उत्तरप्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में मायावती सभी जातियों को जोड़ने में लगी !

Mayawati is trying to unite all castes in the upcoming assembly elections of Uttar Pradesh

अशोक भाटिया

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए 2007 वाले ‘सर्वजन’ (दलित-ब्राह्मण-मुसलमान) फॉर्मूले को फिर से लागू करने की कोशिश कर रही है। अपनी राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए पार्टी ‘भाईचारा कमेटियों’ के जरिए सभी जातियों को जोड़ने और टिकट वितरण में सोशल इंजीनियरिंग का दांव आजमा रही है।

हालांकि, पार्टी की राह उतनी आसान नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव और विभिन्न राज्यों के चुनावों में हार के बाद, पार्टी का जनाधार काफी सिकुड़ गया है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’ की ओर जाने के पुराने प्रयोग से पार्टी का मूल वोट बैंक भ्रमित हुआ, जिसका फायदा अन्य दलों को मिला। अब 2026-2027 में मायावती एक बार फिर उसी सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को आजमाकर अपनी खोई हुई ताकत हासिल करने का प्रयास कर रही हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी के इस ‘सर्वजन’ और सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले की सफलता और चुनौतियों को विस्तार से जानना जरुरी है ।

बकी करीब 20 सालों के बाद एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिये बसपा के पक्ष में दलितों के साथ ब्राह्मणों एवं मुसलमानों के वोटों की गोलबंदी देखी जा रही है। ब्राह्मणों और मुसलमानों के एक बार फिर बसपा की तरफ रुख करने की वजह में जाया जाए, तो ऐसा लगता है कि योगी राज में ब्राह्मणों को लग रहा है कि उनके साथ यह सरकार नाइंसाफी कर रही है। नौकरशाही से लेकर सरकार तक में महत्वपूर्ण पदों से ब्राह्मणों को दूर रखा गया है। यही वजह है कि पिछले कुछ समय में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में ब्राह्मण नेताओं का प्रवेश अधिक देखा गया है। जनवरी 2026 में अंबेडकर नगर से भाजपा के दिग्गज नेता राधेश्याम पांडे 51-100 ब्राह्मण समर्थकों के साथ बसपा में शामिल हुए। उन्होंने मायावती से मुलाकात कर पार्टी जॉइन की। दिसंबर 2025 में ब्राह्मण समाज के बड़े नेता जैसे जितेंद्र मिश्रा, दीपक द्विवेदी, नीरज पांडे, विशाल मिश्रा, वैभव दुबे, अनुराग शुक्ला, मोहित शर्मा भाजपा से बसपा में शामिल हुए। यह 2027 चुनाव से पहले भाजपा को झटका था। जनवरी 2026 में एक अन्य बड़े ब्राह्मण नेता ने मायावती से मुलाकात कर बसपा जॉइन की।

सवाल यह है कि क्या 2027 का उत्तर प्रदेश, 2007 वाला उत्तर प्रदेश है? क्या आज भी ब्राह्मण वोट सत्ता की दिशा तय करता है? क्या दलित समाज अब भी बसपा को अपना सबसे स्वाभाविक राजनीतिक घर मानता है? और क्या मायावती के पास वह संगठन, वे चेहरे और वह आक्रामकता बची है, जो भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच खुद के लिए जगह बना सके? इसके लिए 2007 को याद करना जरूरी है। बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। पार्टी का वोट शेयर करीब 30। 4 प्रतिशत था। उस चुनाव में बसपा ने लगभग 86 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से बड़ी संख्या जीतकर विधानसभा पहुंची। सतीश चंद्र मिश्रा उस सोशल इंजीनियरिंग मॉडल का चेहरा बने। नारा था — “ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा।”

उस समय राजनीतिक हालात अलग थे। भाजपा कमजोर थी। समाजवादी पार्टी यादव-मुस्लिम पार्टी की छवि में सीमित थी। कांग्रेस हाशिए पर थी और मायावती आक्रामक, निर्णायक तथा सत्ता संभालने वाली नेता के रूप में स्थापित थीं। दलित वोट लगभग पूरी तरह उनके साथ था। जाटव वोट बैंक बसपा की रीढ़ था और गैर-जाटव दलितों में भी पार्टी की पकड़ मजबूत थी।लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर गिरकर करीब 12। 9 प्रतिशत पर पहुंच गया। पार्टी केवल बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट जीत सकी। 2017 विधानसभा चुनाव में बसपा को 19 सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर करीब 22 प्रतिशत था। यानी 2017 से 2022 के बीच पार्टी लगभग आधी राजनीतिक ताकत खो बैठी।

सबसे बड़ा झटका संगठनात्मक स्तर पर लगा। बसपा का कैडर, जो कभी बूथ स्तर तक सक्रिय माना जाता था, धीरे-धीरे निष्क्रिय होता गया। पार्टी के बड़े चेहरे या तो भाजपा और सपा में चले गए या फिर राजनीति से किनारा कर लिया। कई जिलों में बसपा के पास ऐसा स्थानीय नेतृत्व नहीं बचा, जो लड़ाई को जमीन पर मजबूती से खड़ा कर सके।

ऐसे में सवाल उठता है कि मायावती फिर ब्राह्मण कार्ड क्यों खेल रही हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह है राजनीतिक जमीन की तलाश। आज यूपी की राजनीति दो बड़े खेमों — भाजपा और सपा — में बंटी हुई है। कांग्रेस का दायरा सीमित है और बसपा लगातार सिकुड़ रही है। मायावती को लगता है कि अगर उन्हें वापसी करनी है, तो कोई बड़ा सामाजिक समीकरण खड़ा करना होगा। सिर्फ दलित वोट के भरोसे सत्ता तक पहुंचना अब संभव नहीं दिखता। यहीं से फिर ब्राह्मण-दलित फॉर्मूले की चर्चा शुरू होती है।

लेकिन क्या ब्राह्मण समाज आज बसपा के साथ आने की स्थिति में है? 2007 में ब्राह्मणों का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी से दूरी बनाकर बसपा की तरफ आया था, क्योंकि उन्हें कानून-व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहिए था। उस दौर में भाजपा सत्ता की मुख्य दावेदार नहीं थी। लेकिन 2014 के बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोट बैंक पर जबरदस्त पकड़ बना ली।

2014 लोकसभा चुनाव, 2017 विधानसभा चुनाव, 2019 लोकसभा चुनाव और 2022 विधानसभा चुनाव। हर चुनाव में ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ खड़ा दिखाई दिया। CSDS और अन्य पोस्ट-पोल सर्वे बताते हैं कि 2022 में भी लगभग 80 प्रतिशत ब्राह्मण वोट भाजपा गठबंधन को मिला। जबकि बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे और “प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन” भी किए, लेकिन उसे जमीन पर समर्थन नहीं मिला।

आज ब्राह्मण वोटर किन आधारों पर वोट करता है? पहला, सत्ता के करीब कौन है। दूसरा, हिंदुत्व की राजनीति में कौन मजबूत है। तीसरा, स्थिर सरकार कौन दे सकता है। इन तीनों पैमानों पर फिलहाल भाजपा मजबूत दिखाई देती है।तो क्या मायावती सिर्फ सांकेतिक राजनीति कर रही हैं या उनके पास कोई गहरी रणनीति है?मायावती अच्छी तरह समझती हैं कि अगर बसपा को राजनीतिक रूप से जिंदा रखना है, तो उसे सिर्फ “दलित पार्टी” की छवि से बाहर आना होगा। यही वजह है कि वे “सर्वजन” लाइन की तरफ लौटती दिखाई दे रही हैं। ब्राह्मण सम्मेलन उसी रणनीति का हिस्सा हैं।

दूसरी चुनौती दलित वोट बैंक की है। बसपा की सबसे बड़ी ताकत दलित वोट था, खासकर जाटव समुदाय। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में भाजपा ने गैर-जाटव दलितों में बड़ी सेंध लगाई है। पासी, वाल्मीकि, कोरी, धोबी जैसे कई समुदाय भाजपा की तरफ गए। वजह सिर्फ हिंदुत्व नहीं थी। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं — मुफ्त राशन, उज्ज्वला, आवास और शौचालय जैसी योजनाओं — का भी बड़ा असर रहा। यानी भाजपा ने सिर्फ सवर्ण राजनीति नहीं की, बल्कि सामाजिक विस्तार भी किया। और यही मायावती की सबसे बड़ी मुश्किल है।

अगर दलित वोट बैंक बिखर रहा हो और ब्राह्मण वोट पहले से भाजपा के साथ हो, तो नया सोशल इंजीनियरिंग मॉडल खड़ा कैसे होगा?2007 में मायावती के पास सत्ता की संभावना थी। लोग उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर देख रहे थे। लेकिन आज 2027 की चर्चा में क्या बसपा सत्ता की मुख्य दावेदार दिखती है? शायद नहीं। राजनीति में वोटर सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि जीतने की संभावना भी तलाशता है, खासकर सवर्ण वोटर। यही कारण है कि ब्राह्मण समाज का बड़ा हिस्सा उस पार्टी के साथ जाता है, जो सत्ता में हो या सत्ता के करीब हो।

दूसरी तरफ, अखिलेश यादव ने 2024 में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की नई राजनीति शुरू की है। समाजवादी पार्टी अब सिर्फ यादव-मुस्लिम पार्टी की छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में सपा को इसका फायदा भी मिला। कई दलित इलाकों में सपा ने बेहतर प्रदर्शन किया। यानी मायावती सिर्फ भाजपा से नहीं, बल्कि सपा से भी लड़ रही हैं।

अब सवाल यह भी है कि क्या बसपा के पास कोई बड़ा ब्राह्मण चेहरा है? सतीश चंद्र मिश्रा अभी भी पार्टी में हैं, लेकिन 2007 वाली ऊर्जा और प्रभाव अब दिखाई नहीं देता। नई पीढ़ी के ब्राह्मण नेताओं में बसपा के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं दिखता, जो बड़े पैमाने पर समाज को प्रभावित कर सके। इसके उलट भाजपा के पास ब्राह्मण नेतृत्व की लंबी सूची है।

योगी सरकार में ब्राह्मण मंत्रियों की मौजूदगी हो, संगठन में उनकी भूमिका हो या राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व। भाजपा लगातार यह संदेश देती रही है कि ब्राह्मण उसके साथ सुरक्षित हैं। हालांकि समय-समय पर यूपी में ब्राह्मण नाराजगी की चर्चा भी होती रही है। एनकाउंटर राजनीति, ठाकुर वर्चस्व के आरोप और कुछ चर्चित घटनाओं के बाद यह धारणा बनी कि ब्राह्मण समाज का एक वर्ग असहज है। मायावती उसी खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही हैं।

कुछ जानकारों का कहना है कि मायावती के लिए 2027 में अन्य दलों के साथ गठबंधन करना ज्यादा जरूरी है क्योकि मौजूदा समय में मायावती की पार्टी के प्रदेश में केवल एक विधायक हैं। बसपा लोकसभा, राज्यसभा, यूपी विधान परिषद में शून्य पर है। 2014 के लोकसभा में बसपा का खाता नहीं खुला। 2019 में बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया जिसके चलते उनके 10 सांसद जीते। 2024 में फिर अकेले लड़ी तो एक बार फिर से पार्टी का रिजल्ट शून्य ही रहा। इसी यूपी में विधानसभा चुनावों की बात करें तो 2012 में जब मायावती सत्ता से बाहर गईं तो उनके 80 विधायक जीते थे। 2017 के चुनाव में जब भाजपा 325 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ यूपी की सत्ता पर काबिज हुई तब बसपा के केवल 19 विधायक जीते। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा यूपी में केवल एक विधायकों तक सिमट गई।