बिहार से बस्तर तक 1000 किलोमीटर की किसान-यात्रा : तलाश हुई पूरी, अब साथ मिलकर बिहार में लिखेंगे खेती का नया इतिहास

A 1,000-km Farmers' Journey from Bihar to Bastar: The Quest Concludes; Now, Together We Will Write a New History of Agriculture in Bihar

रविवार दिल्ली नेटवर्क

कोंडागांव : बिहार के प्रगतिशील किसानों का एक दल लगभग 1000 किलोमीटर की सड़क यात्रा कर कोंडागांव स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर पहुंचा। उद्देश्य था ऐसी कृषि तकनीकों को प्रत्यक्ष देखना, जिन्हें अपनाकर खेती को कम लागत, अधिक टिकाऊ और अधिक लाभकारी बनाया जा सके। फार्म भ्रमण के दौरान किसानों ने ‘मां दंतेश्वरी काली मिर्च-16 (MDBP-16)’ और प्राकृतिक रूप से विकसित नेचुरल ग्रीनहाउस का बारीकी से निरीक्षण किया। लगभग 100 फीट तक पेड़ों पर चढ़ी काली मिर्च की बेलों को देखकर किसान खासे प्रभावित हुए। एक बेल से 10 किलो तक सूखी काली मिर्च उत्पादन की संभावना उनके लिए पहले विश्वास करना कठिन था, लेकिन खेत में फसल देखकर उनकी शंकाएं दूर हुईं। नेचुरल ग्रीनहाउस पर प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययन में भी 8 से 10 किलोग्राम सूखी काली मिर्च प्रति बेल के उत्पादन के आंकड़े दर्ज किए गए हैं। ऑस्ट्रेलियन टीक के मोटे, मजबूत पेड़ों और उनकी लकड़ी की गुणवत्ता ने भी किसानों को विशेष रूप से आकर्षित किया। उन्हें बताया गया कि ये जीवित पेड़ केवल काली मिर्च को सहारा नहीं देते, बल्कि अपनी छतरी से प्रकाश, तापमान, हवा और नमी को नियंत्रित कर प्राकृतिक पॉलीहाउस जैसा सूक्ष्म वातावरण तैयार करते हैं।

बिहार में इस मॉडल की संभावनाओं को लेकर किसानों के मन में प्रारंभिक संशय था। चर्चा के दौरान उन्हें समझाया गया कि उपयुक्त परिस्थितियों में बर्फीले और अत्यंत रेगिस्तानी क्षेत्रों को छोड़कर विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में इसकी संभावनाओं का परीक्षण किया जा सकता है।

पेड़ों की जड़ों से जुड़े सूक्ष्मजीवी तंत्र द्वारा जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा पेड़ों से लगातार गिरने वाली पत्तियों से बनने वाली जैविक खाद ने किसानों को इस मॉडल के वैज्ञानिक पक्ष से भी परिचित कराया। इससे खेत में पोषक तत्वों के प्राकृतिक चक्र को मजबूत करने और बाहरी सिंथेटिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने की दिशा में मदद मिलती है।

फार्म भ्रमण मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के निदेशक अनुराग कुमार तथा जसमती नेताम एवं शंकर नाग के मार्गदर्शन में कराया गया। विस्तृत निरीक्षण और संवाद के बाद बिहार के किसानों ने मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के साथ जुड़कर इस मॉडल को बिहार में आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
यह यात्रा केवल 1000 किलोमीटर की दूरी तय करने की कहानी नहीं है, बल्कि बस्तर से बिहार तक खेती के एक नए विचार के पहुंचने की शुरुआत है।