राजेश त्रिपाठी
रविवार की वह ढलती हुई शाम भारतीय संगीत के इतिहास में एक उदास सन्नाटा छोड़ गई, जब सुरों की एक बेहद खामोश और निष्काम साधिका ने इस नश्वर संसार से विदा ले ली। 89 वर्ष की उम्र में, जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी सुरों से उनका नाता नहीं टूटा। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वे अपने आखिरी क्षणों में बहुत शांति से अपने ही गाए हुए पुराने गीतों को सुन रही थीं। कितनी अलौकिक और सुरीली रही होगी वह अंतिम विदाई, जहाँ एक फनकार खुद अपने ही सुरों की उँगली थामकर अनंत की यात्रा पर निकल गया। वर्ष 2023 में देश के प्रतिष्ठित ‘पद्म भूषण’ सम्मान से नवाज़ी गईं सुमन कल्याणपुर (कल्याणपुरकर) का जाना संगीत के उस सुनहरे दौर के आखिरी झरोखों में से एक का हमेशा के लिए बंद हो जाना है।
मुंबई की एक अनमोल शाम को सुमन जी से मिलकर उनसे लंबी बात करने और उनका इंटरव्यू करने का सौभाग्य मुझे मिला था। उस मुलाक़ात में जो सादगी, मर्यादा और निश्छल ठहराव उनकी बातों में दिखा, वही ठहराव ताउम्र उनके सुरों की तासीर बना रहा।
बचपन की थाप:
पेंटिंग के कैनवास से सुरों के आकाश तक
28 जनवरी 1937 को ढाका (अब बांग्लादेश) में जन्मी सुमन हेमाड़ी (विवाह के बाद सुमन कल्याणपुर) का बचपन मुंबई के कलात्मक परिवेश में बीता। उनके पिता सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में एक शीर्ष पद पर थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि सुमन जी बचपन में गायिका नहीं, बल्कि एक चित्रकार बनना चाहती थीं। अपनी इसी चाहत के चलते उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित ‘सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला भी लिया था।
लेकिन विधाता को उनकी उंगलियों के ब्रश से ज़्यादा उनकी आवाज़ के कैनवास पर सात रंगों को बिखेरना था। कॉलेज के दूसरे ही साल उन्हें तारपीन से एलर्जी हो गई और मजबूरी में पेंटिंग छोड़नी पड़ी। तभी उनके पड़ोसी और पिता के पारखी दोस्त पंडित केशव राव भोले ने उनके भीतर छिपे सुरों को पहचाना और उनके पिता को उन्हें संगीत सिखाने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने उस्ताद खान, अब्दुल रहमान खान और गुरुजी मास्टर नवरंग जैसे दिग्गजों से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली और अपनी गायकी को निखारा।
रेडियो से फिल्मों तक
उन दिनों घर की लड़कियों को सार्वजनिक रूप से गाने की अनुमति नहीं होती थी। लेकिन जब ऑल इंडिया रेडियो, बॉम्बे के संगीत निर्माता पंडित केशव राव भोले ने उन्हें रेडियो पर गाने का अवसर दिया, तो परिवार भी मना नहीं कर सका।
यही वह क्षण था जब पहली बार उनकी आवाज़ घर की चारदीवारी से निकलकर लाखों कानों तक पहुँची।
1953 की मराठी फिल्म शुक्राची चांदनी ने उनके लिए फिल्मी दुनिया के दरवाजे खोले। निर्देशक शेख मुख्तार उनकी आवाज़ से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी फिल्म मंगू के लिए उन्हें चुन लिया।
1954 में फिल्म मंगू के गीत कोई पुकारे धीरे से तुझे के साथ हिंदी फिल्मों में उनका सफर शुरू हुआ। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह मधुर आवाज़ आने वाले वर्षों में भारतीय संगीत की अमूल्य धरोहर बन जाएगी।
वह ‘खूबसूरत अभिशाप’ और बारीक अंतर
क्या ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे’ या मशहूर मराठी लोरी ‘निंबोणिच्या झाडामागे’ लता मंगेशकर ने गाया है? अगर आपका जवाब हाँ है, तो आप भी देश के उन करोड़ों संगीत प्रेमियों की तरह भ्रमित हैं जो सुमन जी और लता जी की आवाज़ में फर्क नहीं कर पाते थे। लता जी की आवाज़ से यह अत्यधिक प्राकृतिक समानता ही सुमन जी के करियर के लिए एक ‘खूबसूरत अभिशाप’ बन गई।”
1954 में फिल्म ‘मंगू’ से सफर शुरू करने वाली सुमन जी की आवाज़ में वही महीनता, पाकीज़गी और हरकतें थीं जो लता जी की पहचान थीं। इसी समानता के कारण शुरुआती दौर में उन्हें काम तो मिला, लेकिन बाद में इंडस्ट्री उन्हें लता जी की ‘परछाई’ या ‘किफायती विकल्प’ के रूप में देखने लगी। यह उस महान फनकार के साथ नाइंसाफी थी जिसका खुद का एक समृद्ध और मौलिक आधार था।
जब 1962 में संगीतकार एस. डी. बर्मन ने फिल्म ‘बात एक रात की’ का कालजयी गीत “ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हें जानें” तैयार किया, तो वे लता जी से एक विवाद के कारण बात नहीं कर रहे थे। उन्होंने इस बेहद नाजुक धुन के लिए सुमन जी को चुना। जब यह गाना रेडियो पर गूँजा, तो लता जी के घोर प्रशंसक भी धोखा खा गए। रिकॉर्डिंग के बाद आर. डी. बर्मन (पंचम) ने खड़े होकर तालियाँ बजाई थीं और सुमन जी से कहा था कि बिना किसी आत्म-चेतना के गाई गई उनकी यह गायकी बिल्कुल मुकम्मल थी।
जब लोग इस समानता पर बात करते, तो सुमन जी बिना किसी कड़वाहट के मुस्कुराकर कहती थीं यह सच है कि हमारी आवाज़ों में लोगों को समानता लगती है। लेकिन जो संगीत को गहराई से समझता है, वह बारीक अंतर को आसानी से पकड़ सकता है। मैंने कभी किसी की नकल नहीं की, मुझे अपनी मौलिक शैली पर भरोसा था और मैंने हर गाने को पूरी सच्चाई से गाया।
‘रफ़ी-लता विवाद’ और सफलता का वह सुनहरा दौर
1960 के दशक के मध्य में जब रॉयल्टी के मुद्दे को लेकर मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के बीच अनबन हुई और दोनों ने साथ गाने से मना कर दिया, तब फिल्म इंडस्ट्री के सामने एक बड़ा शून्य आ गया था। ऐसे में संगीतकारों की पहली पसंद सुमन कल्याणपुर बनीं। रफ़ी साहब के मर्मस्पर्शी, नरम और सहयोगात्मक स्वभाव के साथ सुमन जी के सुरों ने वो जादू बिखेरा जो आज भी हर महफ़िल की जान है:
ना ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे (जब जब फूल खिले, संगीत: कल्याणजी-आनंदजी)
तुमने पुकारा और हम चले आए (राजकुमार, संगीत: शंकर-जयकिशन)
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर (ब्रह्मचारी, संगीत: शंकर-जयकिशन)
रफ़ी साहब के साथ उनकी जोड़ी इतनी हिट हुई कि कुछ निर्माता उन्हें अपने लिए बेहद लकी मानने लगे थे। आलम यह था कि फिल्मों के मुहूर्त भी सुमन जी के हाथों या उनके गानों से कराए जाते थे, जिसे एक अच्छा शगुन माना जाता था।
दो सहेलियों का रिश्ता: कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं, बस अपनापन था
दुनिया भले ही दोनों समकालीन गायिकाओं के बीच कॉम्पिटिशन या प्रतिद्वंद्विता की कहानियाँ बुनती रही, लेकिन सुमन जी के दिल में लता दीदी के लिए केवल आदर था। सुमन जी का ससुराल मंगेशकर परिवार के बेहद करीब था। लता जी के अवसान पर गहरी शून्यता महसूस करते हुए सुमन जी ने अपने संस्मरण साझा किए थे:
मैं लता दीदी से जीवन में भले ही 4-5 बार ही मिली, लेकिन जब भी मिलीं, हम एक-दूसरे का हाथ पकड़कर बातें करते थे। ऐसा लगता था जैसे अरसे बाद दो सहेलियां मिल रही हों। पहली बार हम ‘मंगू’ की रिकॉर्डिंग पर मिले थे, तब उन्होंने चलते-चलते मुझसे कहा था कि मैं बहुत अच्छा गाती हूँ। एक बार मेरी रिकॉर्डिंग के बाद उन्होंने मुझे अपनी कार से घर भी छोड़ा था। हमारे बीच एक अजीब सा रूहानी अपनापन था।
महान गायक हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में इन दोनों महागायिकाओं ने एक अनूठा और इकलौता युगल गीत गाया था “चाँद के लिए। उस समय हेमंत दा ने सुमन जी को एक बेहद कीमती सलाह दी थी, अपनी ओरिजिनलिटी (मौलिकता) पर टिकी रहना, लता को फॉलो मत करना और अपनी पिच को एक तय सीमा से ऊपर मत ले जाना।
हर विधा, हर भाषा में छोड़ी अमिट छाप
सुमन कल्याणपुर की प्रतिभा किसी एक दायरे में सिमटी नहीं थी। उन्होंने मुकेश के साथ चुरा ले ना तुमको ये मौसम सुहाना (दिल ही तो है) और मेरा प्यार भी तू है ये बहार भी तू है (साथी) जैसे गीतों में असीम तड़प और रूमानियत को आवाज़ दी, तो वहीं संगीत के शहंशाह नौशाद और मदन मोहन के निर्देशन में भी बेजोड़ शास्त्रीय नियंत्रण दिखाया। जयकिशन के संगीत में गाया उनका सोलो गीत “चले जा जहाँ प्यार मिले” आज भी एक बहते हुए झरने जैसा अहसास कराता है। बचपन में आर. सी. बोराल, के. एल. सहगल और कानन देवी से प्रभावित सुमन जी ने जब अपने पसंदीदा गायक तलत महमूद के साथ फिल्म ‘दरवाजा’ में गाया, तो तलत साहब ने उनकी रेशमी आवाज़ सुनकर उनके उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणी कर दी थी।
हिंदी के अलावा सुमन जी ने बंगाली, मराठी, असमिया, गुजराती, कन्नड़ और ओड़िया जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में सैकड़ों यादगार गीत गाए। जब उन्होंने बंगाली गीत “आमार स्वप्नो देखार दुटी नयन” गाया, तो उनकी आँखों में सचमुच आँसू थे; इस गाने को सुनकर बंगाल की स्वर-कोकिला संध्या मुखर्जी भी उनकी मुरीद हो गई थीं। वहीं, महिला गायिकाओं के साथ गाए उनके लोकगीत जैसे कमल बारोट के साथ “गरजत बरसत सावन आयो री” (बरसात की रात) या गीता दत्त के साथ “फुलवा बंद महके” आज भी संगीत प्रेमियों के लिए एक धरोहर हैं।
मर्यादा की प्रतिमूर्ति और संगीत को अंतिम सलाम
जब उनसे इंटरव्यू के दौरान नए दौर के संगीत के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बहुत सकारात्मकता से कहा था, “मैं आज का संगीत भी सुनती हूँ। जिस भी गाने के बोल और धुन सुमधुर हों, मुझे वो सुनना पसंद है।
वे एक ऐसी संजीदा और स्वाभिमानी कलाकार थीं जिन्होंने पैसों, रॉयल्टी या नंबर वन की अंधी दौड़ से खुद को हमेशा दूर रखा। जब उनसे रॉयल्टी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बड़ी सरलता से कहा, “मैं तो उस समय नई थी, मुझे प्रति गाना मेहनताना मिल जाता था। नए गायकों के लिए तब रॉयल्टी की बात करना मुमकिन नहीं था।” उन्होंने हमेशा गानों के चयन में इस बात का ख्याल रखा कि उनकी कला से उनके परिवार को कभी कोई असहजता न हो।
सुरों के इतिहास ने भले ही सुमन कल्याणपुरकर को मुख्यधारा की चकाचौंध में वह पहला स्थान न दिया हो, जिसकी उनकी प्रतिभा हकदार थी, लेकिन संगीत के सच्चे पारखी जानते हैं कि उनकी तान, हरकतें और मुर्कियाँ किसी भी मायने में कमतर नहीं थीं। वे किसी महान वृक्ष की परछाई बनकर नहीं जीती रहीं, बल्कि वे उस सुनहरे दौर के आसमान में अपनी ही धवल और शांत रोशनी से चमकने वाला एक मुकम्मल चाँद थीं। आज वे अपनी बेटी चारू और करोड़ों प्रशंसकों को छोड़कर सुरों के महाआकाश में विलीन हो गई हैं, लेकिन उनकी आवाज़ की सोंधी खुशबू इस फिज़ा में हमेशा साँस लेती रहेगी।





