ब्रिक्स से भारत को कितना फायदा? बढ़ते मतभेदों के बीच कूटनीतिक संतुलन की बड़ी परीक्षा

How much does India benefit from BRICS? A major test of diplomatic balance amidst growing differences

प्रीति पाण्डेय

नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक क्षमता के लिए अहम परीक्षा बन गया है। भारत चौथी बार इस बहुपक्षीय समूह के शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। हालांकि, इस बार परिस्थितियां पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हैं।

ब्रिक्स के मौजूदा अध्यक्ष के रूप में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती समूह के भीतर बढ़ते मतभेदों के बीच साझा सहमति कायम करना है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच ही कई मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं और कुछ सदस्य सीधे एक-दूसरे के विरोध में खड़े दिखाई देते हैं।

ऐसे माहौल में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि आखिर भारत को ब्रिक्स से क्या हासिल हो रहा है और क्या यह मंच नई दिल्ली के रणनीतिक हितों के लिए वास्तव में उपयोगी है?

ब्रिक्स के भीतर बढ़ता तनाव
मई में भारत की मेजबानी में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक किसी साझा बयान पर सहमति के बिना समाप्त हुई थी। इसे समूह के भीतर मौजूद मतभेदों का एक महत्वपूर्ण संकेत माना गया।

पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर सदस्य देशों के नजरिए अलग-अलग हैं। ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के हित और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते। ऐसे में सभी सदस्य देशों को एक साझा रुख पर लाना भारत के लिए आसान नहीं होगा।

अब निगाहें शिखर सम्मेलन पर हैं। अगर यहां भी किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर संयुक्त घोषणा या साझा सहमति नहीं बनती है, तो भारत की अध्यक्षता की प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं।

भारत के लिए चुनौती केवल एक सफल सम्मेलन आयोजित करने की नहीं है। उसे यह भी दिखाना होगा कि वह अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देशों के बीच संवाद और सहयोग का रास्ता निकाल सकता है।

पांच देशों के समूह से 10 सदस्यीय मंच तक
ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ। लंबे समय तक यही पांच देश समूह की मुख्य पहचान रहे।

पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स का तेजी से विस्तार हुआ है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देश इसके दायरे में आए हैं। सऊदी अरब की औपचारिक सदस्यता की स्थिति को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं होने के कारण इसकी सदस्य संख्या को लेकर भी कुछ भ्रम बना हुआ है।

विस्तार ने ब्रिक्स का वैश्विक प्रभाव बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ निर्णय लेने की प्रक्रिया और अधिक जटिल हो गई है।

पहले जहां भारत और चीन के बीच मतभेद समूह की सबसे बड़ी चुनौती माने जाते थे, वहीं अब ब्रिक्स के भीतर कई ऐसे देश हैं जिनके आपसी संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं।

भारत के लिए ब्रिक्स का असली महत्व क्या है?
ब्रिक्स को केवल पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में देखना भारत की नीति को पूरी तरह नहीं समझाता। नई दिल्ली की कोशिश लंबे समय से ऐसी विदेश नीति अपनाने की रही है जिसमें अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रखे जा सकें।

भारत के लिए ब्रिक्स का एक बड़ा लाभ यह है कि इसके जरिए उसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के साथ संवाद का व्यापक मंच मिलता है।

यह मंच वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी, व्यापार में विविधता, स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को उठाने का अवसर देता है।

भारत के लिए यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि वह वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने की कोशिश करता रहा है।

चीन के बढ़ते प्रभाव की चुनौती
ब्रिक्स के विस्तार के साथ चीन का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव भी एक अहम सवाल बन गया है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रिक्स भविष्य में अधिक संगठित और प्रभावशाली राजनीतिक मंच बनता है, तो चीन अपनी आर्थिक ताकत और व्यापक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए इसमें अधिक प्रभाव स्थापित कर सकता है।

भारत के लिए यही सबसे कठिन संतुलन है। वह ब्रिक्स को कमजोर नहीं देखना चाहता, क्योंकि इससे उसे वैश्विक दक्षिण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण मंच मिलता है। लेकिन साथ ही वह यह भी नहीं चाहेगा कि ब्रिक्स चीन की रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने वाला मंच बन जाए।

यही कारण है कि नई दिल्ली के लिए ब्रिक्स की भूमिका को सहयोग, आर्थिक विकास और वैश्विक संस्थागत सुधार तक सीमित रखना अधिक सुविधाजनक हो सकता है।

भारत ‘ब्रिज बिल्डर’ की भूमिका में
विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि भारत को ब्रिक्स में किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय अलग-अलग देशों के बीच संवाद स्थापित करने वाले देश की भूमिका निभानी चाहिए।

भारत के पास इस भूमिका के लिए कुछ विशेष फायदे हैं। उसके अमेरिका और यूरोप के साथ भी महत्वपूर्ण संबंध हैं और रूस के साथ लंबे समय से रणनीतिक रिश्ते हैं। दूसरी ओर, चीन के साथ गंभीर मतभेदों के बावजूद भारत बहुपक्षीय मंचों पर उसके साथ काम करता है।

पश्चिम एशिया के कई देशों के साथ भी भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, प्रवासी भारतीयों और निवेश के कारण इन संबंधों का भारत के लिए विशेष महत्व है।

इसलिए भारत के सामने रास्ता यही है कि वह इन अलग-अलग रिश्तों को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने के बजाय उन्हें अपनी कूटनीतिक ताकत में बदले।

क्या ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी समूह बन रहा है?
ब्रिक्स की गतिविधियों को लेकर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में चिंता जरूर दिखाई देती रही है। समूह के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव की चर्चाएं भी हुई हैं।

लेकिन भारत लगातार यह संकेत देता रहा है कि ब्रिक्स की सदस्यता का अर्थ पश्चिम-विरोधी विदेश नीति नहीं है।

भारत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है। रक्षा, तकनीक, व्यापार, निवेश और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

इसी तरह रूस भारत के लिए रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार है। इसलिए नई दिल्ली की नीति किसी एक शक्ति खेमे में शामिल होने के बजाय कई देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने की रही है।

वैश्विक दक्षिण के लिए मंच
ब्रिक्स का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील देशों के हितों से जुड़ा है।

जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, विकास वित्त, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों की चिंताएं विकसित देशों से अलग हो सकती हैं।

भारत चाहता है कि इन मुद्दों पर उसकी आवाज अधिक प्रभावी हो। ब्रिक्स उसे ऐसा मंच देता है जहां वह एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका की अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कर सकता है।

एआई और जलवायु संकट भी एजेंडे में
ब्रिक्स के सामने केवल भू-राजनीतिक विवाद ही चुनौती नहीं हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य कीमतें और वैश्विक सप्लाई चेन भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

एआई के क्षेत्र में अमेरिका और चीन तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर, कई विकासशील देशों के सामने तकनीकी बुनियादी ढांचे, निवेश और कुशल मानव संसाधन की कमी जैसी चुनौतियां हैं।

भारत के लिए यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां वह ब्रिक्स के माध्यम से तकनीकी सहयोग, डिजिटल बुनियादी ढांचे और कौशल विकास पर व्यापक साझेदारी की कोशिश कर सकता है।

इसी तरह जलवायु परिवर्तन से जुड़े वित्त और तकनीक का सवाल भी विकासशील देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए सफलता का पैमाना क्या होगा?
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि शिखर सम्मेलन कितनी भव्यता से आयोजित हुआ। असली सवाल यह होगा कि क्या नई दिल्ली अलग-अलग हित रखने वाले देशों के बीच न्यूनतम सहमति तैयार कर पाती है।

भारत के लिए सबसे बेहतर स्थिति यह होगी कि ब्रिक्स ऐसे मुद्दों पर ठोस सहयोग की दिशा में आगे बढ़े जिन पर सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति संभव है।

व्यापार, स्वास्थ्य, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, तकनीक, जलवायु और विकास वित्त जैसे विषय इस दिशा में अधिक उपयोगी हो सकते हैं।

इसके विपरीत, अत्यधिक विवादित भू-राजनीतिक मुद्दों पर एकराय बनाने की कोशिश समूह के भीतर तनाव और बढ़ा सकती है।

भारत के सामने दोहरी चुनौती
ब्रिक्स भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।

एक तरफ यह भारत को वैश्विक दक्षिण में अपनी भूमिका मजबूत करने, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करने और विकासशील देशों की आवाज को प्रभावी बनाने का मंच देता है।

दूसरी तरफ चीन के बढ़ते प्रभाव, रूस-पश्चिम तनाव, पश्चिम एशिया के संघर्ष और सदस्य देशों के बीच अलग-अलग रणनीतिक हित भारत के लिए मुश्किलें पैदा करते हैं।

ऐसे में भारत को न तो ब्रिक्स को चीन-केंद्रित मंच बनने देना है और न ही उसे कमजोर करने की दिशा में जाना है। नई दिल्ली के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यही दिखाई देता है कि वह ब्रिक्स को आर्थिक, विकासात्मक और बहुपक्षीय सहयोग के प्रभावी मंच के रूप में आगे बढ़ाए।

अगर भारत सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद साझा एजेंडा तैयार करने में सफल रहता है, तो यह उसकी कूटनीतिक क्षमता की बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन अगर समूह लगातार आंतरिक विवादों में उलझता रहा, तो ब्रिक्स की उपयोगिता और भारत की अध्यक्षता दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

फिलहाल, नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह बदलती वैश्विक राजनीति के बीच ब्रिक्स को अपने हितों के लिए उपयोगी बनाए रखे, लेकिन किसी एक शक्ति के प्रभाव का साधन बनने से भी रोके।