ओणम : समृद्धि, समानता और सांस्कृतिक सद्भाव का उत्सव

Onam: A Celebration of Prosperity, Equality, and Cultural Harmony

फूलों की रंगोली से लेकर लोकजीवन की खुशियों तक, केरल की धरती का अनूठा पर्व

सत्य भूषण शर्मा

भारत की सांस्कृतिक विविधता की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं होते, बल्कि वे लोकजीवन, प्रकृति, आस्था, परंपरा और मानवीय रिश्तों को जोड़ने वाले जीवंत सेतु होते हैं। केरल का ओणम ऐसा ही अनुपम पर्व है, जिसमें उत्सव के साथ लोककथा, कृषि-संस्कृति, प्रकृति-प्रेम, सामाजिक समानता और पारिवारिक आत्मीयता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वर्ष 2026 में ओणम का मुख्य पर्व 26 अगस्त को मनाया जाएगा।

ओणम को सामान्यतः फसल और समृद्धि के पर्व के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसका भाव इससे कहीं व्यापक है। यह उस सांस्कृतिक स्मृति का उत्सव है, जिसमें केरल के लोकप्रिय राजा महाबली को न्यायप्रिय, उदार और अपनी प्रजा के प्रति अत्यंत संवेदनशील शासक के रूप में याद किया जाता है। लोकविश्वास है कि महाबली के शासनकाल में प्रजा सुखी और समृद्ध थी तथा समाज में भेदभाव बहुत कम था।

महाबली की वापसी का लोकविश्वास
ओणम की सबसे लोकप्रिय कथा राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार महाबली की लोकप्रियता और प्रजा के प्रति उनका प्रेम इतना अधिक था कि देवताओं को चिंता होने लगी। भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा महाबली से तीन पग भूमि मांगी। महाबली ने इसे स्वीकार किया।

वामन ने विराट रूप धारण कर दो पगों में धरती और आकाश नाप लिए। तीसरा पग रखने के लिए महाबली ने अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। लोककथा के अनुसार उनकी भक्ति, दानशीलता और प्रजा-प्रेम से प्रसन्न होकर उन्हें वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने का वरदान मिला। यही कारण है कि ओणम के दिनों में केरलवासी मानते हैं कि उनके प्रिय राजा महाबली अपनी प्रजा का हाल जानने आते हैं।

यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि अच्छे शासन और लोककल्याण की उस कल्पना को भी सामने रखती है जिसमें शासक और जनता के बीच विश्वास सर्वोपरि होता है।

पुक्कलम में खिलती है प्रकृति
ओणम का सबसे आकर्षक दृश्य है—पुक्कलम, अर्थात फूलों से बनाई जाने वाली रंगोली। घरों के आंगन में कई दिनों तक अलग-अलग रंगों और किस्मों के फूलों से सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं। यह सजावट केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और उत्सव में उसकी सहभागिता का प्रतीक है।

पुक्कलम हमें यह संदेश भी देता है कि प्रकृति की छोटी-छोटी सुंदरताओं को सहेजकर जीवन में आनंद भरा जा सकता है। बदलते समय में जब शहरीकरण और कृत्रिम सजावट का चलन बढ़ रहा है, तब प्राकृतिक फूलों से सजाया गया आंगन पर्यावरण के साथ हमारे रिश्ते की याद दिलाता है।

ओणम साध्या : स्वाद में समाई परंपरा
ओणम के उत्सव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है ओणम साध्या—पारंपरिक सामूहिक भोजन। केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले इस भोजन में अनेक पारंपरिक व्यंजन शामिल होते हैं। भोजन की विविधता जितनी आकर्षक होती है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका सामूहिक स्वरूप है।

एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करना सामाजिक समानता और सामूहिकता की भावना को मजबूत करता है। यही ओणम का वह संदेश है जिसकी आज के समाज को विशेष आवश्यकता है—समृद्धि का वास्तविक आनंद तभी है, जब उसमें दूसरों की खुशी भी शामिल हो।

वल्लमकली और लोककला का उल्लास
ओणम के दौरान केरल की पारंपरिक संस्कृति अपने अनेक रंगों के साथ सामने आती है। वल्लमकली, यानी पारंपरिक नाव दौड़, इस पर्व का विशेष आकर्षण है। लंबी नावों में बड़ी संख्या में लोग एक साथ बैठकर तालमेल के साथ नाव चलाते हैं। यह केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सामूहिक शक्ति, अनुशासन और सहयोग का अद्भुत उदाहरण है।

ओणम के अवसर पर लोकगीत, पारंपरिक नृत्य, खेल और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। इस प्रकार यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी लोकपरंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।

किसान और खेतों के प्रति कृतज्ञता
ओणम मूल रूप से कृषि-जीवन से गहराई से जुड़ा पर्व है। फसल, वर्षा, मिट्टी और किसान—इन सभी के प्रति कृतज्ञता इसकी मूल भावना में दिखाई देती है। खेतों में नई फसल की खुशी केवल किसान के घर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरा समाज उसे उत्सव के रूप में मनाता है।

आज जब भोजन हमारी थाली तक पहुंचने की लंबी प्रक्रिया से गुजरता है और शहरी जीवन में खेती से दूरी बढ़ती जा रही है, तब ओणम हमें याद दिलाता है कि हमारी समृद्धि की नींव खेतों में मेहनत करने वाले किसानों और प्रकृति के संसाधनों पर टिकी है।

ओणम का सबसे बड़ा संदेश—सबके लिए खुशियां
ओणम की सबसे बड़ी विशेषता उसका समावेशी भाव है। यह पर्व लोगों को परिवार, पड़ोस और समाज के स्तर पर एक-दूसरे से जोड़ता है। घरों की सजावट से लेकर सामूहिक भोजन और सांस्कृतिक आयोजनों तक, हर जगह मिल-जुलकर उत्सव मनाने की भावना दिखाई देती है।

महाबली की कथा में जिस आदर्श समाज की कल्पना दिखाई देती है, उसमें सुख-सुविधा के साथ न्याय, समानता और लोककल्याण को महत्व दिया गया है। आज के समय में जब समाज अनेक प्रकार के विभाजनों से गुजर रहा है, ओणम का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

परंपरा को आधुनिकता से जोड़ने की जरूरत
समय बदलता है और त्योहार मनाने के तरीके भी बदलते हैं, लेकिन त्योहारों की आत्मा को बचाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। ओणम को आधुनिक रूप देते समय हमें इसकी पर्यावरणीय और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए। प्राकृतिक फूलों का उपयोग, स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन, अनावश्यक प्लास्टिक से दूरी और लोककलाओं का संरक्षण—ऐसे छोटे कदम पर्व की मूल भावना को और मजबूत कर सकते हैं।

ओणम हमें यह भी सिखाता है कि संस्कृति किसी संग्रहालय में रखी वस्तु नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने वाली जीवंत परंपरा है। जब बच्चे पुक्कलम बनाते हैं, पारंपरिक गीत सीखते हैं, लोकनृत्य देखते हैं और परिवार के साथ साध्या का आनंद लेते हैं, तब संस्कृति केवल याद नहीं की जाती—वह जी जाती है।

ओणम से पूरे भारत के लिए संदेश
भारत की पहचान उसकी विविधता में छिपी एकता है। उत्तर में अलग लोकपर्व हैं, पश्चिम में अलग परंपराएं, पूर्व में अलग सांस्कृतिक रंग और दक्षिण में अलग उत्सव। फिर भी इन सभी के केंद्र में मनुष्य, प्रकृति, परिवार और समाज के प्रति सम्मान का भाव दिखाई देता है।

ओणम इसी भारतीय विचारधारा को एक सुंदर रूप में प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि सच्ची समृद्धि केवल धन और भौतिक सुविधाओं में नहीं, बल्कि समानता, सहयोग, प्रकृति के सम्मान और सामूहिक खुशियों में निहित है।

26 अगस्त को जब केरल की धरती फूलों की रंगोली से सजेगी, पारंपरिक गीत गूंजेंगे, नावें लहरों को चीरेंगी और परिवार साथ बैठकर भोजन करेंगे, तब ओणम केवल केरल का पर्व नहीं रहेगा। वह पूरे भारत को यह संदेश देगा कि उत्सव वही सार्थक है, जिसमें किसी एक की नहीं, सबकी खुशियां शामिल हों।

ओणम की यही आत्मा भारतीय संस्कृति की सबसे सुंदर पहचान है—साथ चलना, साथ खिलना और साथ मिलकर समृद्धि का उत्सव मनाना।