विश्व का मानचित्र बदलेगा, भारत की संप्रभुता नहीं

The map of the world will change, but India's sovereignty will not

महेन्द्र तिवारी

संयुक्त राष्ट्र महासभा में हाल ही में पारित नया विश्व मानचित्र प्रस्ताव केवल भूगोल के रेखांकन का विषय नहीं है, बल्कि यह इतिहास, राजनीति, शिक्षा और वैश्विक न्याय से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण और युगांतरकारी परिवर्तन है। इस ऐतिहासिक प्रस्ताव को मानचित्र सुधारने की एक विशेष पहल के अंतर्गत पारित किया गया है। इसका मूल उद्देश्य दुनिया के मानचित्रों में महाद्वीपों और देशों के वास्तविक क्षेत्रफल को अधिक सटीक, वैज्ञानिक और न्यायपूर्ण ढंग से प्रदर्शित करना है। भारत ने इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन करके यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वह विश्व के अधिक संतुलित और यथार्थवादी प्रतिनिधित्व का प्रबल पक्षधर है। इसके साथ ही भारत ने अत्यंत दृढ़ता से वैश्विक मंच पर यह भी दोहरा दिया है कि जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय मानचित्र में इन क्षेत्रों का चित्रण पूर्ण रूप से भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही होना चाहिए। इस प्रकार भारत ने एक ओर जहां वैश्विक सुधार का खुला समर्थन किया है, वहीं दूसरी ओर अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता और अखंडता पर किसी भी प्रकार के समझौते की संभावना को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है।

विश्व मानचित्र का यह विवाद कोई आज का नया विषय नहीं है। 16वीं शताब्दी में तैयार की गई मर्केटर प्रक्षेपण प्रणाली समुद्री नौवहन के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जाती थी क्योंकि उसमें नाविकों के लिए दिशाओं का निर्धारण करना बहुत ही सरल हो जाता था। पृथ्वी जो कि एक गोल आकार की है, उसे एक समतल कागज पर उकेरने की इस विधा ने दिशाओं को तो सटीक रखा, किंतु उसी सुविधा की बहुत बड़ी कीमत यह चुकानी पड़ी कि ध्रुवों के निकट स्थित क्षेत्रों का आकार वास्तविकता से अत्यधिक बढ़ा हुआ दिखाई देने लगा। इसके परिणामस्वरूप यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्र वास्तविकता से कहीं अधिक विशाल प्रतीत होने लगे। इसके विपरीत भूमध्य रेखा के निकट स्थित अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्र वास्तविकता से बहुत छोटे दिखाई देते हैं। आधुनिक भूगोल के जानकार लंबे समय से यह सशक्त तर्क देते रहे हैं कि शिक्षा और सामान्य ज्ञान के प्रसार के लिए ऐसे मानचित्र अधिक उपयुक्त होने चाहिए जो भूमि के वास्तविक क्षेत्रफल को सुरक्षित और सटीक रखें। इसी विचार ने समान क्षेत्रफल पर आधारित नई मानचित्र प्रणालियों को जन्म दिया है।

इस नए प्रस्ताव को पारित कराने के पीछे अफ्रीकी देशों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका रही है। अफ्रीकी देशों का यह प्रबल तर्क रहा है कि पारंपरिक मानचित्रों ने सदियों तक उनके महाद्वीप की वास्तविक विशालता को बहुत कम करके दिखाया है। इस भौगोलिक विकृति ने वैश्विक मानसिकता में भी एक गहरा असंतुलन पैदा किया, जिससे अवचेतन रूप में यह धारणा बन गई कि जो देश आकार में बड़े दिखते हैं वे अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि हम वास्तविक आंकड़ों की बात करें तो अफ्रीका पृथ्वी का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। इसके बावजूद साधारण मानचित्रों में वह यूरोप और उत्तरी अमेरिका की तुलना में अपेक्षाकृत काफी छोटा दिखाई देता है। इस नए प्रस्ताव का उद्देश्य केवल कागज पर खींची गई रेखाओं को बदलना मात्र नहीं है, बल्कि दुनिया की भौगोलिक समझ को अधिक न्यायपूर्ण और समानता पर आधारित बनाना है। भारत द्वारा इस अफ्रीकी पहल का समर्थन किया जाना वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ उसकी लगातार बढ़ती रणनीतिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समान प्रतिनिधित्व के प्रति उसकी गहरी प्रतिबद्धता को भी स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम में दो बिल्कुल अलग विषयों को समझना अत्यंत आवश्यक है। पहला विषय विशुद्ध रूप से भूगोल का है, जिसमें पृथ्वी के महाद्वीपों का वास्तविक आकार और उनकी सटीक वैज्ञानिक प्रस्तुति शामिल है। दूसरा विषय राजनीतिक मानचित्रण का है, जिसमें विभिन्न देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं, विवादित क्षेत्र और राष्ट्रों की संप्रभुता का अत्यंत संवेदनशील मामला आता है। संयुक्त राष्ट्र का यह नया प्रस्ताव केवल पहले विषय अर्थात भौगोलिक सटीकता से संबंधित है। भारत ने भी इसी पहले विषय का समर्थन किया है, जबकि दूसरे विषय पर अपना अत्यंत अडिग और स्पष्ट रुख पूरी दुनिया के सामने दोहराया है। यही कारण है कि भारत के स्थायी मिशन ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए भी यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि इस कदम को राष्ट्रीय सीमाओं की किसी भी नई व्याख्या के रूप में कदापि नहीं देखा जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित यह प्रस्ताव किसी एक विशेष मानचित्र को पूरे विश्व के लिए अनिवार्य नहीं बनाता है। यह केवल समान क्षेत्रफल आधारित मानचित्र प्रणालियों के व्यापक उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए उठाया गया एक नीतिगत कदम है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र ने किसी एक विशिष्ट मानचित्र को आधिकारिक विश्व मानचित्र घोषित कर दिया है।

भारत के कूटनीतिक रुख का सबसे सशक्त और महत्वपूर्ण पक्ष जम्मू कश्मीर और लद्दाख की भौगोलिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अत्यंत स्पष्ट और कठोर शब्दों में यह कहा है कि भारत का संपूर्ण संप्रभु क्षेत्र, जिसमें जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश पूरी तरह से शामिल हैं, केवल और केवल भारत के अपने आधिकारिक मानचित्र के अनुसार ही प्रदर्शित किए जाने चाहिए। यदि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था, वैश्विक प्रकाशन या किसी भी विदेशी मंच पर इन भारतीय क्षेत्रों का गलत, भ्रामक अथवा किसी अन्य देश के हिस्से के रूप में चित्रण किया जाता है, तो उसे भारत सरकार द्वारा किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। भारत का यह आधिकारिक वक्तव्य कोई सामान्य कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह भारत की उस लंबे समय से चली आ रही स्थायी और सुदृढ़ नीति का पुनः उद्घोष है जो अपनी मिट्टी के एक कण पर भी विदेशी दावे को खारिज करती है। यह बयान इस बात का भी परिचायक है कि भारत भौगोलिक सुधारों के नाम पर अपनी राष्ट्रीय सीमाओं से कोई खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा।

शिक्षा और बौद्धिक विकास के क्षेत्र में इस निर्णय के अत्यंत दूरगामी और सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। यदि दुनिया के विभिन्न देश स्वेच्छा से समान क्षेत्रफल पर आधारित मानचित्रों को अपनाना शुरू करते हैं, तो आने वाली युवा पीढ़ियां दुनिया को एक अधिक वैज्ञानिक, तथ्यपूर्ण और न्यायसंगत दृष्टि से समझ सकेंगी। विद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों, विश्वविद्यालयों के भूगोल विभागों और बड़े शोध संस्थानों में ऐसे नए मानचित्रों का उपयोग महाद्वीपों के वास्तविक आकार और उनके परस्पर अनुपात को गहराई से समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा। इससे छात्रों के मन में लंबे समय से बैठी यह भ्रामक धारणा भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी कि नक्शे में आकार में बड़ा दिखाई देने वाला क्षेत्र या देश अनिवार्य रूप से वास्तविकता में भी उतना ही बड़ा या शक्तिशाली है। यद्यपि समुद्री नौवहन और दिशा निर्धारण के लिए पारंपरिक प्रक्षेपण प्रणाली भविष्य में भी उपयोगी बनी रहेगी, फिर भी शिक्षा, सांख्यिकीय विश्लेषण, जलवायु परिवर्तन के अध्ययन और वैश्विक संसाधनों की तुलना जैसे गंभीर विषयों में समान क्षेत्रफल वाले मानचित्रों का महत्व लगातार बढ़ता ही जाएगा।

तकनीकी दृष्टि से भी यह प्रस्ताव समकालीन दुनिया के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। आज के युग में अधिकांश लोग आभासी माध्यमों और अंकीय मानचित्रों का उपयोग करते हैं। ऐसे में नई तकनीक के माध्यम से लोगों को पृथ्वी का सही आकार दिखाना बहुत आसान हो गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से किसी भी देश पर बाध्यकारी नहीं है। इसका सीधा अर्थ यह है कि किसी भी संप्रभु देश पर तत्काल प्रभाव से नया मानचित्र अपनाने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं थोपी गई है। न ही इस प्रस्ताव के पारित होने मात्र से किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा, किसी विवादित क्षेत्र या किसी स्थान के ऐतिहासिक नाम में कोई स्वतः परिवर्तन हो जाएगा। इसलिए आम जनमानस में यह कहना या सोचना पूरी तरह से गलत होगा कि दुनिया का आधिकारिक नक्शा आज से पूरी तरह बदल गया है। वास्तव में यह प्रस्ताव केवल वैज्ञानिक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए दुनिया भर में अधिक सटीक मानचित्रण को प्रोत्साहित करने वाला एक वैचारिक और नीतिगत कदम मात्र है, जिसका हर स्तर पर सम्मान किया जाना चाहिए।

भारत की वर्तमान विदेश नीति के व्यापक संदर्भ में इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण किया जाए तो यह निर्णय विशेष महत्व रखता है। एक ओर भारत अफ्रीकी देशों की उस पुरानी और ऐतिहासिक मांग का खुलकर समर्थन करता है जिसमें वैश्विक संस्थाओं में अधिक संतुलित प्रतिनिधित्व और न्याय की बात कही जाती है। वहीं दूसरी ओर वह अपनी राष्ट्रीय सीमाओं, आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के अत्यंत संवेदनशील प्रश्न पर बिल्कुल स्पष्ट, कठोर और दृढ़ दिखाई देता है। यही संतुलन भारत की समकालीन कूटनीति की सबसे बड़ी पहचान बनता जा रहा है, जहां वैश्विक सहयोग और राष्ट्रीय हित दोनों को एक समान रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। समग्र रूप से देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र का नया विश्व मानचित्र प्रस्ताव भूगोल जैसे विषय को अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और वैज्ञानिक बनाने की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है। भारत ने इसका समर्थन करके वैश्विक सुधार के प्रति अपनी सकारात्मक और प्रगतिशील सोच पूरी दुनिया को दिखाई है, किंतु साथ ही यह भी स्थापित कर दिया है कि उसकी संप्रभुता पर कोई भ्रम या समझौता कभी स्वीकार्य नहीं होगा। यही परिपक्व दृष्टिकोण भारत को आज एक ऐसे शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है जो वैश्विक परिवर्तन का सक्रिय सहभागी भी है और अपने राष्ट्रीय हितों का सबसे सजग और अभेद्य रक्षक भी।