से ही संगठन मजबूत नहीं होता, बल्कि अपने वैचारिक योद्धाओं को सहेज कर रखने और उन्हें यह अहसास कराने से होता है कि संगठन में उनकी उपयोगिता और सम्मान अक्षुण्ण है। मनीष तिवारी जैसे नेता पार्टी की बौद्धिक पूंजी हैं, और उनकी नाराजगी या उनकी उपेक्षा की खबरें पार्टी की साख को कमजोर करती हैं।
चंडीगढ़ के मंच से उठी यह सियासी हलचल फिलहाल तो मनीष तिवारी के खंडन के बाद शांत हो गई है, लेकिन इसने देश के राजनीतिक पंडितों को सोचने का एक बड़ा अवसर दिया है। मनीष तिवारी का यह कदम और उनका स्पष्टीकरण भारतीय राजनीति में खोते जा रहे ‘मध्यम मार्ग’ को पुनर्जीवित करने की एक कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए। राजनीति में मतभेद होने चाहिए, मनभेद नहीं। विकास के एजेंडे पर जब तक देश का राजनीतिक नेतृत्व एकजुट नहीं होगा, तब तक लोकतांत्रिक संस्थाएं और संघीय ढांचा मजबूत नहीं हो सकते।
यह घटना यह भी रेखांकित करती है कि मीडिया और जनता को भी किसी भी सामान्य मुलाकात को दलबदल से जोड़ने की जल्दबाजी से बचना चाहिए। राजनीतिक शिष्टाचार को जीवित रखना किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए उतना ही जरूरी है, जितना कि एक मजबूत विपक्ष का होना। मनीष तिवारी कांग्रेस में रहकर अपनी वैचारिक लड़ाई लड़ते रहेंगे या भविष्य में कोई नया मोड़ आएगा, यह तो समय ही बताएगा; परंतु वर्तमान में उनका यह स्टैंड स्वागत योग्य है कि देश का विकास और संवैधानिक प्रोटोकॉल, दलगत संकीर्णताओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
मनीष तिवारी ने देश की मौजूदा राजनीति को “टूटी हुई और जहरीली” भी बताते हुए दिल्ली को इसका सबसे बड़ा केंद्र कहा है। उनका यह बयान आज के राजनीतिक परिदृश्य की कड़वी सच्चाई है, जहां राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को वैचारिक विरोधी न मानकर ‘जानी दुश्मन’ की तरह देखा जाने लगा है। ऐसी स्थिति में यदि दो अलग-अलग विपरीत विचारधाराओं के नेता सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे का सम्मान करते हैं या गर्मजोशी से हाथ मिलाते हैं, तो उसे सहज रूप से स्वीकार करने के बजाय संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
मनीष तिवारी की प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक मर्यादा और दलबदल की राजनीति के बीच एक महीन रेखा होती है। तिवारी ने स्पष्ट किया है कि वह कांग्रेस के प्रति वफादार हैं और उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी पार्टी को दिया है। बहरहाल, यह घटना कांग्रेस नेतृत्व के लिए भी एक सबक है कि वे अपने वरिष्ठ और जमीन से जुड़े नेताओं की चिंताओं और उनके आत्मसम्मान का ध्यान रखें, ताकि शिष्टाचार की किसी भी तस्वीर को विरोधी दल अपनी राजनीतिक बढ़त के रूप में न भुना सकें। विकास के मंचों को राजनीति के अखाड़े से दूर रखना ही भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का पैमाना होना चाहिए।





