भारत सहित पूरे विश्व में अफवाहों और फेक न्यूज का संकट भी तेजी से बढ़ाना एक चुनौती

The rapid escalation of the crisis of rumors and fake news across the globe, including India, poses a challenge

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी का डिजिटल युग सूचनाओं की अभूतपूर्व शक्ति लेकर आया है।इंटरनेट सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स ने याँ को जोड़ दिया है,लेकिन इसी के साथअफवाहों और फेक न्यूज का संकट भी तेजी से बढ़ा है। आज भारत ही नहीं, बल्कि पूराविश्व इस चुनौती से जूझ रहा है कि किस प्रकार झूठी,भ्रामक और जानबूझकर फैलाई गई सूचनाएँ समाज, लोकतंत्र और मानव जीवन को गंभीर नुकसान पहुँचा रही हैं।यह स्थिति अब केवल सामाजिक यानैतिक चिंता का विषय नहीं रही,बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, जनस्वास्थ्य तथा चुनावी प्रक्रिया की शुचिता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुकी है।

अफवाहों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वे अक्सर सच का रूप धारण कर लेती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वायरल होने वाली सामग्री भावनाओं को भड़काने,डर फैलाने और पूर्वाग्रह को मजबूत करने का काम करती है।भारत जैसे विविधता-पूर्ण देश में, जहाँ भाषा, धर्म, जाति और राजनीतिक मतभेद पहले से मौजूद हैं,अफवाहें सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर देती हैं। वैश्विक स्तर पर भी,अफवाहों ने नस्लीय तनाव,युद्ध जैसी स्थितियों और कूटनीतिकसंबंधों को प्रभावित किया है।फेक न्यूज़ का सबसे पहला और सबसे गहरा प्रभाव सामाजिक सौहार्द पर पड़ता है। सांप्रदायिक अफवाहें, भ्रामक वीडियो, एडिटेड तस्वीरें और संदर्भ से काटे गए बयान अक्सर हिंसा, दंगों और सामाजिकतनाव को जन्म देते हैं।भारत में बीते वर्षों में कई घटनाएं सामने आई हैं जहां व्हाट्सएप्प संदेशों या सोशल मीडिया पोस्ट के कारण भीड़ हिंसा,लिंचिंग और सांप्रदायिक टकराव हुए। यह दर्शाता है कि अफवाहें केवल सूचना की समस्या नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का संकट बन चुकी हैं।इसलिए अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अफवाहों से निपटने के लिए केवल सामान्य कानून या प्लेटफॉर्म की स्वैच्छिक नीतियाँ पर्याप्त नहीं हैं। कुछ समय पूर्व मुंबई में मिसिंग पपर्सन्स का मामला जोरशोर से उठ रहा था, मुंबई पुलिस द्वारा जारी चेतावनियों के बाद यह स्पष्ट हुआ कि मिसिंग पर्सन्स की संख्या पिछले वर्षों के औसत के अनुरूप ही थी,यानें अफवाहों पर कानूनी सख्ती की चेतावनी आई,मामला वहीं शांत हो गया।अब दिल्ली में मिसिंग पर्सन्स को लेकर फैली चर्चाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में कोई असाधारण संकट है,या फिर यह डिजिटल अफवाहों द्वारा निर्मित सामाजिक भय है।दिल्ली में एक बड़ी न्यूज़ एजेंसी द्वारा यह दावा किया गया कि 2026 के पहले 15 दिनों में दिल्ली में 800 से अधिक लोग लापता हो गए। यह संख्या सुनने में भयावह लगती है,लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया कि कितने मामले पारिवारिक विवाद, स्वेच्छा से, एग्जाम का डर, युवकों की नासमझी, लव अफेयर्स से घर छोड़ने या फ़िर गलत रिपोर्टिंग से जुड़े हैं।सोशल मीडिया पर वीडियो, ऑडियो क्लिप और भावनात्मक पोस्ट वायरल हों रहें हैँ। एक बड़े नेता द्वारा एक्स (पूर्व ट्विटर) पर चिंता व्यक्त किए जाने के बाद यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया।हालाँकि, जब आँकड़ों का विश्लेषण किया गया तो सामने आया कि दिल्ली में मिसिंग पर्सन्स की रिकवरी दर लगभग 77 प्रतिशत है। अर्थात, लापता घोषित किए गए लोगों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षित रूप से वापस मिल जाता है।यह दर कई अंतरराष्ट्रीय महानगरों की तुलना में बेहतर मानी जाती है।मीडिया के हवाले से सुनने को मिला है कि दिल्ली पुलिस ने बताया कि हाल के अलग-अलग महीनों में मिसिंग पर्सन्स की जो संख्या बताई जा रही है वैसी ही संख्या पिछले वर्षों की औसत अवधि से भिन्न नहीं है तथा दिल्ली पुलिस के एक बड़े अधिकारी का बयान मैंने सुना उन्होंने कहा कि अफवाओं पर ध्यान ना दें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर अफवाहों का प्रभाव अत्यंत चिंताजनक है। चुनावों के दौरान फेक न्यूज मतदाताओं की सोच को प्रभावित करती है, उम्मीदवारों की छवि बिगाड़ती है और चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है। भारत में हाल के वर्षों में चुनावी समय पर सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाई गई भ्रामक जानकारियाँ इसका उदाहरण हैं।कई देशों में चुनावों में विदेशी हस्तक्षेप और संगठित फेक न्यूज अभियानों की पुष्टि हुई है। यदि लोकतंत्र को सुरक्षित रखना है, तो अफवाहों को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनदेखा नहीं किया जा सकता।

साथियों बात अगर हम जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में अफवाहों का प्रभाव और भी घातक सिद्ध हुआ है इसको समझने की करें तो कोविड-19 महामारी के दौरान दुनियाँ ने देखा कि कैसे झूठी सूचनाओं ने वैक्सीन को लेकर डर पैदा किया, इलाज के नाम पर खतरनाक घरेलू नुस्खों को बढ़ावा दिया और स्वास्थ्य प्रणालियों पर अविश्वास फैलाया।भारत सहित कई देशों में अफवाहों के कारण लोगों ने समय पर इलाज नहीं कराया, जिससे जानमाल की क्षति हुई। यह स्पष्ट है कि जब अफवाहें जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन जाएँ, तब उन्हें रोकना केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कानूनी आवश्यकता बन जाती है।भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्मों की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है।व्हाट्सएप्प फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अफवाहों के सबसे बड़े वाहक बन चुके हैं।एंड-टू-एंडएन्क्रिप्शन अनियंत्रित फॉरवर्डिंग और एल्गोरिदम आधारित कंटेंट प्रमोशन ने झूठी खबरों को पलक झपकते ही लाखों लोगों तक पहुँचा दिया है। वर्तमान भारतीय कानून, जैसे आईटी एक्ट या आईपीसी की कुछ धाराएँ, इस समस्या से निपटने के लिए अपर्याप्त साबित हो रही हैं। ये कानून अफवाहों की गति, पैमाने और जटिलता को ध्यान में रखकर नहीं बिलकुल बनाए गए थे।

साथियों बात अगर हम पेड प्रमोशन और डर कीमार्केटिंग इस एंगल से समस्या को समझने की करें तोअफवाहों के पीछे केवल अज्ञानता ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक हित भी संभवतः काम कर रहे हैं।आज कई इन्फ्लुएंसर्स, पेज और चैनल जानबूझकर डरावनी सामग्री फैलाते हैं क्योंकि:इससे व्यूज बढ़ते हैं,एंगेजमेंट मिलता है पेड प्रमोशन और ब्रांड डील्स आती हैं,यह एक प्रकार की डर आधारित मार्केटिंग स्ट्रेटेजी है,जिसमें समाज की असुरक्षा को उत्पाद की तरह बेचा जाता है।कानून की सीमाएँ: क्या मौजूदा प्रावधान पर्याप्त हैं?भारत में आईटी एक्ट, भारतीय न्याय संहिता और अन्य कानूनों में अफवाहों से निपटने के कुछ प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन वे:विशिष्ट नहीं हैं।

साथियों बात अगर हम इसी संदर्भ में,एक विशिष्ट और सख्त कानून लाने की आवश्यकता की करें तो, फेक न्यूज एक्ट की आवश्यकता महसूस की जा रही है,जो अफवाहों को स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में रखे। ऐसा कानून न केवल जानबूझकर झूठी सूचना फैलाने वालों के लिए दंडात्मक प्रावधान तय करे, बल्कि यह भी परिभाषित करे कि अफवाह, फेक न्यूज और भ्रामक सूचना क्या है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक समान ढाँचे की दिशा में प्रयास आवश्यक हैं, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म की वैश्विक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए देशों के बीच सहयोग संभव हो सके।हालाँकि, केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं होगा। यदि नागरिक स्वयं सही और गलत जानकारी की पहचान करने में सक्षम नहीं होंगे, तो अफवाहें किसी न किसी रूप में फैलती रहेंगी। इसलिए व्यापक स्तर पर डिजिटल साक्षरता और मीडिया साक्षरता अभियानों की आवश्यकता है। स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक स्तर पर लोगों को यह सिखाना जरूरी है कि किसी खबर की सत्यता कैसे जाँची जाए,स्रोत की विश्वसनीयता कैसे परखी जाए और भावनात्मक अपील से सावधान कैसे रहा जाए।जागरूक नागरिक ही अफवाहों के खिलाफ सबसे मजबूत ढाल बन सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों की जिम्मेदारी भी इस पूरे तंत्र में केंद्रीय है। अब यह मान लेना गलत होगा कि ये कंपनियाँ केवल मध्यस्थ हैं। इनके एल्गोरिदम यह तय करते हैं कि कौन-सा कंटेंट ज्यादा लोगों तक पहुँचेगा। इसलिए इन्हें कानूनी रूप से बाध्य किया जाना चाहिए कि वे कंटेंट मॉडरेशन को मजबूत करें, फॉरवर्ड की संख्या पर सख्त सीमाएँ लगाएँ और संदिग्ध सामग्री पर त्वरित कार्रवाई करें। भारत में व्हाट्सएप्प द्वारा फॉरवर्ड लिमिट जैसी पहलें हुई हैं, लेकिन इन्हें स्वैच्छिक प्रयासों से आगे बढ़ाकर कानूनी दायित्व बनाना आवश्यक है।

साथियों बात कर हम फेक न्यूज़ मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तरपर समझने की करें, इस समस्या का समाधान सामूहिक प्रयास से ही संभव है। संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर फेक न्यूज और अफवाहों के खिलाफ साझा मानक तय किए जाने चाहिए। साइबर स्पेस की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती, इसलिए एक देश में फैली अफवाह दूसरे देश को भी प्रभावित कर सकती है। ऐसे में वैश्विक सहयोग,सूचना साझाकरण और संयुक्त नियामक ढाँचा समय की मांग है।

अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अफवाहें आज के समय में एक मौन लेकिन शक्तिशाली हथियार बन चुकी हैं, जो लोकतंत्र, जनस्वास्थ्य और सामाजिक सौहार्द को कमजोर कर रही हैं। भारत सहित पूरी दुनिया को यह स्वीकार करना होगा कि वर्तमान कानूनी और संस्थागत ढाँचे इस चुनौती के लिए अपर्याप्त हैं।एक सख्त, स्पष्ट और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण वाला कानून, मजबूत डिजिटल प्लेटफॉर्म नियमन और व्यापक जन-जागरूकता अभियान इन तीनों के समन्वय से ही अफवाहों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।यदि आज निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो सूचना की आज़ादी का यह युग समाज के लिए सबसे बड़ा संकट बन सकता है।