प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना गलती होना नहीं, बल्कि उसे उपलब्धि के प्रमाणपत्र से ढक देना है। जब सच कागजी चमक में छिपने लगे, तब व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। महाराष्ट्र मंत्रालय की कैंटीन इसका प्रतीक बनकर सामने आई। खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने स्वच्छता और अनुपालन में अट्ठानवे प्रतिशत अंक दिए और परिसर को मक्खी-कीट मुक्त बताया। रिपोर्ट आदर्श दिखी, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने उसकी चमक फीकी पड़ गई। अदालत ने रेटिंग को ‘हास्यास्पद’ बताते हुए ‘एक भी कीट नहीं?’ जैसी टिप्पणी की और चार वकीलों की टीम को एफडीए अधिकारियों के साथ जांच के लिए भेजा। यह केवल कैंटीन की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहाँ सुधार से अधिक निर्दोष दिखने वाली रिपोर्ट बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
सत्ता का आधार उसका नैतिक अधिकार होता है, जो कानून बनाने या आदेश देने से नहीं, बल्कि आचरण से अर्जित होता है। जब शासन दूसरों के लिए कठोर नियम तय करता है, स्वच्छता के नाम पर निजी प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई करता है और जवाबदेही सुनिश्चित करता है, तो उससे अपेक्षा होती है कि वह स्वयं भी उन्हीं कसौटियों पर खरा उतरे। लेकिन जब वही व्यवस्था अपनी मंत्रालय की कैंटीन को पूर्णता का प्रमाणपत्र दे और न्यायपालिका उस दावे पर सवाल उठा दे, तो यह दोहरे मापदंड को उजागर करता है। जो व्यवस्था अपनी थाली की सच्चाई नहीं परख सकती, वह समाज की थाली की सुरक्षा का भरोसा कैसे पैदा करेगी? सत्ता की असली स्वच्छता भाषणों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के आचरण में दिखाई देती है।
यह मामला केवल भोजन की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संस्कृति का प्रतीक है जहाँ अंक और प्रमाणपत्र उपलब्धि पर भारी पड़ने लगे हैं। आज कई क्षेत्रों में मूल्यांकन की चमक, जमीनी सच्चाई से अधिक महत्व पाने लगी है। परीक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियाँ हों, आपदा राहत के आंकड़ों और स्थिति में अंतर हो या योजनाओं की सफलता रिपोर्टों में दिखाई दे—हर जगह यही प्रवृत्ति नजर आती है। मंत्रालय की कैंटीन इसका छोटा लेकिन तीखा उदाहरण है। निरीक्षण की सूची पूरी हुई और अंक मिल गए, लेकिन सवाल है कि क्या अंक अनुभव का स्थान ले सकते हैं? लोकतंत्र में सम्मान प्रतिशत से नहीं, भरोसे से मिलता है। जब शासन की घोषणाएँ और जनता का अनुभव अलग दिशा में चलें, तो विश्वास की दूरी बढ़ती जाती है।
खाने की सुरक्षा को केवल स्वास्थ्य का विषय मानना इस प्रसंग को सीमित करना होगा। भोजन नागरिक गरिमा और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ा प्रश्न है। मंत्रालय वह स्थान है जहाँ राज्य की दिशा तय होती है, नीतियाँ बनती हैं और जनता के लिए नियम निर्धारित होते हैं। यदि ऐसे स्थान पर सुरक्षा केवल फाइलों में हो और वास्तविकता जानने के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना पड़े, तो यह व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है। बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी ने स्पष्ट किया कि एफडीए का व्यवहार निजी और सरकारी प्रतिष्ठानों के प्रति समान व निष्पक्ष होना चाहिए। सत्ता के परिसर भी जांच और जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकते। चाहे मंत्रालय की कैंटीन हो या बड़ा प्रशासनिक निर्णय, जवाबदेही लोकतंत्र की मजबूत नींव है।
इस मामले ने निरीक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए हैं। खाद्य एवं औषधि प्रशासन का काम केवल अंक देना नहीं, बल्कि वास्तविकता को निष्पक्ष रूप से सामने रखना है। जब किसी सरकारी परिसर को लगभग आदर्श घोषित किया जाए और बाद में उसी दावे पर प्रश्न उठें, तो चिंता केवल एक रिपोर्ट की नहीं, पूरे तंत्र की साख की होती है। निजी संस्थानों पर कठोर मानक और सरकारी प्रतिष्ठानों पर नरम मूल्यांकन समानता के सिद्धांत को कमजोर करते हैं। व्यवस्था जब अपने लिए अलग कसौटी अपनाती है, तो उसकी नैतिक शक्ति घटती है। शासन की असली प्रतिष्ठा प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और आचरण से बनती है।
सुधार का रास्ता केवल नई रेटिंग व्यवस्था बनाने से नहीं, बल्कि उस सोच को बदलने से निकलेगा जो कागजी सफलता को उपलब्धि मान लेती है। निरीक्षण प्रक्रिया में उन लोगों के अनुभव शामिल होने चाहिए, जो प्रतिदिन उस व्यवस्था का हिस्सा होते हैं। कर्मचारी, अधिकारी और भोजन करने वालों की राय को मूल्यांकन का आधार बनाया जाना चाहिए। अचानक निरीक्षण, पारदर्शी रिपोर्ट और सरकारी व निजी संस्थानों के लिए समान नियम ही विश्वास मजबूत कर सकते हैं। परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, डिजिटल मंचों की जवाबदेही या आपदा राहत की जमीनी समीक्षा—हर क्षेत्र में एक सिद्धांत लागू होना चाहिए कि आंकड़ों की चमक से पहले वास्तविकता को महत्व मिले।
मंत्रालय की कैंटीन का यह प्रसंग सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं प्रमाणपत्रों की चमक में वास्तविकता और सत्य पीछे तो नहीं छूट रहे। अट्ठानवे प्रतिशत अंक आकर्षक हो सकते हैं, लेकिन जनता का विश्वास रिपोर्ट कार्ड से नहीं, बल्कि व्यवस्था की ईमानदारी और आचरण से अर्जित होता है। अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार का साहस ही किसी संस्थान की शक्ति होती है। जो शासन आत्मालोचना से नहीं डरता, वही लंबे समय तक सम्मान और भरोसा कायम रखता है। कागजों पर चमकती उपलब्धियाँ कुछ समय प्रभाव डाल सकती हैं, लेकिन प्रतिष्ठा का आधार सच्चाई, पारदर्शिता और ईमानदारी ही बनती है।
जब किसी व्यवस्था की चमकदार रिपोर्ट और जमीनी सच्चाई में अंतर दिखाई देने लगे, तो प्रश्न केवल एक घटना का नहीं, पूरी सोच का बन जाता है। बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी प्रशासनिक मानसिकता पर चोट है, जहाँ वास्तविकता सुधारने से अधिक उसे बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सत्ता की असली स्वच्छता फाइलों, प्रमाणपत्रों और प्रतिशतों में नहीं, बल्कि व्यवहार और फैसलों में झलकती है। थाली में परोसे भोजन और रिपोर्ट में लिखे सत्य के बीच दूरी नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र केवल नियमों से नहीं, जनता के विश्वास से चलता है। विश्वास अट्ठानवे प्रतिशत अंकों से नहीं, पारदर्शी और ईमानदार आचरण से अर्जित होता है।





