राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव : विधानसभा चुनाव 2028 का सेमीफाइनल?

Urban Local Body Elections in Rajasthan: A Semifinal to the 2028 Assembly Elections?

एन जी भट्ट

राजस्थान में शहरों की सरकारों का गठन करने के लिए राज्य की 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डो के चुनाव कराने के लिए विगत 19 अगस्त को राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ से ही राज्य के शहरी क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता लागू है। इन चुनावों में राज्य के 1.44 करोड़ से भी अधिक शहरी मतदाताओं द्वारा अपने मताधिकार का उपयोग किया जायेगा।

स्थानीय निकायों के चुनावों के लिए 26 अगस्त को ईद के अवकाश के बाद और रक्षाबंधन के त्यौहार से एक दिन पहले 27 अगस्त को चुनाव अधिसूचना जारी होगी और इसके साथ ही प्रदेश में नामांकन की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो जाएगी । इसके बाद 31 अगस्त तक नामांकन भरे जा सकेंगे एवं 1 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच हाेंगी। इसके पश्चात 3 सितंबर को नाम वापसी का आख़िरी दिन रहेगा और 4 सितंबर को चुनाव चिह्न आवंटित किए जायेंगे ।

प्रदेश में स्थानीय निकायों के चुनाव दो चरणों में होगें। पहले चरण का मतदान 9 सितंबर 2026 और दूसरे चरण का मतदान 11 सितंबर 2026 को होगा। पहले चरण 9 सितंबर 2026 को प्रदेश के चार जिलों भरतपुर, अलवर, भीलवाड़ा और पाली के संबंधित नगर निगम,नगर परिषद एवं नगर पालिकाओं के साथ जयपुर जिले के 18 नगरीय निकायों में मतदान होगा। वहीं दूसरे चरण 11 सितंबर 2026 को जयपुर, जोधपुर,कोटा,बीकानेर, उदयपुर और अजमेर नगर निगमों के साथ ही इन छह प्रमुख शहरों के साथ इन जिलों के अन्य नगरीय क्षेत्रों में पार्षद चुनने के लिए मतदान होगा। इन चुनावों में ईवीएम मशीनों का उपयोग किया जाएगा।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव केवल स्थानीय सत्ता के गठन की कवायद नहीं हैं। बल्कि 309 नगरीय निकायों और 1.44 करोड़ से भी अधिक मतदाताओं से जुड़ा यह चुनाव प्रदेश की राजनीति के लिए 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा सरकार के समक्षव उसके ढाई वर्षों के कार्यकाल की शहरी क्षेत्रों में यह पहली व्यापक चुनावी परीक्षा होगी, वहीं कांग्रेस के लिए यह सत्ता से बाहर रहने के बाद अपने संगठन और जनाधार की वास्तविक स्थिति परखने का अवसर है। इसलिए इन चुनावों को स्वाभाविक रूप से विधानसभा चुनाव – 2028 का ‘सेमीफाइनल’ माना जा रहा है। प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा ) के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता की उपलब्धियों को स्थानीय स्तर पर वोट में बदलने की हैं। इन चुनावों में भजन लाल सरकार विकास, बुनियादी ढांचे, निवेश और शहरी सुविधाओं के विस्तार को अपनी उपलब्धियों के रूप में सामने रख सकती है। भाजपा के लिए टिकट वितरण भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बड़े शहरों में हजारों दावेदारों का सामने आना पार्टी की मजबूत संगठनात्मक स्थिति का संकेत तो है, लेकिन यही स्थिति बगावत और भीतरघात का कारण भी बन सकती है। आरक्षण की नई व्यवस्था से अनेक पुराने राजनीतिक समीकरण बदले हैं। महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित वार्डों ने नए चेहरों के लिए अवसर पैदा किए हैं। टिकट से वंचित दावेदारों को साधना भाजपा की चुनावी रणनीति की बड़ी परीक्षा होगी। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए ये चुनाव संगठन के पुनर्निर्माण की परीक्षा हैं। दोनों दलों ने राज्य,जिला और निकाय स्तर पर अपने अपने पर्यवेक्षक नियुक्त किए है ।

स्थानीय निकायों के चुनाव के मुद्दे विधानसभा और लोकसभा चुनावों से भिन्न होते हैं तथा मतदाता का फैसला अक्सर व्यापक घोषणाओं से अधिक रोजमर्रा की समस्याओं पर निर्भर करता है। सड़कें, पेयजल, सीवरेज, सफाई, स्ट्रीट लाइट, यातायात, अतिक्रमण और जलभराव जैसे मुद्दे सीधे नगर निकायों के कामकाज से जुड़े हैं। बारिश के दौरान सामने आने वाली जलनिकासी की समस्याएं भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनती हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार वर्ष 2023 ने हुए विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा और कांग्रेस ने शहरी क्षेत्रों में अपने पारंपरिक आधार को फिर सक्रिय किया है। दोनों दल यदि स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाती है और मजबूत उम्मीदवार उतारती है तो वह एक दूसरे के सामने कड़ी चुनौती पेश कर सकते है। भाजपा का सत्ता में होने और कांग्रेस का केवल सरकार विरोधी माहौल के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। वार्ड स्तर पर मजबूत संगठन, बूथ प्रबंधन और प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पकड़ निर्णायक होगी।इन चुनावों में मतदाता का फैसला अक्सर व्यापक घोषणाओं से अधिक रोजमर्रा की समस्याओं पर निर्भर करता है। जैसे सड़कें, पेयजल, सीवरेज, सफाई, स्ट्रीट लाइट, यातायात, अतिक्रमण और जलभराव जैसे मुद्दे सीधे नगर निकायों के कामकाज से जुड़े हैं। बारिश के दौरान सामने आने वाली जल निकासी की समस्याएं भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बन सकती हैं। इन चुनावों में जातीय और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण रहेंगे। राजस्थान की राजनीति में जाट, गुर्जर, राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य, दलित और आदिवासी समाज सहित विभिन्न सामाजिक समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण है। हालांकि नगरीय चुनावों में जातीय समीकरण के साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और स्थानीय स्वीकार्यता भी उतनी ही प्रभावी होती है। इस बार भाजपा और कांग्रेस के समक्ष अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ ही जैन जी का युवा वर्ग भी बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव परिणामों से निकलने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश राज्य की भावी राजनीति को इंगित करने वाला हो सकता है। यदि भाजपा बड़ी संख्या में निकायों पर नियंत्रण स्थापित करती है तो इसे सरकार के विकास कार्यों पर जनता की मुहर मानने और संगठन की मजबूती के संकेत के रूप में देखा जाएगा। यदि प्रतिपक्ष में बैठी कांग्रेस उल्लेखनीय वापसी करती है तो उसे विधानसभा चुनाव 2028 से पहले उसके पुनर्जीवन के नैरेटिव को मजबूत माना जायेगा। निर्दलीय और स्थानीय समूहों का प्रदर्शन भी दोनों दलों के लिए चेतावनी या अवसर का संकेत दे सकता है।

अंततः राजस्थान में निकाय चुनाव विधानसभा चुनाव – 2028 की अंतिम तस्वीर नहीं, लेकिन उसका पहला राजनीतिक एक्स-रे जरूर होंगे। ये चुनाव बताएंगे कि जनता सरकार के कामकाज को किस नजर से देख रही हैं, कौन-सा दल बूथ तक कितना मजबूत है और बदलते सामाजिक समीकरण किस दिशा में जा रहे हैं। इसलिए राजस्थान में 309 स्थानीय निकायों के चुनावों की यह लड़ाई शहरों की स्थानीय सत्ता से आगे बढ़कर राजस्थान की अगली विधानसभा की राजनीतिक जमीन तैयार करने वाली एक निर्णायक परीक्षा भी बन सकती है।