अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर विशेष : भट्ट कान्तिनाथ शर्मा : डूंगरपुर के एक बिरले‘मास्टर साहब’

Special on International Literacy Day: Bhatt Kantinath Sharma – A unique ‘Master Sahab’ from Dungarpur

नीति गोपेन्द्र भट्ट

डूंगरपुर के राजघराने के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं जिनका औपचारिक पद भले ही बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उनका प्रभाव राजपरिवार और तत्कालीन राजनीतिक जीवन पर असाधारण रहा। भट्ट कान्तिनाथ जी शर्मा उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में से एक थे। राजपरिवार के सदस्य उन्हें आत्मीयता और सम्मान से ‘मास्टर साहब’ कहकर पुकारते थे।

कान्तिनाथ शर्मा का जन्म विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता पंडित लक्ष्मीनाथ जी भट्ट का डूंगरपुर राजघराने से निकट संबंध था। कान्तिनाथ जी शर्मा ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से शिक्षा प्राप्त की। वहां उन्हें महामना मदन मोहन मालवीय जी के संपर्क में आने का अवसर मिला और दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी से भी उनका सान्निध्य हुआ। हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत पर उनकी असाधारण पकड़ थी तथा वे वेद-शास्त्रों के भी गंभीर अध्येता थे।

शिक्षा पूरी करने के बाद वे डूंगरपुर के महारावल हाई स्कूल में सरकारी शिक्षक बने। इसी दौरान उनकी प्रतिभा और विद्वता से प्रभावित होकर डूंगरपुर स्टेट के तत्कालीन शासक महारावल लक्ष्मण सिंह जी ने उन्हें राज्य के भावी उत्तराधिकारी और अपने ज्येष्ठ पुत्र महारावल महिपाल सिंह जी की शिक्षा-दीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी। यह जिम्मेदारी इतनी महत्वपूर्ण थी कि कान्तिनाथ जी शर्मा ने अपनी सरकारी नौकरी तक छोड़ दी और अपना जीवन राजपरिवार की सेवा में समर्पित कर दिया।

उनका संबंध केवल तत्कालीन महाराज कुँवर महिपाल सिंह जी तक सीमित नहीं रहा। वे महारावल लक्ष्मण सिंह के तीनों पुत्रों—महिपाल सिंह जी , जयसिंह जी और राजसिंह जी डूंगरपुर के साथ ही महाराजकुमारियों के शिक्षक और मार्गदर्शक भी रहे। बाद में राजसिंह जी डूंगरपुर भारतीय क्रिकेट के अत्यंत प्रतिष्ठित नाम बने। राजसिंह जी सहित राजपरिवार के सदस्य उन्हें प्रेम से ‘मास्टर साहब’ कहते थे।

कान्तिनाथ जी शर्मा की भूमिका यहीं समाप्त नहीं हुई। महिपाल सिंह जी की शिक्षा पूरी होने के बाद महारावल लक्ष्मण सिंह ने उन्हें अपना राजनीतिक सचिव बना दिया। वे आगे चलकर महारावल साहब के सबसे विश्वस्त सलाहकार और राजस्थान स्वतन्त्र पार्टी के महा सचिव बने। तत्कालीन राजनीतिक हलकों में उन्हें महारावल लक्ष्मण सिंह जी का ‘चाणक्य’ तक कहा जाने लगा।

राजाजी और स्वतंत्र पार्टी से निकट संबंध

जयपुर की महारानी गायत्री देवी को स्वतंत्र पार्टी में लाने का श्रेय

कान्तिनाथ जी शर्मा का एक महत्वपूर्ण अध्याय स्वतन्त्र भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ‘राजाजी’ और उनके द्वारा गठित स्वतंत्र पार्टी से जुड़ा। वर्ष 1959 में राजाजी द्वारा स्वतंत्र पार्टी की स्थापना के बाद कान्तिनाथ शर्मा स्वतंत्र पार्टी की राजस्थान इकाई में महत्वपूर्ण भूमिका में आए। वे राजाजी के अंग्रेजी भाषणों का तत्काल हिन्दी में प्रभावशाली अनुवाद करते थे। प्रकाशित संस्मरणों के अनुसार, राजाजी स्वयं उनकी भाषण-अनुवाद शैली से प्रभावित थे। इसी राजनीतिक भूमिका के दौरान उन्हें जयपुर की महारानी गायत्री देवी को स्वतंत्र पार्टी में लाने और उन्हें राजनीतिक शिक्षा दीक्षा देने की जिम्मेदारी भी मिली। यह राजस्थान के राजनीतिक इतिहास का उल्लेखनीय प्रसंग है। जयपुर की महारानी गायत्री देवी पार्टी के प्रदेश महासचिव की हैसियत से उनके हस्ताक्षरों से स्वतंत्र पार्टी में शामिल हुई और लोकसभा के लिए लड़े सभी चुनाव जीती ।

महारावल लक्ष्मण सिंह के ‘दाएं हाथ’

महारावल लक्ष्मण सिंह के साथ कान्तिनाथ शर्मा का रिश्ता जीवनपर्यंत बना रहा। महारावल के संसद और विधानसभा में भाषणों के लेखन और राजनीतिक रणनीति में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 1971 में श्री मोहन लाल जी सुखाड़िया की कांग्रेस सरकार के अल्पमत में आने पर प्रस्तावित संविद सरकार से जुड़े विधायकों के साथ जयपुर में हुए आंदोलन के दौरान महारावल लक्ष्मण सिंह जी के साथ कान्तिनाथ जी शर्मा को भी नजरबंद किए जाने का उल्लेख मिलता है। उनकी विद्वता और राजनीतिक समझ के कारण राजस्थान ही नहीं देश के अनेक बड़े नेता और राजघरानों के सम्मानीय व्यक्ति उनसे संपर्क रखते थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहन लाल जी सुखड़िया, हरिदेव जी जोशी और भैरोंसिंह जी शेखावत जैसे दिग्गज नेता भी उनके राजनीतिक कौशल का सम्मान करते थे।

एक युग का साक्षी

भट्ट कान्तिनाथ जी शर्मा का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने रियासत काल, स्वतंत्रता, रियासतों के एकीकरण और स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक राजनीति इन सभी संक्रमणकालीन दौरों को बहुत निकट से देखा।उनके पास डूंगरपुर राजघराने, स्वतंत्र पार्टी, राजस्थान की राजनीति और देश के अनेक राजनेताओं एवं राजपरिवारों से जुड़े संस्मरणों का विशाल भंडार था। प्रकाशित संस्मरणों में यह भी उल्लेख है कि परिजनों ने उनसे आत्मकथा अथवा संस्मरण लिखने का आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने इस पर यह कहते हुए सहमति नहीं दी कि वे यदि लिखेंगे तो सिर्फ मधुर प्रसंग नहीं, बल्कि कड़वी सच्चाइयां भी लिखेंगे। इसी कारण उनका जीवन आज इतिहासकारों और राजस्थान के राजनीतिक-सामाजिक इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।

वर्ष 2016 में हनुमान जयंती के दिन लगभग एक शताब्दी का जीवन पूरा कर वे इस संसार से विदा हुए लेकिन डूंगरपुर राजघराने के ‘मास्टर साहब’ के रूप में उनकी स्मृति आज भी जीवित है। कान्तिनाथ जी शर्मा को केवल ‘राजघराने के गुरु’ कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे एक कुशल शिक्षक होने के साथ भारतीय संस्कृति और वेद पुराणों के महान ज्ञाता और विद्वान संस्कृतज्ञ होने के साथ-साथ अच्छे लेखक और वक्ता भी थे। इसके अलावा वे राजनीतिक रणनीतिकार भी थे और एक ऐसे युग के जीवित साक्षी थे , जब डूंगरपुर की रियासत आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में अपना नया स्वरूप ग्रहण कर रही थी।

हिंदी,अंग्रेजी और संस्कृत के ऐसे महान ज्ञाता और डूंगरपुर के लाड़ले महापुरुष को शिक्षक दिवस पर कौटिश नमन …