डॉ. प्रियंका सौरभ
भारतीय समाज में माता-पिता को सर्वोच्च नैतिक स्थान प्राप्त है। उन्हें त्याग, तपस्या और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि माँ-बाप कभी गलत नहीं हो सकते। उनकी हर बात आदेश है, हर निर्णय अंतिम सत्य। लेकिन बदलते सामाजिक परिदृश्य में यह धारणा अब कई सवालों के घेरे में है। आज जब पारिवारिक विघटन, तलाक, अलगाव और घरेलू तनाव की घटनाएँ बढ़ रही हैं, तब यह जरूरी हो गया है कि हम ईमानदारी से यह स्वीकार करें—माँ-बाप भी हमेशा सही नहीं होते। आज अनेक परिवारों में टूटन का कारण केवल पति-पत्नी के बीच का मतभेद नहीं है, बल्कि उसके पीछे माता-पिता की भूमिका भी उतनी ही निर्णायक होती जा रही है। यह कहना कठोर लग सकता है, लेकिन सच्चाई यही है कि कई घरों में माता-पिता द्वारा किया गया पक्षपात, हस्तक्षेप और नियंत्रण रिश्तों को भीतर से खोखला कर रहा है।
सबसे पहले बात करते हैं भेदभाव की संस्कृति की। भारतीय परिवारों में यह कोई नई बात नहीं है कि बच्चों के बीच तुलना और पक्षपात होता रहा है। बड़ा बेटा “वारिस” माना जाता है, छोटा “समझौता” करता है, बेटी “पराया धन” होती है और बहू “बाहरी”। यही सोच जब व्यवहार में उतरती है, तो घर में स्थायी तनाव पैदा हो जाता है। माता-पिता अनजाने में या जानबूझकर एक बेटे के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, दूसरे को उपेक्षित कर देते हैं। बहू को हर विवाद की जड़ मान लिया जाता है, जबकि बेटी के दोष पर पर्दा डाल दिया जाता है। यह असमानता रिश्तों को धीरे-धीरे तोड़ देती है। विवाह के बाद बहू का स्थान आज भी कई घरों में संदिग्ध बना रहता है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह बिना सवाल किए हर परंपरा को स्वीकार करे, हर निर्णय माने और अपनी पहचान को त्याग दे। यदि वह अपने अधिकार, सम्मान या स्वतंत्रता की बात करती है, तो उसे “घर तोड़ने वाली” करार दे दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि कई बार घर पहले ही भीतर से टूट चुका होता है—सिर्फ दिखावा बचा होता है।
माता-पिता का अत्यधिक हस्तक्षेप भी आज पारिवारिक विघटन का बड़ा कारण बन रहा है। बेटे-बहू के निजी मामलों में दखल देना, छोटी-छोटी बातों को तूल देना, बहू की शिकायतों को नजरअंदाज करना और बेटे को भावनात्मक दबाव में रखना—ये सब स्थितियाँ विवाह को बोझ बना देती हैं। बेटा अक्सर दो पाटों के बीच फँस जाता है—एक ओर पत्नी, दूसरी ओर माता-पिता। और समाज उसे यही सिखाता है कि माता-पिता का साथ देना ही धर्म है, चाहे इसके लिए दांपत्य जीवन की बलि क्यों न देनी पड़े। यह भी देखने में आता है कि बेटी की शादी के बाद भी माता-पिता उसे अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। बेटी को बार-बार मायके बुलाकर, उसके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप कर, दामाद के खिलाफ राय बनाकर, वे अनजाने में बेटी का घर कमजोर कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि बेटी और दामाद के बीच अविश्वास पनपता है, और अंततः रिश्ता टूटने की कगार पर पहुँच जाता है।
एक और गंभीर पहलू है भावनात्मक ब्लैकमेल। “हमने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया”, “हमारे कारण तुम इस मुकाम पर हो”, “अगर हमारी बात नहीं मानी तो लोग क्या कहेंगे”—ऐसे वाक्य बच्चों को मानसिक रूप से जकड़ लेते हैं। वे अपनी खुशी, अपने रिश्ते और अपने सपनों की कीमत पर भी माता-पिता को खुश रखने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह दबा हुआ असंतोष किसी न किसी दिन विस्फोट बनकर सामने आता है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब समाज भी इस मानसिकता को बढ़ावा देता है। हर विवाद में सबसे पहले सवाल बहू से किया जाता है—“क्या किया तुमने?” बेटे को “मजबूर” मान लिया जाता है और माता-पिता को “पीड़ित”। इस सामूहिक पूर्वाग्रह के कारण सच्चाई कभी सामने नहीं आ पाती। जिन घरों में माता-पिता की भूमिका नकारात्मक होती है, वहाँ भी उन्हें प्रश्नों से ऊपर रखा जाता है।
यह कहना भी जरूरी है कि हर माता-पिता दोषी नहीं होते। असंख्य माता-पिता ऐसे हैं जो संतुलित, संवेदनशील और न्यायप्रिय होते हैं। वे बच्चों को स्वतंत्र निर्णय लेने देते हैं, बहू-दामाद को सम्मान देते हैं और संवाद को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन समस्या उन माता-पिता की है जो अपने अनुभव को अंतिम सत्य मान लेते हैं और बदलते समय को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। आज का युवा अलग सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में जी रहा है। उसके सामने करियर का दबाव है, आर्थिक असुरक्षा है, बदलते रिश्तों की चुनौतियाँ हैं। ऐसे में उसे सहयोग चाहिए, नियंत्रण नहीं। उसे समझ चाहिए, आदेश नहीं। माता-पिता यदि यह समझने में असफल रहते हैं, तो टकराव स्वाभाविक है। परिवार संस्था को बचाने के लिए सबसे जरूरी है आत्ममंथन। माता-पिता को यह स्वीकार करना होगा कि उम्र के साथ-साथ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी बढ़ती है। मार्गदर्शन और हस्तक्षेप में अंतर होता है। बच्चों की शादी का अर्थ यह नहीं कि वे हमेशा माता-पिता की इच्छाओं के अनुसार ही जिएँ। उन्हें अपनी गलतियों से सीखने का अवसर देना भी परवरिश का हिस्सा है।
साथ ही, बच्चों को भी यह समझना होगा कि संवाद ही समाधान है। टकराव, कटुता और अलगाव स्थायी समाधान नहीं हैं। लेकिन संवाद तभी संभव है जब माता-पिता भी सुनने को तैयार हों—बिना जजमेंट, बिना अहंकार।
आज जरूरत है कि हम “माँ-बाप हमेशा सही होते हैं” जैसी भावनात्मक लेकिन अव्यावहारिक धारणाओं से बाहर आएँ। सम्मान और प्रश्न एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। माता-पिता का सम्मान करते हुए भी उनकी भूमिका की समीक्षा की जा सकती है। यही स्वस्थ समाज की पहचान है।
घर टूटने का कारण कभी एक व्यक्ति नहीं होता। यह कई गलत फैसलों, दबे हुए दर्द और अनसुनी आवाज़ों का परिणाम होता है। यदि सच में हम परिवारों को टूटने से बचाना चाहते हैं, तो हमें साहस के साथ यह स्वीकार करना होगा कि कभी-कभी आईना माता-पिता को भी दिखाना पड़ता है। यही कड़वा सच आगे चलकर मीठे रिश्तों की नींव बन सकता है।





