संजय एम तराणेकर
छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में मालती अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। पास में खड़ी रोशनी दीदी उसे समझा रही थीं, “डरने की बात नहीं है, समय पर इलाज मिल जाए तो सब ठीक हो जाएगा।” यहाँ गाँव में पहले अस्पताल दूर था और इलाज एक सपना जैसा लगता था। लेकिन अब पास ही एक नया स्वास्थ्य केंद्र बन गया था। एम्बुलेंस की आवाज़ सुनते ही लोगों के चेहरे पर उम्मीद झलकने लगी थी।
उधर, गाँव के संतराम काका, जो पहले धुएँ और खाँसी से परेशान रहते थे, अब नियमित जांच के लिए जाते थे। डॉक्टर ने उन्हें समझाया था—“सिर्फ दवा नहीं, सावधानी भी जरूरी है।” धीरे-धीरे गाँव में बदलाव दिखने लगा। बच्चे टीकाकरण के लिए आने लगे, महिलाएँ पोषण की बातें समझने लगीं, और बुजुर्ग समय पर इलाज करवाने लगे।
एक दिन मालती मुस्कुराते हुए बोली, “पहले लगता था बीमारी ही किस्मत है, पर अब समझ आया—इलाज भी हमारा हक है।” गाँव के चौपाल पर बैठे लोग सहमति में सिर हिलाने लगे। सच ही तो था—जब हर घर में सेहत होगी, तभी हर गाँव में उजाला होगा।





