बदल रहे भारत-चीन के रिश्ते : क्या चीन को अब भारत की जरूरत ज्यादा है?

Changing India-China Relations: Does China Need India More Now?

राजेश जैन

गलवान की झड़प ने भारत और चीन के रिश्तों में ऐसी दरार पैदा की थी, जिसे भरना आसान नहीं था। 15 जून 2020 के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ा, सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ी और आर्थिक रिश्तों पर भी इसकी छाया पड़ गई। ऐसा लगा कि भारत-चीन संबंध लंबे समय तक टकराव के दौर में रहेंगे।लेकिन अब तस्वीर कुछ बदलती दिख रही है। सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा और ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात इस बदलाव का बड़ा संकेत है। यह केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं है। इसके पीछे बदलती वैश्विक राजनीति के साथ चीन की अपनी आर्थिक मजबूरियां भी दिखाई देती हैं।

सीमा पर प्रतिद्वंद्वी, बाजार में साझेदार

भारत और चीन के रिश्तों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सीमा पर दोनों आमने-सामने हैं, लेकिन व्यापार में एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। दोनों देशों के बीच करीब 151.5 अरब डॉलर का व्यापार है। दूसरी तरफ, भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर से ज्यादा हो चुका है। यानी भारत चीन से जितना खरीदता है, उसके मुकाबले चीन को बहुत कम बेच पाता है।

भारत चीन के लिए केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि विशाल और तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। उदाहरण के लिए, भारत ने 2025 में चीन से करीब 57 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरण खरीदे। 2025 में भारत में 15 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन बिके और उनमें बड़ी संख्या चीनी कंपनियों या चीनी कलपुर्जों से जुड़ी थी। शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसी कंपनियों ने भारत में बड़ा बाजार बनाया है। ऑटोमोबाइल और स्टार्ट-अप क्षेत्र में भी चीनी कंपनियों और निवेशकों की पहले से मौजूद दिलचस्पी रही है। स्मार्टफोन, दूरसंचार उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक्स की सप्लाई चेन में चीनी कलपुर्जों की मौजूदगी बताती है कि भारत के लिए चीन से दूरी बनाना जितना राजनीतिक नारा हो सकता है, उतना आसान आर्थिक फैसला नहीं है। दवा उद्योग भी चीन से आने वाले एपीआई पर काफी निर्भर है। यानी भारत चीन पर निर्भर है, लेकिन चीन भी भारत के बाजार को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं है।

चीन की बड़ी चिंता अर्थव्यवस्था है

भारत-चीन संबंधों में आए बदलाव को समझने के लिए चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था पर नजर डालना जरूरी है। अमेरिका के साथ व्यापार तनाव और टैरिफ, कमजोर होती वैश्विक मांग, रियल एस्टेट संकट, युवाओं में रोजगार की चिंता और घरेलू खपत की कमजोरी चीन के सामने बड़ी चुनौतियां हैं।

चीन दुनिया का बड़ा निर्माता और निर्यातक है, लेकिन समस्या यह है कि उसके पास सामान तो बहुत है, उसे खरीदने वाले ग्राहक उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहे हैं।

दूसरी ओर, भारत की बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था चीन के लिए एक ऐसा बाजार है, जहां आने वाले वर्षों में मांग बढ़ने की संभावना है। चीन के लिए भारत को खोना केवल एक पड़ोसी बाजार खोना नहीं होगा, बल्कि अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार को जोखिम में डालना भी होगा।

गलवान के बाद भी चीन ने भारत के साथ व्यापार बंद करने की कोशिश नहीं की। विशेषज्ञों का तर्क है कि चीन के छोटे और मध्यम कारोबारी भारत के साथ व्यापार करते हैं और इससे चीन के घरेलू बाजार में पैसा पहुंचता है। उनके अनुसार, भारत के साथ व्यापार आने वाले वर्षों में 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे संकेत मिलता है कि चीन भारत को केवल वर्तमान बाजार के रूप में नहीं, बल्कि लंबे समय के आर्थिक अवसर के रूप में देखता है।

चीन भारत को करीब लाना चाहता है, लेकिन भरोसा अभी दूर है

भारत के साथ खुला टकराव चीन के लिए महंगा हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा पहले से तेज है। ऐसे में चीन की रणनीति आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने और उसके जरिए राजनीतिक तथा कूटनीतिक रिश्तों में सामान्यता लाने की हो सकती है।

भारत भी इस स्थिति को समझता है। इसलिए पिछले कुछ समय में सीधी उड़ानों की वापसी और चीनी कारोबारी यात्रियों के लिए वीजा प्रक्रिया में आसानी जैसे कदम दिखाई दिए हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं को किनारे रख दिया है। अलीपे जैसी चीनी भुगतान सेवा को भारत के तत्काल भुगतान सिस्टम से जोड़ने के प्रस्ताव को सुरक्षा कारणों से मंजूरी नहीं मिलना और शाओमी को लेकर जांच की संभावनाएं बताती हैं कि आर्थिक संपर्क बढ़ाने और रणनीतिक सावधानी बरतने की नीति साथ-साथ चल रही है। यानी भारत का संदेश साफ है-कारोबार हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं।

भारत के लिए मौका भी है और जोखिम भी

भारत को चीन के साथ रिश्ते सुधारने से कुछ स्पष्ट फायदे हो सकते हैं। सीमा पर तनाव कम होगा तो सैन्य दबाव और संसाधनों की खपत कम हो सकती है। व्यापार और निवेश का माहौल बेहतर हो सकता है। भारतीय उद्योगों को जरूरी कलपुर्जों और कच्चे माल की सप्लाई में स्थिरता मिल सकती है।

लेकिन खतरा यह है कि अगर भारत फिर से चीनी सप्लाई चेन पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है तो भविष्य में यही निर्भरता रणनीतिक कमजोरी बन सकती है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर उपकरण, बैटरी, दुर्लभ खनिज और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में।

इसलिए भारत की सही रणनीति चीन से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना हो सकती है। दूसरे शब्दों में, भारत को चीन से व्यापार करना है, लेकिन चीन पर निर्भर नहीं होना है।

ब्रिक्स में साथ आने की मजबूरी

भारत और चीन के रिश्तों में बदलाव का एक दूसरा महत्वपूर्ण मंच ब्रिक्स है। ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का पुराना समूह नहीं रहा। इसका विस्तार हुआ है और इसमें बड़ी संख्या में उभरती अर्थव्यवस्थाएं और साझेदार देश शामिल हो रहे हैं। इसके सदस्य दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यहीं भारत और चीन के रास्ते एक-दूसरे से मिलते भी हैं और अलग भी होते हैं।

चीन ब्रिक्स को ऐसी वैश्विक ताकत के रूप में देखना चाहता है, जो अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था को चुनौती दे सके। लेकिन भारत का नजरिया कुछ अलग है। वह ब्रिक्स को सीधे अमेरिका-विरोधी मंच बनाने के बजाय ग्लोबल साउथ के देशों के सहयोग के मंच के रूप में देखना चाहता है। यही फर्क आने वाले वर्षों में भारत-चीन रिश्तों की सीमा भी तय करेगा।

नया रिश्ता कैसा होगा?

भारत और चीन के बीच पूरी दोस्ती की उम्मीद करना शायद अवास्तविक है। सीमा विवाद बना हुआ है। रणनीतिक अविश्वास कायम है। पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों की स्थिति अलग है। हिंद महासागर से लेकर तकनीक और सप्लाई चेन तक दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।

लेकिन दूसरी तरफ दोनों यह भी समझ रहे हैं कि हर मुद्दे पर टकराव संभव नहीं है। इसलिए आने वाले समय का भारत-चीन रिश्ता शायद न दोस्ती का होगा, न दुश्मनी का। यह ‘मैनेज्ड कॉम्पिटिशन’ यानी नियंत्रित प्रतिस्पर्धा का रिश्ता हो सकता है।

दोनों देश सीमा विवाद पर अपनी-अपनी स्थिति बनाए रखें, लेकिन सैन्य तनाव को नियंत्रित करें। व्यापार जारी रखें, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में निर्भरता कम करें। ब्रिक्स जैसे मंचों पर साथ काम करें, लेकिन वैश्विक व्यवस्था को लेकर अपने अलग नजरिए को भी बनाए रखें। यानी रिश्तों का नया मॉडल टकराव को खत्म करने के बजाय उसे नियंत्रित करने पर आधारित हो सकता है।

असली परीक्षा अभी बाकी है

शी जिनपिंग की भारत यात्रा और मोदी-शी बातचीत को रिश्तों में सुधार का संकेत जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसे निर्णायक मोड़ कहना अभी जल्दबाजी होगी। बातचीत का असली असर सीमा पर, व्यापार नीति में और रणनीतिक फैसलों में दिखाई देगा।

भारत को यह भी देखना होगा कि चीन की आर्थिक जरूरत को वह किस तरह अपने हित में बदल सकता है। चीन को भारत का बाजार चाहिए तो भारत को इसके बदले क्या चाहिए? बेहतर बाजार पहुंच? तकनीक का हस्तांतरण? भारतीय कंपनियों के लिए चीन में अवसर? व्यापार घाटे में कमी? सीमा पर स्थिरता?
यही असली सौदेबाजी है।

भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता शायद यही है कि वह चीन के साथ संवाद भी रखे और अपनी तैयारी भी। न तो भावनात्मक दुश्मनी भारत के हित में है और न ही जल्दबाजी में दोस्ती।

भारत-चीन रिश्तों में बदलाव का मतलब यह नहीं कि पुरानी दुश्मनी खत्म हो गई है। इसका मतलब सिर्फ इतना हो सकता है कि दोनों देश अब अपने मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे की जरूरत को ज्यादा स्पष्ट रूप से समझ रहे हैं। और अगर ऐसा है, तो आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि भारत और चीन दोस्त बनेंगे या नहीं, सवाल यह होगा कि इस बदलते रिश्ते में किसकी जरूरत किस पर ज्यादा भारी पड़ती है-चीन की भारत के बाजार की या भारत की चीन की सप्लाई चेन की?