इंदौर की स्वच्छता में आज भी जीवित है बापू का सपना

Bapu's dream lives on in Indore's cleanliness

अजय कुमार बियानी

“स्वच्छ भारत का इरादा, इरादा कर लिया हमने…” गांधी जयंती पर गूंजता यह संदेश केवल एक गीत की पंक्ति नहीं, बल्कि उस विचार की याद दिलाता है जिसे महात्मा गांधी ने अपने जीवन में विशेष महत्व दिया था। गांधीजी के लिए स्वच्छता केवल आसपास की सफाई नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मसम्मान और जिम्मेदार नागरिकता का प्रतीक थी। इंदौर ने इसी विचार को व्यवहार में उतारकर देश के सामने एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

इंदौर की स्वच्छता यात्रा केवल सफाईकर्मियों की मेहनत या प्रशासनिक व्यवस्था की कहानी नहीं है। इसके पीछे नागरिकों की भागीदारी, कचरा पृथक्करण की आदत, नियमित सफाई, जनजागरूकता और शहर के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी की भावना भी जुड़ी है। यही वह सकारात्मक परिवर्तन है जिसने स्वच्छता को अभियान से आगे बढ़ाकर इंदौर की जीवनशैली का हिस्सा बनाया है।

गांधीजी का इंदौर से भी विशेष संबंध रहा। स्वतंत्रता से पहले वे दो बार इंदौर आए। पहली बार 1918 में आठवें हिंदी साहित्य सम्मेलन में शामिल हुए और दूसरी बार 23 अप्रैल 1935 को इसी सम्मेलन की अध्यक्षता करने पहुंचे। दोनों यात्राओं में इंदौर ने उन्हें केवल अतिथि के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के एक प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में आत्मीयता से स्वीकार किया।

1918 में गांधीजी के आगमन पर युवाओं में विशेष उत्साह था। उन्हें रेलवे स्टेशन से राजबाड़ा और खजूरी बाजार होते हुए नेहरू पार्क तक ले जाया गया, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने उनका संबोधन सुना। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए होलकर राजघराने की ओर से आर्थिक सहयोग भी दिया गया। गांधीजी का यह दौरा हिंदी और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग बना।

1935 की यात्रा में गांधीजी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता के साथ कृषि महाविद्यालय परिसर स्थित पौधा उद्योग संस्थान का भी दौरा किया। यहां उन्होंने जैविक खाद तैयार करने की उस पद्धति को समझा, जिसे आगे चलकर ‘इंदौर पद्धति’ के नाम से पहचान मिली। वनस्पति विज्ञानी अल्बर्ट हावर्ड के कार्य से जुड़ी यह पद्धति स्थानीय संसाधनों के उपयोग और प्रकृति के साथ संतुलन की सोच का उदाहरण बनी।
यह भी उल्लेखनीय है कि गांधीजी के लिए इंदौर हिंदी के प्रचार का महत्वपूर्ण केंद्र था। वे हिंदी को देश के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने वाली संपर्क भाषा के रूप में देखते थे। स्वयं गुजराती भाषी होने के बावजूद उन्होंने हिंदी के व्यापक प्रसार को राष्ट्र की एकता से जोड़ा। इस दृष्टि से इंदौर उनके सामाजिक और राष्ट्रीय चिंतन की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।

आज जब गांधी जयंती पर इंदौर अपनी स्वच्छता की पहचान को गर्व के साथ देखता है, तब यह अवसर केवल उपलब्धियों को दोहराने का नहीं, बल्कि आगे की दिशा तय करने का भी है। स्वच्छता कोई एक दिन का संकल्प नहीं, बल्कि प्रतिदिन निभाई जाने वाली नागरिक जिम्मेदारी है।
इंदौर ने यह साबित किया है कि जब प्रशासन की व्यवस्था और नागरिकों की इच्छाशक्ति साथ आती है तो बड़े बदलाव संभव होते हैं। अब जरूरत इस सकारात्मक संस्कृति को और मजबूत करने की है। सार्वजनिक स्थानों को साफ रखना, कचरा निर्धारित स्थान पर डालना, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना और सफाईकर्मियों के श्रम का सम्मान करना—ये छोटे कदम शहर की बड़ी पहचान को स्थायी बना सकते हैं।
स्वच्छता की जिम्मेदारी केवल नगर व्यवस्था की नहीं है। जिस सड़क पर हम चलते हैं, जिस पार्क में बैठते हैं और जिस शहर में रहते हैं, वह हमारा साझा घर है। घर को साफ रखने की तरह सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।

गांधी जयंती पर इंदौर के लिए सबसे सकारात्मक संदेश यही हो सकता है कि हम अपनी उपलब्धियों पर गर्व करें, लेकिन वहीं रुकें नहीं। स्वच्छता के साथ जल संरक्षण, हरियाली, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक स्थानों की देखभाल को भी अपनी नागरिक संस्कृति का हिस्सा बनाएं।
स्वच्छ इंदौर केवल साफ सड़कों और चमकते चौराहों का नाम नहीं है। यह जागरूक नागरिकों, जिम्मेदार व्यवहार और सामूहिक सोच की पहचान है।

बापू का सपना केवल झाड़ू उठाने से पूरा नहीं होगा; वह तब साकार होगा, जब स्वच्छता हमारी आदत बनेगी, जिम्मेदारी हमारा संस्कार बनेगी और इंदौर की पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बनी रहेगी।

यही गांधीजी को सच्ची श्रद्धांजलि और स्वच्छ इंदौर के उज्ज्वल भविष्य का संकल्प है।