
अमरपाल सिंह वर्मा
राजस्थान सरकार ने हाल ही में ‘विकसित राजस्थान 2047’ विजन डॉक्यूमेंट को मंजूरी दी है। इसमें राज्य को 2047 तक 4.3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य न केवल बड़े औद्योगिक निवेश बुनियादी ढांचे के निर्माण पर निर्भर करेगा बल्कि ग्रामीण समाज की भागीदारी पर भी इसमें महत्वपूर्ण है। सरकार गांवों के उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ाने की इच्छुक है। यह सोच निश्चित ही दूरदर्शी है लेकिन बड़ा सवाल है कि इसे जमीन पर उतारने का व्यावहारिक रास्ता क्या है?
अगर सरकार की सोच धरातल पर उतरती है तो गांवों मेंं रोजगार को खूब बढ़ावा मिल सकता है। गांवों की महिलाएं बुनाई, कताई और कढ़ाई में माहिर हैं। हजारों परिवार पीढिय़ों से खादी, हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी की कलाकृतियां या अन्य घरेलू उद्योग चला रहे हैं उनकी बिक्री न के बराबर है। गांवों के कुटीर उद्योग केवल रोजगार का साधन नहीं थे, वे हमारी संस्कृति और आत्म निर्भरता की पहचान थे। लेकिन बाजार की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण कुटीर उद्योग कमजोर पड़ रहे हैं। बड़ी तादाद में लोग बेरोजगारी और आय की कमी के कारण गांव छोडक़र शहरों का रुख कर रहे हैं।
प्रश्न उठता है कि इस समाधान का क्या है? इस प्रश्न का उत्तर कहीं न कहीं राजस्थान मेला आयोजक संघ के सचिव जगराम गुर्जर के सुझाव में छिपा है। गुर्जर तीन दशक से पारम्परिक लोक मेले आयोजित कर रहे हैं। उनका कहना है कि विभिन्न धार्मिक, पर्यटन महत्व के स्थानों सहित अकेले राजस्थान में ही सौ से अधिक लोक मेले हर साल आयोजित होते हैं और देश भर में इनकी संख्या हजारों में है। इन मेलों में हजारों लोग खरीदारी के लिए आते हैं। ऐसे में अगर राज्य के ग्रामीण कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, खादी और ग्रामोद्योग से जुड़े उत्पादों को मेलों में मंच दिया जाए तो कारीगरों को खरीदार और पहचान दोनों मिल सकते हैं।
गुर्जर का यह सुझाव इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि ग्रामीण उत्पादों की सबसे बड़ी समस्या बाजार का अभाव है। अगर ग्रामीणों को इन लोक मेलों में जोड़ दिया जाए तो उन्हें उत्पाद बेचने के लिए बड़ा अवसर मिल सकता है। स्थानीय से वैश्विक तक का सफर इस जरिए से शुरू किया जा सकता है।
सरकार को गांवों के उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए चरणबद्ध रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले जरूरी है कि किसी जिले के उत्पाद को उसी जिले में पहचान दिलाई जाए। उसके बाद बड़े मेलों के माध्यम से उसे अन्य जिलों तक पहुंचाया जाए। जब राज्य भर में ब्रांड वैल्यू बने तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया जाए। और अंतत: उसी ब्रांड को वैश्विक बाजार में उतारा जाए। यानी वैश्विक पहचान का रास्ता स्थानीय पहचान से होकर ही जाता है।
इस काम में सरकार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। केवल विजन डॉक्यूमेंट में बड़े लक्ष्य लिख देने से कुछ नहीं हो सकता। सरकार को जिला उद्योग केंद्रों के माध्यम से गांवों के हस्तशिल्पियों, कारीगरों और बुनकरों का सर्वे कराना चाहिए। उनकी सूची बनाकर उन्हें मेलों में भागीदारी के लिए प्रेरित और सहयोग करना चाहिए। राज्य में लगने वाले मेले महज उत्सव नहीं हैं, वे ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को गति देने का सर्वसुलभ बाजार साबित हो सकते हैं। गांवों के उत्पादों को ग्लोबल बनाने का संकल्प निश्चय ही सराहनीय है लेकिन यह सपना तभी साकार होगा जब सरकार और समाज मिलकर ग्रामीण उद्योगों को स्थानीय से वैश्विक तक की यात्रा तय करने में सहयोग दें। जगराम गुर्जर का मेला मॉडल इस यात्रा का सशक्त कदम हो सकता है। इससे न केवल कारीगरों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है बल्कि राजस्थान के पारंपरिक कुटीर उद्योगों को भी नई पहचान मिलना संभव है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)