क्या नए राजनीतिक युग की शुरुआत करेंगे अन्नामलाई?

Will Annamalai usher in a new political era?

महेन्द्र तिवारी

तमिलनाडु की राजनीतिक भूमि हमेशा से भारतीय राजनीति के मानचित्र पर अपनी एक विशिष्ट और पृथक पहचान बनाए हुए है। देश के अन्य राज्यों के विपरीत यहाँ राष्ट्रीय विचारधारा वाले दलों की तुलना में क्षेत्रीय अस्मिता और क्षेत्रीय संगठनों का प्रभाव कहीं अधिक गहरा रहा है। बीते अनेक दशकों से द्रविड़ आंदोलन की कोख से निकली राजनीति ने ही इस राज्य की सत्ता की दिशा और दशा को पूरी तरह नियंत्रित और संचालित किया है। ऐसे सुदृढ़ और पारंपरिक राजनीतिक परिवेश में जब कोई नया चेहरा अत्यंत तीव्रता के साथ उभरता है, तो उसकी छोटी से छोटी गतिविधि भी राजनीतिक गलियारों में गहरी हलचल और विमर्श का कारण बन जाती है। इस समय तमिलनाडु के राजनीतिक आकाश में जिस एक नाम को लेकर सबसे अधिक चर्चाएं और कयास लगाए जा रहे हैं, वे हैं भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई। पिछले कुछ समय से राज्य के समाचारों और राजनीतिक चर्चाओं में इस बात ने अत्यधिक जोर पकड़ लिया है कि वे अपने वर्तमान दल से नाता तोड़कर एक नए क्षेत्रीय राजनीतिक दल का गठन कर सकते हैं। यद्यपि उन्होंने अभी तक इस विषय में कोई आधिकारिक या स्पष्ट घोषणा नहीं की है, परंतु उनके हालिया वक्तव्य, उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए विज्ञापन पत्र, महत्वपूर्ण बैठकों से उनकी दूरी और जमीनी स्तर पर चल रही संगठनात्मक गतिविधियों ने राज्य की राजनीति को एक नए विमर्श की ओर मोड़ दिया है।

इस नए राजनीतिक घटनाक्रम की सुगबुगाहट तब और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी जब कोयंबटूर शहर में अचानक कई प्रमुख स्थानों पर उनके समर्थकों द्वारा बड़े-बड़े विज्ञापन पत्र लगाए गए। सामान्य राजनीतिक विज्ञापनों से सर्वथा भिन्न इन पत्रों पर अंकित संदेश ने सभी का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें लिखा था कि निडर सोच की कोई सीमा नहीं होती। इस वाक्य को राजनीतिक विश्लेषकों और जनता द्वारा एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा गया। इसके तुरंत बाद जनसंचार के आधुनिक माध्यमों और मुख्यधारा की राजनीति में यह बात तेजी से फैल गई कि वे किसी नए और स्वतंत्र राजनीतिक मंच की आधारशिला रखने की तैयारी कर रहे हैं। उनके इस संभावित कदम को तब और बल मिला जब उनके प्रशंसकों और समर्थकों के संगठन, जिसका नाम अन्नामलाई अन्बू कूट्टम है, उसने अचानक अपनी गतिविधियों को तेज करते हुए नए सदस्यों और पदाधिकारियों को जोड़ना आरंभ कर दिया। इसके साथ ही भीतरखाने से यह समाचार भी आ रहे हैं कि मक्कल शक्ति इयक्कम नाम से एक विशाल जनआंदोलन या सामाजिक संगठन की रूपरेखा तैयार की जा रही है, जो आने वाले समय में एक पूर्ण राजनीतिक दल का रूप धारण कर सकता है।

के. अन्नामलाई की पूर्व पृष्ठभूमि और उनकी अब तक की राजनीतिक यात्रा भी अत्यंत रोचक और असाधारण रही है। वे भारतीय पुलिस सेवा के एक प्रतिष्ठित अधिकारी रहे हैं और प्रशासनिक सेवा में रहते हुए अपनी कर्तव्यनिष्ठ तथा सख्त छवि के कारण वे आम जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुए थे। अपनी सेवा से त्यागपत्र देकर राजनीति के मैदान में उतरने के बाद उन्होंने अपने दल को तमिलनाडु में एक नई ऊर्जा और आक्रामकता प्रदान करने का अथक प्रयास किया। उनकी इसी कार्यशैली को देखते हुए वर्ष 2021 में उन्हें तमिलनाडु में दल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। बहुत ही अल्प समय में वे राज्य की राजनीति का एक अपरिहार्य और चर्चित चेहरा बनकर उभरे। उनकी संवाद शैली अत्यंत सीधी और सीधे प्रहार करने वाली रही है, जिसके कारण उन्होंने वर्तमान द्रमुक सरकार की नीतियों पर लगातार तीखे हमले किए और अपने दल को राज्य में एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की पुरजोर कोशिश की। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में यद्यपि उनका दल राज्य में कोई भी निर्वाचन क्षेत्र जीतने में सफल नहीं हो सका, परंतु उनके नेतृत्व में दल का मत प्रतिशत पहली बार दो अंकों तक पहुंचने में कामयाब रहा, जिसे राज्य की राजनीति में एक बड़ी घटना माना गया। इस सफलता का श्रेय मुख्य रूप से उनकी जनसभाओं और उनके द्वारा आयोजित की गई एन मन्न, एन मक्कल नामक व्यापक यात्रा को दिया गया, जिसने उन्हें युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया।

परंतु इस तीव्र गति से मिलती सफलता के साथ ही उनके राजनीतिक जीवन में विवाद भी गहरे होते चले गए। उनकी कई आक्रामक टिप्पणियों के कारण उनके दल और उसकी पुरानी सहयोगी संगठन अन्नाद्रमुक के बीच के पारंपरिक संबंध पूरी तरह बिखर गए। उन्होंने द्रविड़ राजनीति के स्तंभ माने जाने वाले पूर्व नेताओं जैसे अन्नादुरई और जयललिता पर कुछ ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन्हें अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने अपने नेताओं का घोर अपमान माना। इसके परिणामस्वरूप दोनों दलों के बीच कटुता इस सीमा तक बढ़ गई कि उनका गठबंधन टूट गया। राजनीतिक क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि केंद्रीय नेतृत्व ने भविष्य के गठबंधनों को बचाने और राजनीतिक संतुलन बहाल करने के लिए उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के पद से मुक्त करने का निर्णय लिया। इसी क्रम में वर्ष 2025 में उनके स्थान पर नैनार नागेंद्रन को तमिलनाडु में दल की कमान सौंपी गई। पद से हटाए जाने के बाद भी उनके प्रति निष्ठा रखने वाले समर्थकों और युवाओं की संख्या में कोई कमी नहीं आई, बल्कि उनके समर्थकों ने इसे उनकी राजनीतिक स्वतंत्रता के एक नए अध्याय के रूप में देखा। यही कारण है कि जब हाल के दिनों में उन्होंने दल की दो अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य केंद्रीय समिति की बैठकों से पूरी तरह दूरी बना ली, तो उनके अलग रास्ते पर जाने की अटकलों को अत्यधिक हवा मिली।

हाल ही में जब वे चेन्नई हवाई अड्डे से देश की राजधानी दिल्ली के लिए प्रस्थान कर रहे थे, तब उपस्थित संवाददाताओं ने उनसे एक नए दल के गठन की संभावनाओं पर सीधा प्रश्न पूछा। इस पर उन्होंने इस संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया, बल्कि रहस्यमयी ढंग से यह कहा कि वे आगामी 2 दिनों में इस विषय पर बैठकर विस्तार से बात करेंगे। राजनीति की भाषा में किसी भी संभावना से पूरी तरह इनकार न करना इस बात का प्रमाण माना जाता है कि पृष्ठभूमि में कोई बड़ा वैचारिक मंथन चल रहा है। इस वक्तव्य के अतिरिक्त उनके इस नए रास्ते के चयन के पीछे केंद्र सरकार की नई भाषा नीति का विवाद भी एक बहुत बड़ा और तात्कालिक कारण बनकर उभरा है। पिछले ही सप्ताह उन्होंने केंद्र सरकार की उस अधिसूचना का प्रखर विरोध किया जिसमें कक्षा 9 से तीन भाषाओं के अध्ययन को अनिवार्य बनाने का प्रावधान किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि इतनी अल्प अवधि में विद्यार्थियों पर नई भाषा का बोझ डालना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। तमिलनाडु की धरती पर भाषा का प्रश्न हमेशा से ही अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा रहा है, जहाँ वर्ष 1960 के दशक में हुए विशाल हिंदी विरोधी आंदोलनों ने राज्य की पूरी राजनीतिक सत्ता को पलट कर रख दिया था। ऐसे संवेदनशील माहौल में अपने ही दल की केंद्र सरकार के निर्णय के विरुद्ध खड़े होना यह साफ दर्शाता है कि वे अब तमिल पहचान और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं।

वर्तमान समय में तमिलनाडु की राजनीति एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है जहाँ द्रमुक सत्तासीन है, परंतु विपक्ष बिखराव की स्थिति में है। अन्नाद्रमुक अपने पुराने वैभव और संगठनात्मक शक्ति को खोती हुई दिखाई दे रही है, जबकि दूसरी ओर प्रसिद्ध अभिनेता विजय का नया दल अपने शानदार चुनावी प्रदर्शन के कारण युवाओं के बीच तेजी से मुख्य विकल्प के रूप में उभर रहा है। ऐसे बहुकोणीय और अस्थिर माहौल में यदि के. अन्नामलाई एक नए राजनीतिक दल के रूप में कदम रखते हैं, तो राज्य के सभी चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे। उनके पास आधुनिक सूचना तंत्रों और धरातल पर शिक्षित मध्यमवर्ग तथा युवाओं का एक बहुत बड़ा और निष्ठावान आधार है, जो पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से इतर एक साफ-सुथरी, प्रशासनिक और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का विकल्प चाहते हैं। यद्यपि तमिलनाडु जैसे सुदृढ़ संगठनात्मक ढांचे वाले राज्य में बिना किसी मजबूत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के नया दल बनाना और उसे स्थापित करना कोई सुगम कार्य नहीं होगा क्योंकि यहाँ पहले से ही अनेक छोटे-बड़े क्षेत्रीय दल अपनी जमीन तलाश रहे हैं। ऐसी स्थिति में विश्लेषकों का अनुमान है कि वे सीधे दल बनाने के बजाय पहले एक व्यापक जनआंदोलन की शुरुआत कर सकते हैं जो अंततः एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष क्षेत्रीय दल का स्वरूप ले सके। उनके इस कदम का सबसे बड़ा आघात उनके पुराने दल पर लगेगा जिसने उनके चेहरे के बल पर राज्य में अपना विस्तार किया था। आने वाले कुछ दिन निश्चित रूप से इस बात का निर्धारण करेंगे कि तमिलनाडु का राजनीतिक भविष्य किस करवट बैठने वाला है।