पारिवारिक विवाद में योगी ने दी मर्यादा और संवाद की सीख

Yogi teaches dignity and dialogue in a family dispute

संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जनता दर्शन कार्यक्रम का सीधा प्रसारण और उसमें होने वाली बातचीत अक्सर प्रदेश की सामाजिक नब्ज को समझने का एक बड़ा माध्यम बन जाती है। 20 जुलाई को आयोजित जनता दर्शन में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब दर्जनों फरियादी अपनी समस्याओं की गठरी लेकर लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास पहुंचे। इन फरियादियों में से एक बड़ा वर्ग उन लोगों का था, जो पारिवारिक कलह, संपत्ति के विवाद या रिश्तों की तल्खी से जूझ रहे थे। दरअसल, आमतौर पर जब हम किसी सत्ता के केंद्र की ओर रुख करते हैं, तो उम्मीद यही होती है कि वहां से कोई कड़ा आदेश निकलेगा या कोई प्रशासनिक कार्रवाई होगी, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने इस बार जिस तरह से इन पारिवारिक उलझनों को संबोधित किया, वह किसी भी सरकारी आदेश से कहीं अधिक प्रभावी और मानवीय था। उन्होंने जो नसीहत दी, वह केवल एक मुख्यमंत्री की सलाह नहीं थी, बल्कि एक अभिभावक की वह चिंता थी, जो समाज की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई, यानी परिवार, को बिखरने से बचाने के लिए जरूरी है।

पारिवारिक विवाद लेकर अपने आवास पहुंचे परिवार को सीएम ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि पारिवारिक विवादों को सड़कों पर या सरकारी दफ्तरों की फाइलों में घसीटने से मामला सुलझने के बजाय और अधिक उलझ जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने घर की चारदीवारी के अंदर की बात को बाहर लाता है, तो वह अनजाने में उन लोगों को भी उस विवाद का हिस्सा बना लेता है, जिनका उस रिश्ते या उस संपत्ति से कोई लेना-देना नहीं होता। बहरहाल, योगी की यह बात बहुत गहराई रखती है कि निजी मामलों में बाहरी लोगों की दखलंदाजी अक्सर आग में घी का काम करती है। समाज में कई बार ऐसे तत्व होते हैं, जो अनजाने या स्वार्थवश विवादों को सुलझाने के बजाय उन्हें हवा देते हैं, जिससे परिवार के सदस्यों के बीच अहंकार की दीवार और ऊंची हो जाती है। योगी ने उन लोगों को आईना दिखाते हुए कहा कि जो विवाद घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठकर हल किए जा सकते थे, उन्हें पुलिस थानों या कचहरी की चौखट तक ले जाना वक्त, पैसा और मानसिक शांति को गंवाना है।

गौरतलब हो, संपत्ति के बंटवारे के विवाद आजकल पारिवारिक कलह की सबसे बड़ी जड़ बने हुए हैं। अक्सर देखा जाता है कि भाई-भाई या पिता-पुत्र के बीच जमीन या मकान को लेकर हुआ मामूली मतभेद देखते ही देखते एक बड़ी कानूनी लड़ाई में तब्दील हो जाता है। मुख्यमंत्री ने ऐसे मामलों में संवाद की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संपत्ति तो आती-जाती रहती है, लेकिन खून के रिश्ते एक बार बिखर जाएं, तो उन्हें जोड़ना नामुमकिन हो जाता है। योगी ने फरियादियों से कहा कि वे एक बार ठंडे दिमाग से अपने परिवार के बड़ों को बैठाएं, क्योंकि बड़ों का अनुभव और उनकी मध्यस्थता कई बार उस समस्या का हल निकाल लेती है, जो सालों की कानूनी कार्यवाही भी नहीं कर पाती। उनका यह दृष्टिकोण समाज के उन लोगों के लिए एक सबक है, जो छोटी-छोटी बातों पर मान-मर्यादा भूलकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते हैं। यह नसीहत न केवल परिवारों को टूटने से बचा सकती है, बल्कि समाज में सद्भाव की एक नई संस्कृति को भी जन्म दे सकती है, जहां विवाद समाधान के लिए नहीं, बल्कि आपसी सहमति की तलाश के लिए चर्चा की जाती है।

योगी आदित्यनाथ ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही, वह आने वाली पीढ़ी के भविष्य से जुड़ी है। उन्होंने बहुत संवेदनशीलता के साथ रेखांकित किया कि परिवार के भीतर का क्लेश केवल उन दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, जो लड़ रहे हैं, बल्कि उसका सीधा और गहरा असर घर के बच्चों पर पड़ता है। जिस घर में दिन-रात कलह हो, वहां बच्चों के कोमल मन पर जो नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, उसकी भरपाई किसी भी धन-संपत्ति से नहीं हो सकती। बच्चों के मानसिक विकास, उनकी पढ़ाई और उनके आत्मविश्वास पर इसका जो दुष्प्रभाव पड़ता है, वह उन्हें जीवन भर के लिए पीछे धकेल सकता है। योगी की यह चिंता दर्शाती है कि वे केवल एक राजनेता की भूमिका में नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक की भूमिका में बात कर रहे थे। उन्होंने यह संदेश दिया कि अगर हम वास्तव में अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की कामना करते हैं, तो हमें अपने व्यक्तिगत अहंकार को त्यागकर शांति और संवाद का मार्ग अपनाना होगा। धैर्य का अर्थ हार मान लेना नहीं, बल्कि रिश्तों को सहेजने के लिए दी गई एक और कोशिश है।

लब्बोलुआब यह है कि मुख्यमंत्री की इन बातों का समाज पर व्यापक असर हो सकता है, बशर्ते लोग इसे गंभीरता से लें। आज के भागदौड़ भरे दौर में सहनशीलता और धैर्य की कमी ने परिवारों को कमजोर कर दिया है। सोशल मीडिया और बाहरी दुनिया के प्रभाव में आकर लोग अपने घर की बातें सार्वजनिक करने में संकोच नहीं करते, जिससे गोपनीयता खत्म हो जाती है और विवाद सार्वजनिक संपत्ति बन जाते हैं। योगी की यह नसीहत लोगों को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है। यदि लोग यह समझने लगें कि घर के मसले घर में ही रहकर बातचीत से सुलझाए जा सकते हैं, तो न केवल अदालतों का बोझ कम होगा, बल्कि परिवारों में भी प्रेम और विश्वास की वापसी होगी। यह एक प्रकार का सामाजिक सुधार है, जो कानून के डंडे से नहीं, बल्कि समझदारी और मानवीय संवेदनाओं के मेल से ही संभव है। मुख्यमंत्री का यह जनता दर्शन कार्यक्रम न केवल फरियाद सुनने का केंद्र बना, बल्कि यह लोगों को एक साथ जीने और एक-दूसरे को समझने का अनमोल पाठ भी पढ़ा गया। अंततः, एक स्वस्थ समाज का निर्माण स्वस्थ परिवारों से ही होता है, और योगी जी की यह पहल उसी स्वस्थ समाज की दिशा में एक साहसी और दूरदर्शी कदम है।