दबाई गई चीखों की कहानियां – सूखे सावन

Stories of Suppressed Screams - Sukhe Sawan

सुनील सक्‍सेना

ऐसा कहा जाता है कि किसी भी भाषा के साहित्‍य की समृद्धि के लिए ये जरूरी है कि दूसरी भाषाओं में क्‍या लिखा जा रहा है, क्‍या पढ़ा जा रहा है इस पर रचनाकारों की निगाह रहे । एक लेखक के नाते ये जरूरी है कि उसकी अन्‍य भाषाओं के गलियारों में आवाजाही बने रहे ।

मुरकामी भी कहते हैं कि अगर आप वही पढ़ रहे हैं जो सब पढ़ते हैं तो आप सिर्फ उतना ही सोच पाएंगे जितना सब सोच रहे हैं या जैसा सोच रहे हैं । तो “समथिंग डिफ्रेंट” रचने के लिए, गढ़ने के लिए हमें अपनी भाषा की चौहद्दी पार करके दूसरी भाषाओं के घर में भी डेरा डालना होगा । उनसे राब्‍ता रखना होगा ।

हम जब उर्दू भाषा की बात करते हैं तो इसमें अभी भी ऐसा बहुत कुछ शेष है जो हिंदी पाठकों तक नहीं पहुंचा है । अनुवाद ही ऐसा जरिया है जो हमें दीगर भाषाओं के साहित्‍य संसार में प्रवेश करने का अवसर देता है । रेख्‍ता पब्लिकेशन ने हिंदी और उर्दू दो भाषाओं के बीच पुल बांधने का काम करते हुए उर्दू के कई ऐसे रचनाकारों की कृतियों को हिंदी में उपलब्‍ध कराने का काम किया है, जो मुख्‍य धारा के साहित्‍य का हिस्‍सा नहीं बन पाईं ।

रेख्‍ता पब्लिकेशन से प्रकाशित “सूखे सावन” कहानी संग्रह में उर्दू के उन अफ़सानानिगारों की कहानियां हैं जिन्‍होंने जिंस या यौनिकता जैसे विषय पर अपनी कलम चलाई है, जिसे पितृसत्‍तात्‍मक समाज ने नैतिकता के नाम पर वर्जित कर रखा है । पुरूषों ने शर्म, तहजीब, इज्‍जत की आड़ लेकर स्‍त्री की यौनिक ख्‍वाहिशों, दैहिक जरूरतों को जब-तब दबाया और कभी किसी औरत ने इसका खुलकर इजहार किया भी तो बेशर्म, बेहया, बदचलन कहकर उसे किसी अंधेरे कमरे में बंद कर दिया ।

यूं तो कहा जाता है कि साहित्‍य का काम है कि परंपराओं, रूढि़यों से टकराना, उसके खिलाफ आवाज बुलंद करना, पर ये साहस कम ही रचनाकार कर पाते हैं ।

मंटो और इस्‍मत चुगताई ने समाज के ठेकेदारों की आंख में आंख डालकर सच कहने का साहस दिखाया था । यौनिकता, तवायफों जैसे परहेजी विषयों को आधार बनाकार जब इन्‍होंने कुछ लिखा तो बुद्धिजीवी समाज ने उसे अश्‍लील और गंदा साहित्‍य करार कर दोनों को कोर्ट में कटघरे में खड़ा कर दिया । उनका जुर्म मात्र इतना था कि समाज में कालीन के अंदर छिपी उस गंदगी को सरेआम कर दिया था जिसकी चर्चा तो छोडि़ए फुसफुसाहट मात्र से सफेदपोश सरमायेदार घूंघट डालकर आज भी बच निकलते हैं ।

“सूखे सावन” कहानी संग्रह की सभी कहानियों में नाजुक समाजी घटनाओं की नब्‍ज टटोलने की कामयाब कोशिश की गई है । घरों में मर्दों की दबंगयाई, विवाहेत्‍तर संबंध, बेवाफाई, स्‍त्री के दमन जैसे मसलों की पृष्‍ठभूमि पर रची इन कुल दस कहानियों में प्रत्‍येक कहानीकार ने अपनी बात पुरजोर ढंग से उठाई है ।

कहानी संग्रह की एक कहानी बड़ी दिलचस्‍प बन पड़ी है जो पूरी किताब को पढ़ लेने के बाद भी हॉन्‍ट करती रहती है । “लोहे का कमरबंद” । इस कहानी के लेखक हैं रामलाल, जिनका जन्‍म पाकिस्‍तान के मियानवाली में हुआ था और विभाजन के बाद वे लखनऊ आ गए थे ।

कहानी एक व्‍यापारी की है जो तिजारत के सिलसिले में दूसरे देश जाता है । उसकी पत्‍नी निहायत ही खूबसूरत है । परदेस जाते समय वो पत्‍नी को समाज में विचर रहे बदनियत रखने वाले पुरूषों का हवाला देते हुए, उनसे सुरक्षित रखने के लिए, पत्‍नी की कमर में लोहे का कमरबंद बांध कर ताला जड़ देता है और चाबी अपने साथ ले जाता है । अविश्‍वास की पराकाष्‍ठा । पति विदेश से कब लौटेगा कुछ पता नहीं ।

पति के परदेस जाने के बाद पत्‍नी का जीवन उस लोहे के कमरबंद को पहने हुए किस तरह गुजरता है, निरंतर यातना और संत्रास के बीच जीवन जीती असहाय औरत की करूणामय बानगी है ये कहानी । अंत में उस कमरबंद पहने स्‍त्री का क्‍या हश्र होता है, इसका रोचक तानाबाना कहानीकार ने बुना है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है । औरत को इंसानियत के दूसरे दर्जे पर रखने वाले हमारे समाज के मुंह पर ये कहानी जबरदस्‍त तमाचा है ।

अवसरवादी समाज ने नैतिकता को तौलने के लिए तराजू तो एक रखी है लेकिन बटखरे अपने हिसाब से बना रखे हैं । बंटवारे के बाद भारत से पाकिस्‍तान चले गए मोहम्‍मद हसन की कहानी “हरामजादा बुढ्ढा” ऐसे ही व्‍यभिचारी, जिस्‍मखोर इंसान की कहानी है जो बिरादरी में नेकदिल इंसान के तौर पर जाना जाता है ।

वो अपने दोस्‍त की मौत पर उसकी पत्‍नी और इकलौती बेटी से मिलने आता है । मरहूम के गहरे दोस्‍त होने का वास्‍ता देकर उनके घर में पैठ बनाता है । कपड़े –लत्‍ते, खाने-पीने के खर्चे उठाता है । मां-बेटी का विश्‍वास अर्जित कर लेता है ।

एक दिन मौका मिलते ही दोस्‍त की जवान बेटी से जब वो बलात शारीरिक संबंध बनाता है तो लड़की कहती है – ये आप क्‍या कर रहे हैं, अब्‍बा हैं आप मेरे । वो गलीच इंसान कहता है- तुम कोई मेरे नुत्‍फे़ से पैदा बेटी थोड़े हो । ज़बान से बेटी कह देने से ख़ून तो एक नहीं हो जाता । आज के समाज में धूलधूसरित होती मानवीय संवेदनाएं और रिश्‍तों की उड़ती धज्जियों पर शर्मसार कर देने वाली कहानी है “हरामजादा बुढ्ढा” । कहानी पाठक को अपनी बगले झांकने पर विवश कर देती है । ग्‍लानी पैदा हो जाती है कि वो ऐसे रीढ़ विहीन समाज का एक हिस्‍सा है ।

संग्रह की कहानियां इस बात की तस्‍दीक़ करती हैं कि उर्दू ज़बान सिर्फ शेरो-शायरी तक ही महदूद नहीं है, उसकी बादशाहत कहानी, उपन्‍यास के क्षेत्र में भी उतनी ही शान- बान और मजबूती से कायम है ।

किसी भी संग्रह को पठनीय बनाने में रचनाओं का चयन महत्‍वपूर्ण होता है । ये उस संग्रह के सम्‍पादक के विवेक पर निर्भर है कि वो किसी एक विषय वस्‍तु पर लिखी तमाम रचनाओं का कितनी गहराई से अध्‍ययन करता है और इस निष्‍कर्ष पर पहुंचता है कि कौनसी कहानी चयन के योग्‍य है ।

तसनीफ़ हैदर इस कहानी संग्रह के सम्‍पादक हैं । वे स्‍वयं भी उम्‍दा कहानीकार, शाइर हैं । इस संग्रह में उनके द्वारा चुनी हुई कहानियों में उनकी मेहनत, परिश्रम साफ नजर आता है । यही वजह है कि ये कहानी संग्रह कहानियों का मोंटाज भर नहीं हैं बल्कि नारी की दबी हुई चीखों का महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज बन गया है, जिसे अवश्‍य ही पढ़ा जाना चाहिए ।

—000—

  • पुस्‍तक – सूखे सावन
  • (कहानी संग्रह उपन्‍यास)
  • सम्‍पादक – तसनीफ हैदर
  • प्रकाशक – रेख्‍ता प्रकाशन
  • मूल्‍य – रू 299/-