क्या यह अमेरिका का ‘आर्थिक आतंकवाद’ है

Is this America's 'economic terrorism'?

प्रदीप शर्मा

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आदेश पर अमरीकी नौसेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग की नाकेबंदी शुरू कर दी है। ईरान की बंदरगाहों पर पाबंदियां लागू कर दी गई हैं। जो जहाज ईरान को ‘टोल’ देकर गुजरते रहे हैं, अमरीका उन पर भी नाकेबंदी करेगा। उन जहाजों को भी रोका जाएगा और जांच होगी। युद्ध का नया आयाम खुल गया है। क्या अब ईरान के प्रतिरोध पर ‘समुद्री युद्ध’ का आगाज हो सकता है? चूंकि ईरान 90 फीसदी कच्चा तेल चीन को निर्यात करता रहा है, लिहाजा चीन की चेतावनी सामने आई है कि ईरान के साथ उसका समझौता है, लिहाजा उसमें हस्तक्षेप न करें। इस मुद्दे पर चीन के साथ रूस भी है। क्या अब चीन-रूस बनाम अमरीका का नया टकराव सामने आ सकता है? हम स्पष्ट कर दें कि विश्व युद्ध के कोई आसार नहीं हैं, जो सनसनी कुछ टीवी चैनल फैला रहे हैं। बहरहाल अमरीका और ईरान नाकेबंदी के जरिए जो कुछ कर रहे हैं, वह निश्चित रूप से ‘आर्थिक आतंकवाद’ है। यदि एशिया महाद्वीप की ही बात करें, भारत-चीन-जापान जिसका हिस्सा हैं, उसकी करीब 389 करोड़ आबादी तेल-गैस और अन्य सामान से वंचित है। तेल रुकने से 59 फीसदी वैश्विक महंगाई बढ़ गई है।
होर्मुज से 3 अरब बैरल तेल औसतन हररोज गुजरता था। खाने-पीने की चीजें, उर्वरक आदि के गंभीर संकट पैदा होते जा रहे हैं। भारत भी 35-40 फीसदी कच्चा तेल होर्मुज के रास्ते ही आयात करता था। भारत सरकार के पास मात्र 9.5 दिन के तेल का रणनीतिक भंडार है, शेष 64.5 दिनों के भंडारण तेल कंपनियों के पास हैं। भारत की आबादी के मद्देनजर यह तेल ‘ऊंट के मुंह में जीरे’ समान है। ईरान युद्ध और अब होर्मुज की नाकेबंदी के प्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय उद्योग पर भी दिखने लगे हैं। मसलन-राजस्थान के मेंहदी कारोबार का 300 करोड़ रुपए का सामान ठप पड़ा है। उसका सामान खाड़ी देशों को जाता था। वे सभी युद्ध से त्रस्त और ध्वस्त हैं। इसके अलावा, कांच की चूडिय़ों का कारोबार, सिरेमिक टाइल्स, प्लास्टिक के उद्योग और खाद की कमी से खेती आदि पर घोर संकट हैं। सरकार कुछ भी दावे करे या सहानुभूति व्यक्त करे, लेकिन देश में 22 अरब रुपए का नुकसान हो चुका है। करीब 5.5 लाख रेस्तरां, छोटे होटल या तो बंद हो चुके हैं अथवा तालाबंदी के कगार पर हैं।

श्रमिक पलायन कर अपने गांव लौट रहे हैं अथवा नोएडा, हरियाणा की कुछ कंपनियों के बाहर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। वाहन भी फूंक दिए गए। इस ‘आर्थिक आपातकाल’ में कंपनियां भी मजदूरों को पर्याप्त मेहनताना कैसे दें, क्योंकि उनके उत्पाद भी बेकार पड़े हैं। निर्यात संभव नहीं हैं। भारत खाड़ी देशों को 19 लाख करोड़ रुपए का सालाना निर्यात करता है। यह कोई सामान्य राशि नहीं है। भारत ने एक बार फिर रूस से 19.75 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है। यह 2025 जितना ही है। हालांकि अमरीका की घुडक़ी और टैरिफ के भय के कारण भारत ने यह खरीद 6 लाख बैरल तक घटा दी थी। इसी तरह 2019 से ईरान से तेल लेना भी बंद कर दिया था। अब मौजूदा दौर में ईरानी तेल के दो टैंकर (20-20 लाख बैरल) भी भारतीय तटों पर आए हैं। अब हम अमरीका, अल्जीरिया, अंगोला, ओमान आदि देशों से भी कच्चा तेल आयात करने को विवश हैं।

भारत की विदेश नीति, तेल आयात नीति और भंडारण की नीति सवालिया हैं। दरअसल हम कुआं खोदना तब शुरू करते हैं, जब आग धधकने लगती है। तेल का भंडारण आज भी उतना ही है, जितना 2014 में था, जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे। चीन में 110-140 दिन का भंडारण है और जापान 254 दिन के तेल का भंडारण रखता है। बहरहाल अब अमरीका और ईरान जो नाकेबंदियां कर रहे हैं, युद्धपोत, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, मिसाइल, ड्रोन और बारूदी सुरंगें जिस तरह तैनात हैं, उन्हें शेष दुनिया की चिंता भर भी नहीं है। फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन सरीखे सहयोगी देशों ने राष्ट्रपति ट्रम्प की नाकेबंदी का विरोध किया है। वे अपने ‘शांति मिशन’ पर अलग से विचार कर रहे हैं। अमरीका के निशाने पर ईरान के साथ-साथ चीन भी है, जिसकी तेल-आपूर्ति पर भी पहरेदारियां बिठा दी गई हैं। कुल मिला कर ये हरकतें ‘आर्थिक आतंकवाद’ नहीं हैं, तो क्या हैं?