हाथियों की विरासत: जैव विविधता और पर्यावरण का अनमोल हिस्सा

The legacy of elephants: a precious part of biodiversity and the environment

सुनील कुमार महला

पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान, विशालकाय और सामाजिक जीवों में से एक हाथी को ‘पारिस्थितिकी तंत्र का इंजीनियर’ कहा जाता है। इनके संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने और इनके घटते अस्तित्व को बचाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 16 अप्रैल को ‘हाथी बचाओ दिवस’ मनाया जाता है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि वर्तमान समय में हाथी अनेक गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं, जिनमें अवैध शिकार (विशेषकर हाथीदांत के लिए), वनों की कटाई, प्राकृतिक आवास का विनाश, मानव-हाथी संघर्ष तथा जलवायु परिवर्तन प्रमुख हैं। हाथी जंगलों, घासभूमियों और जल स्रोतों के संतुलन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए उनका संरक्षण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य है।

पाठकों को जानकारी देता चलूं कि हाथी पारिस्थितिकी तंत्र(इको-सिस्टम) को कई तरीकों से समृद्ध करते हैं।मसलन, वे फलों और पौधों को खाकर लंबी दूरी तय करते हैं और अपने मल(लीद) के माध्यम से बीजों का प्रसार करते हैं, जिससे नए पौधों का विकास होता है और वनों का विस्तार बना रहता है। घने जंगलों में चलते समय वे टहनियाँ और झाड़ियाँ तोड़ते हैं, जिससे वन का घनत्व कम होता है और सूर्य का प्रकाश जमीन तक पहुँचता है, जिससे छोटे पौधों और घास को बढ़ने का अवसर मिलता है और जैव विविधता बनी रहती है। सूखे के समय हाथी अपनी सूंड और पैरों से जमीन खोदकर पानी निकालते हैं, जिससे बने गड्ढे अन्य जानवरों के लिए भी जल स्रोत बन जाते हैं। इसके अलावा हाथियों के चलने से प्राकृतिक मार्ग (कॉरिडोर) बनते हैं, जो अन्य जीवों की आवाजाही को सरल बनाते हैं। उनका मल मिट्टी को पोषक तत्व प्रदान कर उसे उर्वर बनाता है और पौधों की वृद्धि में सहायक होता है।

बहरहाल, यदि हम यहां पर हाथियों से संबंधित आंकड़ों की बात करें तो भारत में हाथियों की उपस्थिति मुख्य रूप से कर्नाटक, असम, केरल, तमिलनाडु और ओडिशा में पाई जाती है। प्रोजेक्ट एलिफेंट (2017) के अनुसार भारत में लगभग 29,000–30,000 जंगली हाथियों का अनुमान था, जबकि 2025 की नवीनतम डीएनए आधारित गणना के अनुसार इनकी संख्या लगभग 22,446 आंकी गई है। डीएनए आधारित गणना का अर्थ है जानवरों की संख्या का अनुमान उनके आनुवंशिक पदार्थ (जेनेटिक मैटेरियल) के आधार पर लगाना, न कि केवल प्रत्यक्ष रूप से देखकर गिनना। विश्व में हाथियों की दो प्रमुख प्रजातियाँ पाई जाती हैं-अफ्रीकी हाथी जिनकी संख्या लगभग 4–5 लाख है तथा एशियाई हाथी जिनकी संख्या लगभग 50,000–60,000 के बीच है। भारत विश्व के कुल एशियाई हाथियों का 60% से अधिक हिस्सा रखता है।

हाल फिलहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में मानव-हाथी संघर्ष वर्तमान समय की एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक समस्या बन चुका है। इसका मुख्य कारण वनों का सिकुड़ना, कृषि विस्तार, मानव बस्तियों का बढ़ना और हाथियों के प्राकृतिक मार्गों (कॉरिडोर) का टूटना है। इसके परिणामस्वरूप हर वर्ष औसतन 500 से अधिक लोगों की मृत्यु हाथियों के हमलों में होती है। वर्ष 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 628 तक पहुँच गई, जो पिछले पाँच वर्षों में सबसे अधिक है। पिछले पाँच वर्षों में 2,800 से अधिक मानव मौतें दर्ज की गईं, जबकि वर्ष 2009-2024 के बीच लगभग 8,000 मानव मौतें हुई हैं। सबसे अधिक प्रभावित राज्य ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़ हैं।

दूसरी ओर, हाथियों की मृत्यु भी मानव गतिविधियों के कारण बड़ी संख्या में हो रही है। पिछले 16 वर्षों में 1,653 हाथियों की मौत मानवजनित कारणों से हुई है, जिनमें लगभग 69% मौतें बिजली के करंट से और लगभग 16% रेल दुर्घटनाओं से हुई हैं। पिछले पाँच वर्षों में 528 हाथियों की मौत दर्ज की गई है, जबकि प्रतिवर्ष औसतन 100 से अधिक हाथी मानव-हाथी संघर्ष में मारे जाते हैं। इसके अतिरिक्त अवैध शिकार, जहर देकर मारना तथा पटाखों या जहर मिले फलों से भी हाथियों की मृत्यु के मामले सामने आते रहे हैं। हाल ही में केरल में पटाखों से भरे फल खाने से हाथी की मृत्यु हुई तथा कर्नाटक में किसान की हाथी हमले में मृत्यु की घटना भी दर्ज की गई।

एक गंभीर घटना 20 दिसंबर 2025 को असम के होजाई जिले में हुई, जहाँ सैरंग-नई दिल्ली एक्सप्रेस गाड़ी तेज गति से गुजर रही थी और लगभग 100 हाथियों का झुंड रेलवे ट्रैक पार कर रहा था। लोको पायलट द्वारा आपातकालीन ब्रेक लगाने के बावजूद ट्रेन नहीं रुक सकी और टक्कर हो गई, जिसमें 7 हाथियों की मौके पर तथा एक घायल हाथी की बाद में मृत्यु हो गई, इस प्रकार कुल 8 हाथियों की जान गई। यह घटना उस क्षेत्र में हुई जहाँ हाथियों का प्राकृतिक आवागमन रेलवे ट्रैक के पास से होता है, लेकिन सुरक्षा उपायों और चेतावनी प्रणालियों की कमी के चलते यह हुआ।

इस प्रकार भारत में जहाँ एक ओर मानव जीवन हाथियों के कारण प्रभावित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर हाथी भी मानव गतिविधियों से गंभीर खतरे में हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि जंगलों का संरक्षण, हाथी कॉरिडोर की सुरक्षा, सुरक्षित रेलवे और बिजली व्यवस्था, तकनीकी निगरानी (जैसे जीपीएस ट्रैकिंग और अलर्ट सिस्टम) तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है, ताकि मानव और वन्यजीव दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके और हमारा पारिस्थितिकी तंत्र व पर्यावरण सुरक्षित रह सके।