सत्य निकेतन हादसा: मालिक गिरफ्तार, मगर सवाल सिर्फ एक इमारत पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर

Satya Niketan tragedy: Owner arrested, but questions not just about one building, but about the entire system

प्रीती पांडेय

दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में बहुमंजिला पीजी इमारत के अचानक ढहने से राजधानी एक बार फिर उस सवाल के सामने खड़ी है, जिसका जवाब हर बड़े हादसे के बाद तलाशा जाता है—क्या यह महज दुर्घटना थी या नियमों और निगरानी की अनदेखी का नतीजा?

हादसे में अब तक सात लोगों की मौत हो चुकी है। घटना के बाद फरार चल रहे इमारत के मालिक हरिराम बंसल को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन मालिक की गिरफ्तारी के साथ मामला खत्म नहीं होता। असली पड़ताल अब इस बात की होनी चाहिए कि इमारत में कथित तौर पर चल रहे रेनोवेशन, भवन की संरचनात्मक स्थिति और सुरक्षा मानकों की निगरानी आखिर किस स्तर पर हुई थी।

CCTV में कैद कुछ सेकेंड की जिंदगी-मौत
सामने आए CCTV फुटेज में हादसे से कुछ क्षण पहले तक सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। सड़क किनारे एक बुजुर्ग अपनी छोटी-सी दुकान पर बैठा है। अचानक इमारत की तरफ से मलबा और धूल गिरती दिखाई देती है।

खतरे को भांपकर बुजुर्ग तेजी से वहां से भागता है। उसके पास शायद कुछ ही सेकेंड थे। इसके तुरंत बाद पूरी इमारत भरभराकर नीचे आ जाती है। धूल का गुबार उठता है और कुछ पल पहले तक मौजूद पूरी संरचना मलबे में बदल जाती है।

यह फुटेज हादसे की भयावहता तो दिखाता ही है, साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाता है कि अगर भवन की संरचना में खतरे के संकेत मौजूद थे, तो उन्हें पहले क्यों नहीं पहचाना गया?

ग्राउंड फ्लोर पर रेनोवेशन, अब जांच के घेरे में निर्माण
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर रेनोवेशन का काम चल रहा था। जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि निर्माण या मरम्मत के दौरान भवन की मूल संरचना में कोई ऐसा बदलाव तो नहीं किया गया, जिससे उसकी मजबूती प्रभावित हुई हो।

यहां अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकलेगा। लेकिन सवाल महत्वपूर्ण है—पुरानी बहुमंजिला इमारत में जब निर्माण कार्य चल रहा था, तब क्या उसकी संरचनात्मक सुरक्षा का आकलन हुआ था? क्या काम के लिए आवश्यक अनुमति थी? क्या भार-वहन करने वाले हिस्सों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ हुई?

यही वे सवाल हैं जिनके जवाब सत्य निकेतन हादसे की असली वजह सामने ला सकते हैं।

राऊ IAS से सत्य निकेतन तक—क्यों बार-बार निशाने पर छात्र?
दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र पीजी, हॉस्टल और किराये के कमरों में रहते हैं। ऐसे में सत्य निकेतन की घटना को जुलाई 2024 के राऊ IAS स्टडी सर्कल हादसे से अलग करके देखना मुश्किल है।

पुरानी राजेंद्र नगर में राऊ IAS के बेसमेंट में पानी भरने से तीन UPSC अभ्यर्थियों की मौत हुई थी। उस घटना के बाद भवन के इस्तेमाल, जल निकासी और सुरक्षा इंतजामों को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।

दोनों घटनाओं की प्रकृति अलग है—एक में पानी भरने से मौत हुई और दूसरे में इमारत ढह गई—लेकिन एक समान सवाल जरूर सामने आता है: जहां बड़ी संख्या में छात्र रहते या पढ़ते हैं, वहां सुरक्षा मानकों की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी है?

हौज रानी: हादसे के बाद सामने आईं कई परतें
इसी साल दिल्ली के हौज रानी में हुए भीषण अग्निकांड ने भी यही दिखाया कि किसी इमारत में सुरक्षा नियमों की अनदेखी कितनी महंगी पड़ सकती है। इस हादसे में 23 लोगों की मौत हुई थी।

बाद की मजिस्ट्रियल जांच में लाइसेंसिंग, निरीक्षण और निगरानी से जुड़ी कई गंभीर कमियां सामने आईं। जांच में कई सरकारी एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठे और यह भी सामने आया कि जिस इमारत में B&B संचालित हो रहा था, उसमें अनियमितताओं के बावजूद गतिविधियां जारी रहीं।

यानी दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में सामने आई इन घटनाओं की परिस्थितियां भले अलग हों, लेकिन इनके बाद उठने वाला एक सवाल एक जैसा है—नियम कागज पर हैं या जमीन पर भी लागू होते हैं?

मालिक गिरफ्तार, लेकिन जवाबदेही का दायरा कितना बड़ा?
सत्य निकेतन मामले में मालिक की गिरफ्तारी जरूरी कानूनी कार्रवाई है। लेकिन जांच को यहीं रोक देना पर्याप्त नहीं होगा।

अगर रेनोवेशन में नियमों का उल्लंघन हुआ, तो यह पता लगाना भी जरूरी है कि निर्माण कार्य पर निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी। अगर भवन की स्थिति पहले से खराब थी, तो क्या किसी विभाग को इसकी जानकारी थी? क्या कभी निरीक्षण हुआ? अगर हुआ तो क्या रिपोर्ट तैयार हुई? और अगर कोई अनियमितता सामने आई थी, तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

मालिक की जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन नियामक व्यवस्था की जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

दिल्ली में ‘पहले हादसा, फिर कार्रवाई’ का चक्र
राव IAS हो, हौज रानी हो, तुगलकाबाद एक्सटेंशन हो या अब सत्य निकेतन—हर घटना के बाद जांच, नोटिस, गिरफ्तारी, निलंबन और कार्रवाई की बातें सामने आती हैं।

लेकिन असली प्रशासनिक सफलता तब होगी जब संभावित खतरे की पहचान हादसे से पहले हो।

एक पीजी में रहने वाला छात्र भवन का स्ट्रक्चरल ऑडिट खुद नहीं कर सकता। किरायेदार यह भी नहीं जान सकता कि भवन की मंजूर क्षमता क्या है या उसमें हाल में कौन-से संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं। इसलिए सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल किरायेदार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।

अब असली परीक्षा जांच की है
सत्य निकेतन हादसे में जांच को सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि इमारत किस वजह से गिरी। यह भी सामने आना चाहिए कि भवन की मंजूरी क्या थी, उसका वास्तविक इस्तेमाल क्या था, रेनोवेशन किस तरह किया जा रहा था और सुरक्षा नियमों की निगरानी कैसे हुई।

मालिक की गिरफ्तारी से कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ गई है। लेकिन इस हादसे का असली मतलब तभी निकलेगा, जब जांच से ऐसे जवाब सामने आएं जो भविष्य में किसी और सत्य निकेतन को होने से रोक सकें।

क्योंकि हादसे के बाद मलबा हटाया जा सकता है, इमारत दोबारा बनाई जा सकती है और सड़क फिर सामान्य हो सकती है। लेकिन जिन परिवारों ने अपने लोग खोए हैं, उनके लिए सामान्य जिंदगी वापस नहीं आती।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सत्य निकेतन की इमारत क्यों गिरी?

सवाल यह भी है—दिल्ली की अगली असुरक्षित इमारत की पहचान उसके गिरने से पहले कौन करेगा?