छात्रों पर बर्बरता की जिम्मेदारी कौन लेगा?

Who will take responsibility for the brutality against the students?

दिलीप कुमार पाठक

लोकतंत्र में अपनी असहमति और असंतोष की आवाज उठाना नागरिकों का सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार है। जब देश के युवा और पढ़े-लिखे छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो वे किसी दंगे, उपद्रव या, अशांति के इरादे से नहीं, बल्कि अपने भविष्य, अधिकारों और न्याय की वाजिब मांग के लिए आते हैं। लेकिन हाल ही में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान जो कुछ देखने को मिला, उसने देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने, पुलिसिया कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था के बड़े-बड़े दावों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने जो कार्रवाई की, वह क्या केवल भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास था या फिर यह बर्बरता की आखिरी हद थी? छात्रों का यह मार्च अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाने के लिए शुरू हुआ था। लेकिन जैसे ही यह मार्च आगे बढ़ा, दिल्ली पुलिस ने इसे रोकने के लिए बेहद आक्रामक रुख अपनाया। पुलिस प्रशासन का दावा है कि प्रदर्शनकारियों ने कानून हाथ में लिया, बैरिकेड्स तोड़े और सुरक्षाबलों पर हमला किया, जिसमें कई जवान घायल हुए। लेकिन सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया रिपोर्ट्स में दिख रहे वीडियो फुटेज कुछ और ही इशारा करते हैं। वीडियो में जब छात्र शांति से खड़े दिखाई दे रहे हैं, तो फिर उन पर अचानक लाठीचार्ज, पानी की तेज बौछारें और आंसू गैस के गोले दागने की नौबत क्यों आई? इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू प्रदर्शन को दबाने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल किए जाने के आरोप हैं। दिल्ली पुलिस इन दावों को पूरी तरह खारिज कर रही है, लेकिन सफदरजंग अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट ने इन आरोपों को बेहद गंभीर बना दिया है।

इसके बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा मीडिया के सामने लाए गए 19 साल के घायल छात्र साहिल लोहचब के शरीर पर मौजूद छर्रों के गहरे निशान और उसकी एक आंख की रोशनी चले जाने की विचलित करने वाली तस्वीरें क्या बयां करती हैं? क्या हाथ में तिरंगा लेकर मार्च कर रहे छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य हो सकता है? कई अन्य छात्रों के सिर, चेहरे और पीठ पर आईं गंभीर चोटें क्या पुलिस मैनुअल और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं हैं? इस घटना के बाद पुलिसिया कार्यप्रणाली पर एक और गंभीर सवाल खड़ा हुआ है। भीड़ के बीच सादे कपड़ों में मौजूद जो लोग छात्रों को पीट रहे थे, वे कौन थे? इस बर्बरता का वीडियो वायरल होने के बाद खुद दिल्ली पुलिस प्रशासन को एक आधिकारिक आदेश जारी करना पड़ा कि कानून-व्यवस्था की ड्यूटी पर तैनात सभी जवान अनिवार्य रूप से केवल अपनी आधिकारिक यूनिफॉर्म में ही रहेंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि बिना वर्दी के इन छात्रों को पीटने की छूट किसने दी थी? आमतौर पर जमीन पर ऐसी कार्रवाई का आदेश स्थानीय प्रशासन या डीसीपी देते हैं। लेकिन चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है, इसलिए यह बहस तेज हो गई है कि क्या इतने बड़े मार्च को रोकने के लिए यह पुलिस का अपना तात्कालिक फैसला था या इसके पीछे उच्च स्तर से मिला कोई निर्देश था? इस पूरे मामले की एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी क्यों जरूरी नहीं है, ताकि सच सबके सामने आ सके कि आखिर इतनी क्रूरता की नौबत क्यों आई और इसकी असल जवाबदेही किस स्तर पर तय होती है?

लोकतंत्र में किसी भी समस्या का समाधान बल प्रयोग कैसे हो सकता है, जबकि असली रास्ता हमेशा संवाद होना चाहिए? कलम पकड़ने वाले युवाओं और व्यवस्था के बीच इस तरह के टकराव की तह तक जाना अनिवार्य है। इसी सत्यता का संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब तलब किया है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को घटना से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखने का भी सख्त निर्देश दिया है। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अब यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत की इस निगरानी में पूरी घटना का सच सामने आएगा। इंसाफ के इस सफर में अब देश के युवाओं और सजग नागरिकों की नजरें न्यायपालिका के रुख पर टिकी हैं कि क्या कलम पकड़ने वाले हाथों को न्याय मिल पाएगा?