मथुरा-वृंदावन से कम नहीं राजस्थान की कृष्ण भक्ति भूमि

Rajasthan's land of Krishna devotion is no less than Mathura-Vrindavan

मीरा की कर्मभूमि ने कृष्ण-प्रेम को दी अनूठी पहचान

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थान को आमतौर पर शौर्य, पराक्रम और राजपूताना संस्कृति की धरती के रूप में याद किया जाता है, लेकिन इसकी पहचान का एक अत्यंत समृद्ध पक्ष कृष्ण भक्ति भी है। मरुभूमि से लेकर अरावली की पहाड़ियों तक ऐसे अनेक मंदिर और तीर्थ हैं, जहां आज भी राधा-कृष्ण की भक्ति उसी आत्मीयता और भाव-विभोर वातावरण के साथ दिखाई देती है, जिसकी अनुभूति मथुरा और वृंदावन में होती है। राजस्थान की विशेषता यह है कि यहां कृष्ण भक्ति केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि संत परंपरा, लोक संगीत और जनजीवन में भी गहराई से समाई है।

राजस्थान की कृष्ण भक्ति की चर्चा मीरा बाई के बिना अधूरी है। मेड़ता की धरती पर जन्मी मीरा ने कृष्ण को अपना आराध्य ही नहीं, अपना सर्वस्व माना। चित्तौड़गढ़ में उनका जीवन भक्ति, संघर्ष और समर्पण की ऐसी कथा बन गया, जिसने भारतीय भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी। मीरा की पदावली में कृष्ण के प्रति प्रेम, विरह और पूर्ण आत्मसमर्पण का जो भाव मिलता है, वह राजस्थान की आध्यात्मिक विरासत को विशिष्ट बनाता है।

नाथद्वारा का श्रीनाथजी मंदिर और कांकरौली का द्वारकाधीश मन्दिर राजस्थान की कृष्ण भक्ति का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां श्रीनाथजी के दर्शन के साथ हवेली संगीत, पिचवाई चित्रकला और वैष्णव परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। नाथद्वारा ने कृष्ण भक्ति को धार्मिक आस्था के साथ कला और संस्कृति से भी जोड़ा है।

जयपुर का गोविंद देवजी मंदिर भी कृष्ण भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां प्रतिदिन होने वाली झांकियों और आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। मंदिर की परंपरा में वृंदावन की कृष्ण भक्ति की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। इसी तरह करौली का मदनमोहनजी मंदिर और जयपुर के निकट वैष्णव परंपरा के मंन्दिर महत्वपूर्ण तीर्थ हैं। राजस्थान का खांटू श्याम जी मंदिर जग विख्यात है।

राजस्थान में कृष्ण भक्ति की एक विशेष खूबी उसका लोक जीवन से जुड़ाव है। यहां के लोकगीतों, भजनों और कथाओं में राधा-कृष्ण के प्रेम की छवियां सहज रूप से दिखाई देती हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर गांवों से लेकर शहरों तक मंदिरों में होने वाले आयोजन इस परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं।

मेड़ता और चित्तौड़ की मीरा से लेकर नाथद्वारा के श्रीनाथजी और जयपुर के गोविंद देवजी तक राजस्थान ने कृष्ण भक्ति को अपनी विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक पहचान दी है। साथ ही राजस्थान का ब्रज क्षेत्र में श्री नाथ मन्दिर और पूछ डी का लोटा के विकास में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा विशेष रुचि ले रहे है तथा मध्य प्रदेश के साथ कृष्ण पथ के विकास की योजना बनाई गई है। इस प्रकार राजस्थान को केवल वीरभूमि कहना उसकी आधी तस्वीर देखना होगा। यह भक्ति, प्रेम और समर्पण की भी भूमि है।

मथुरा-वृंदावन कृष्ण की जन्म और लीला भूमि के रूप में विश्वविख्यात हैं, तो राजस्थान ने कृष्ण को भक्ति और समर्पण के लोकनायक के रूप में अपने हृदय में बसाया है। यही वह विरासत है जो राजस्थान को भारत की कृष्ण-भक्ति परंपरा में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।