पांडू पिंडारा की पावन धरती पर पत्रकारों द्वारा पौधारोपण

Journalists plant trees on the sacred land of Pandu Pindara

आस्था,पर्यावरण और आधुनिक भारत के स्वर्णिम भविष्य का अद्भुत संगम

विनोद ,सिंह ‘तकियावाला’

भारत की आत्मा उसकी सनातन सांस्कृतिक परंपराओं में बसती है।यही वह पावन भूमि है,जहाँ नदियों को माता, पर्वतों को देवता और वृक्षों को जीवनदाता का सम्मान दिया गया।हमारे ऋषि- मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को सभ्यता की आधारशिला माना था।आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है,तब भारत एक बार फिर अपनी प्राचीन जीवन-दृष्टि और आधुनिक विज्ञान के समन्वय के साथ विश्व का मार्गदर्शन करने की दिशा में अग्रसर दिखाई देता है।हरियाणा के ऐतिहासिक जनपद जींद के समीप स्थित पांडू पिंडारा की पावन धरती पर ऐसा ही एक भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण साकार हुआ।आज का पावन दिन हमारे लिए था।हरित प्रदेश हरियाणा के जींद से पांडू पिड़रा तक हाइड्रोजन ट्रेन ऐतिहासिक यात्रा में एक यात्री के रूप मै शरीक होने का अवशर मिला है। आज के इस यात्रा यादगार तब हो गया जब इस यात्रा के उपरांत इस पवित्र स्थल पर वृक्षारोपण का कार्यक्रम में शरीक हुए। सर्व विदित रहे कि यह आयोजन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था,बल्कि यह प्रकृति,संस्कृति और वैज्ञानिक प्रगति के त्रिवेणी संगम का जीवंत प्रतीक बन गया।इस ऐतिहासिक अवसर का प्रत्यक्ष साक्षी बनने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ।जींद रेलवे स्टेशन से पांडू पिंडारा रेलवे स्टेशन तक हाइड्रोजन ट्रेन की प्रथम मीडिया यात्रा में अपने मीडिया मित्रों – कुन्दन सिंह,लुबना आशिफ,कंचन अरोरा और राजवीर नरवाल के साथ सहभागी बनना जो मेरे पत्रकारिता जीवन के अविस्मरणीय क्षणों में शामिल हो गया।हाईड्रोजन ट्रेन की शांत गति,स्वच्छ ऊर्जा का संदेश और भविष्य की ओर बढ़ते भारत की आत्मविश्वासपूर्ण चाल को निकट से देखना एक अद्भुत अनुभव था।यात्रा के उपरांत क्षेत्रीय रेलवे स्टेशन पर मौजूद मदनलाल वन दारोगा व रेलवे कर्मचारी के विशेष आग्रह पर हमें वृक्षारोपण करने का सौभाग्य मिला।हमने पीपल,नीम और शीशम जैसे वृक्षों के पौधे लगायें।भारतीय संस्कृति में इन वृक्षों का महत्व केवल पर्यावरणीय नहीं,बल्कि आध्यात्मिक भी है।पीपल को प्राणवायु और जीवन का प्रतीक माना गया है,नीम स्वास्थ्य और संरक्षण का संदेश देता है,जबकि शीशम दीर्घायु, मजबूती और स्थायित्व का परिचायक है।जिस दिन भारत ने स्वच्छ ऊर्जा आधारित रेल परिवहन के नए युग में प्रवेश किया,उसी दिन इन पौधों का रोपण इस विश्वास का प्रतीक बन गया कि विकास तभी सार्थक है,जब उसके साथ प्रकृति का संरक्षण भी जुड़ा हो।पांडू पिंडारा का महत्व केवल एक रेलवे स्टेशन तक सीमित नहीं है।स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और लोकपरंपराओं के अनुसार यह क्षेत्र भारतीय सभ्यता की प्राचीन स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है।मान्यता है कि सतयुग में निकटवर्ती नेबरहा ग्राम में भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण किया था।त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान इस क्षेत्र में विश्राम किया और लोकविश्वास के अनुसार यहाँ एक पवित्र सरोवर का निर्माण कराया।द्वापर युग में महाभारत युद्ध के उपरांत पांडवों ने अपने पितरों की आत्मशांति के लिए इसी क्षेत्र में पिंडदान किया, जिसके कारण इस स्थान का नाम ‘पांडू पिंडारा’ प्रसिद्ध हुआ।आज भी देश के अनेक भागों से श्रद्धालु यहाँ आकर पितृ तर्पण और पिंडदान करते हैं।इन धार्मिक मान्यताओं का ऐतिहासिक मूल्य चाहे जैसा हो,किंतु स्थानीय समाज की आस्था और सांस्कृतिक पहचान में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।यही आस्था पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ती है और यही हमारी सांस्कृतिक निरंतरता की सबसे बड़ी शक्ति है।मुझे उस क्षण बार-बार यह अनुभव हो रहा था कि एक ओर हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृतियाँ हैं और दूसरी ओर इक्कीसवीं सदी की अत्याधुनिक हाइड्रोजन तकनीक। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा के पूरक हैं।यही भारत की विशेषता है कि वह अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए आधुनिक विज्ञान को भी समान उत्साह से अपनाता है।वृक्षारोपण का यह छोटा-सा कार्य आने वाले वर्षों में एक बड़े संदेश का वाहक बनेगा। आज लगाए गए पौधे कल विशाल वृक्ष बनेंगे।वे आने वाली पीढ़ियों को बताएँगे कि जिस दिन भारत ने हरित ऊर्जा आधारित रेल परिवहन का नया अध्याय प्रारम्भ किया,उसी दिन प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का संकल्प भी दोहराया था।आज आवश्यकता केवल तकनीकी प्रगति की नहीं,बल्कि पर्यावरणीय चेतना की भी है।यदि विकास के साथ वृक्ष नहीं बचेंगे,नदियाँ स्वच्छ नहीं रहेंगी और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता रहेगा,तो कोई भी आर्थिक उपलब्धि टिकाऊ नहीं होगी।भारतीय संस्कृति सदैव कहती आई है कि प्रकृति का सम्मान ही मानव जीवन की समृद्धि का आधार है।नई पीढ़ी के लिए पांडू पिंडारा का यह संदेश अत्यंत प्रेरणादायक है। आधुनिकता का अर्थ अपनी सांस्कृतिक पहचान को भूल जाना नहीं है।विज्ञान और अध्यात्म,विकास और पर्यावरण, तकनीक और परंपरा -इन सभी का संतुलित समन्वय ही भारत की वास्तविक शक्ति है।हाइड्रोजन ट्रेन और वृक्षारोपण का यह संयुक्त आयोजन उसी राष्ट्रीय सोच का सशक्त प्रतीक है।
जब मैं लौट रहा था,तब मन में एक ही विचार बार-बार उभर रहा था-आज लगाए गए पीपल,नीम और शीशम के ये पौधे केवल वृक्ष नहीं हैं।ये उस ऐति हासिक दिन की जीवंत स्मृतियाँ हैं,जब पांडू पिंडारा की पावन धरती ने एक साथ आस्था,प्रकृति और आधुनिक विज्ञान का स्वागत किया।आने वाले वर्षों में जब ये वृक्ष छाया देंगे,तब वे केवल यात्रियों को विश्राम नहीं देंगे,बल्कि यह भी याद दिलाएँगे कि भारत का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब विकास की हर नई यात्रा प्रकृति और संस्कृति के सम्मान के साथ आगे बढ़ेगी।