सामर्रा, इराक़ की ऐतिहासिक मलवीया मीनार

The historic Malwiya Minaret of Samarra, Iraq

तनवीर जाफ़री

पिछले दिनों इराक़ के कई ऐतिहासिक स्थानों का भ्रमण करने का अवसर मिला। इराक़ का इतिहास प्राचीन मेसोपोटामिया की सभ्यताओं से शुरू होता है, जिसे विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं का उद्गम माना जाता है। इसी मेसोपोटामिया सभ्यता से निकली सुमेर, बेबीलोन और असीरिया सभ्यतायें भी यहीं परवान चढ़ीं। यह क्षेत्र कभी फ़ारसी कभी यूनानी तो कभी रोमन साम्राज्यों के अधीन रहा। सातवीं सदी में जब अरबों द्वारा यहाँ इस्लाम का प्रसार किया गया उस समय बग़दाद, अब्बासी ख़िलाफ़त की राजधानी बना और 16वीं सदी में यह उस ओटोमन या उस्मानिया साम्राज्य का हिस्सा बन गया जोकि इतिहास के सबसे शक्तिशाली और लंबे समय तक शासन करने वाले साम्राज्यों में से एक था। ग़ौरतलब है कि 1299 से 1923 तक अर्थात लगभग 600 वर्षों तक उस्मानिया साम्राज्य का एशिया, यूरोप और अफ़्रीक़ा जैसे महाद्वीपों के विस्तृत भू-भाग पर नियंत्रण रहा। इसी दौर में इराक़ भी ओटोमन या उस्मानिया साम्राज्य के अधीन रहा। बाद में प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश शासन के अधिदेश के तहत आधुनिक इराक़ का गठन हुआ और 1932 में इराक़ एक स्वतंत्र राजतंत्र बना। 1958 में यहाँ गणराज्य की स्थापना हुई। 1979 में सद्दाम हुसैन के सत्ता में आने के बाद से इराक़ 1980 से 1988 तक ईरान के साथ युद्धरत रहा इसके बाद 1991 में कुवैत पर आक्रमण के बाद खाड़ी युद्ध में उलझा रहा। आख़िरकार 2003 में अमेरिका ने इराक़ पर आक्रमण कर सद्दाम की सत्ता को उखाड़ फेंका। देश में इसके बाद एक नई लोकतांत्रिक सरकार तो ज़रूर स्थापित हुई परन्तु उसके बाद भी इसे लंबे समय तक आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता का सामना भी करना पड़ा। इराक़ में अमेरिकी हमलों व अलक़ायदा व आई एस आई एस द्वारा किये गये हमलों व तबाही के निशान अभी भी देखे जा सकते हैं।

इराक़ का ही एक प्राचीन व ऐतिहासिक शहर है सामर्रा। यहाँ एक प्राचीन मीनार है जिसे ‘मलवीया मीनार’ के नाम से जाना जाता है। अरबी भाषा के शब्द ‘मलवीया’ का अर्थ ‘घोंघे का खोल’ या ‘सर्पिलाकार’ (Spiral) होता है, जो इसके अनोखे घुमावदार डिज़ाइन को दर्शाता है। इसकी ऊंचाई 52 मीटर यानी 171 फ़ीट और इसका आधार लगभग 33 मीटर अर्थात 108 फ़ीट चौड़ा है। यह मीनार सामर्रा की महान मस्जिद यानी ‘ग्रेट मॉस्क ऑफ़ सामर्रा’ का एक बचा हुआ भाग है। इस ऐतिहासिक मीनार का निर्माण अब्बासी ख़िलाफ़त के प्रसिद्ध ख़लीफ़ा अल-मुतवक्किल द्वारा 848 ईस्वी से 851 ईस्वी के बीच कराया गया था। अल-मुतवक्किल ने सामर्रा को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया था। उस दौर में सामर्रा की यह महान मस्जिद पूरी दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद हुआ करती थी, जहाँ लगभग 80,000 लोग एक साथ नमाज़ पढ़ सकते थे। परन्तु जब 1278 ईस्वी में चंगेज़ ख़ान के पोते हलाकू ख़ान के नेतृत्व में मंगोल सेना ने इराक़ पर हमला किया। उसी आक्रमण में मंगोल सेना ने इस विशाल मस्जिद को नष्ट कर दिया था । इस हमले में केवल मस्जिद की बाहरी दीवारों का हिस्सा और यह अद्भुत मलवीया मीनार ही सुरक्षित बच सकीं।

यह मीनार नीचे से चौड़ी और ऊपर की ओर जाते हुए संकरी यानी शंकु अथवा ‘घोंघे का खोल’ के आकार की होती जाती है। इसके चारों ओर नीचे से ऊपर तक एक घुमावदार /सीढ़ीदार रास्ता बना है जो ऊपर की तरफ़ जाता है। इसे पूरी तरह से बलुआ पत्थर और पकी हुई लाल ईंटों से बनाया गया है। इतिहासकारों का मानना है कि इसका डिज़ाइन प्राचीन मेसोपोटामिया के ‘ज़िगुरात’ से प्रेरित था। इस मीनार को इतनी ऊंचाई पर इसलिए बनाया गया था ताकि नमाज़ से पूर्व यहाँ से दी जाने वाली अज़ान की आवाज़ पूरे सामर्रा शहर में दूर-दूर तक स्पष्ट सुनाई दे सके। वर्ष 2005 में इराक़ युद्ध के दौरान अमेरिका विरोधी समूह द्वारा किये गये एक बम विस्फ़ोट में इस मीनार का ऊपरी हिस्सा मामूली रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था। उस समय इराक़ में घुसपैठ करने वाले अमेरिकी सैनिक इस मीनार का उपयोग स्नाइपर टावर के रूप में कर रहे थे। ऐतिहासिक और बेजोड़ वास्तुकला के कारण यूनेस्को ने वर्ष 2007 में इसे ‘सामर्रा पुरातात्विक शहर’ के तहत विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।

यह मीनार पर्यटकों के लिये आकर्षण का केंद्र है इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले लोग जो इराक़ जाते हैं वे जहाँ राजधानी बग़दाद,कर्बला,नजफ़,कूफ़ा,बसरा जैसे ऐतिहासिक शहरों का भ्रमण करते हैं वहीं वे बेबीलोन सभ्यता के अवशेष देखने व इराक़ के सामर्रा में स्थित इस ऐतिहासिक मलवीया मीनार को देखने ज़रूर जाते हैं।