पहलाज निहलानी:सिनेमा जगत का एक बेबाक चेहरा हुआ खामोश

Pahlaj Nihalani: An outspoken face of the film industry silenced

सत्य भूषण शर्मा

भारतीय फिल्म उद्योग से जुड़ी एक दुखद खबर ने सिनेमा प्रेमियों को भावुक कर दिया। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सी बी एफ सी) के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध फिल्म निर्माता पहलाज निहलानी का 4 जून 2026 को मुंबई में निधन हो गया। वे 76 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से लिवर संबंधी बीमारी से पीड़ित थे। उनके निधन से बॉलीवुड जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

पहलाज निहलानी केवल एक सफल निर्माता ही नहीं, बल्कि अपने स्पष्ट विचारों, साहसी निर्णयों और बेबाक व्यक्तित्व के कारण भी लंबे समय तक चर्चा में रहे। उनके निधन के साथ हिंदी सिनेमा का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया जिसने फिल्म उद्योग और सेंसर व्यवस्था दोनों को गहराई से प्रभावित किया।

पहलाज निहलानी ने भारतीय सिनेमा को अनेक सफल और लोकप्रिय फिल्में दीं। उन्होंने वर्ष 1982 में “हाथकड़ी” फिल्म से निर्माता के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद “इल्जाम”, “आग ही आग”, “पाप की दुनिया”, “गुनाहों का फैसला”, “मिट्टी और सोना”, “शोला और शबनम”, “आंखें”, “अंदाज” तथा “भाई भाई” जैसी फिल्मों का निर्माण किया। विशेष रूप से अभिनेता गोविंदा के साथ उनकी फिल्मों ने दर्शकों के दिलों में खास स्थान बनाया। “इल्जाम” फिल्म से उन्होंने गोविंदा को बड़ा अवसर दिया, जबकि “आग ही आग” के माध्यम से अभिनेता चंकी पांडे को पहचान मिली।

वर्ष 1993 में आई उनकी फिल्म “आंखें” उस दौर की सबसे बड़ी सुपरहिट फिल्मों में गिनी गई। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता अर्जित की और पहलाज निहलानी को व्यावसायिक रूप से अत्यंत सफल निर्माताओं की श्रेणी में स्थापित कर दिया। “शोला और शबनम” तथा “राजा बाबू” जैसी फिल्मों ने भी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया और लंबे समय तक लोकप्रिय बनी रहीं।

फिल्म उद्योग में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार भी प्राप्त हुए। वे लंबे समय तक “एसोसिएशन ऑफ पिक्चर्स एंड टीवी प्रोग्राम प्रोड्यूसर्स” के अध्यक्ष रहे। हिंदी फिल्म उद्योग में नए कलाकारों को अवसर देने तथा व्यावसायिक सिनेमा को नई दिशा प्रदान करने के लिए उन्हें अनेक फिल्म एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी उनका कार्यकाल अत्यंत चर्चित रहा। वर्ष 2015 में उन्हें सी बी एफ सी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने के बाद जब उन्हें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, तब वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं के केंद्र बन गए। उनके कार्यकाल में फिल्मों के कई दृश्यों और संवादों को लेकर विवाद सामने आए। उन्होंने फिल्मों में भारतीय संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक मर्यादाओं को बनाए रखने पर जोर दिया। हालांकि कई फिल्मकारों ने उनके निर्णयों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध के रूप में देखा, फिर भी उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी स्पष्टवादिता। वे किसी भी मुद्दे पर बिना लाग-लपेट अपनी बात रखते थे। चाहे फिल्म उद्योग की चुनौतियाँ हों या सामाजिक विषय, उन्होंने हमेशा खुलकर अपने विचार व्यक्त किए। यही कारण था कि वे मीडिया और जनचर्चाओं में लगातार बने रहते थे। कई बार उनके बयान विवादों का कारण भी बने, लेकिन उन्होंने कभी अपनी शैली नहीं बदली।

पहलाज निहलानी का जीवन संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल रहा। साधारण परिवेश से निकलकर उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग में अपनी मजबूत पहचान बनाई। उन्होंने यह सिद्ध किया कि निरंतर परिश्रम, आत्मविश्वास और काम के प्रति समर्पण व्यक्ति को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। वे सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला प्रभावशाली मंच मानते थे।

उनके निधन की खबर के बाद फिल्म जगत की अनेक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। अभिनेता गोविंदा, चंकी पांडे, अनुपम खेर, सुनील शेट्टी तथा अन्य कलाकारों ने उन्हें याद करते हुए भावुक शब्दों में श्रद्धांजलि दी। कई कलाकारों ने स्वीकार किया कि पहलाज निहलानी ने उनके करियर को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज जब भारतीय सिनेमा नए दौर और नई तकनीकों के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब पहलाज निहलानी जैसे व्यक्तित्व की यादें यह एहसास कराती हैं कि फिल्म जगत में विचारों और सिद्धांतों का भी उतना ही महत्व है जितना मनोरंजन का। वे भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में, उनके विचार और उनका योगदान लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेंगे।