मस्जिद ध्वस्तीकरण : नफ़रत का चरमोत्कर्ष

Mosque Demolition: The Zenith of Hatred

निर्मल रानी

पिछले कुछ ही वर्षों में देशभर में अवैध अतिक्रमण, सड़क चौड़ीकरण और अदालती आदेशों के नाम पर बुलडोजर कार्रवाइयों के द्वारा अनेक मस्जिदों, मदरसों और मज़ारों को हटाने की घटनाएं सामने आई हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स, मानवाधिकार संगठनों और राज्य प्रशासनों द्वारा समय-समय पर जारी की गई कार्रवाई की रिपोर्ट के आधार पर उत्तर प्रदेश में सरकारी ज़मीनों, तालाबों और सार्वजनिक रास्तों से अतिक्रमण हटाने के नाम पर सबसे व्यापक कार्रवाइयां देखी गई हैं। जैसे कि वाराणसी (दालमंडी) में सड़क चौड़ीकरण और स्टेशन पुनर्विकास के दायरे में आने वाली लगभग 6 से 7 मस्जिदों की पैमाइश कर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसी तरह वर्ष 2025-2026 के बीच मुरादाबाद के जामिया अरबिया हयातुल उलूम, सिद्धार्थनगर में खेल के मैदान पर बना 60 साल पुराना मदरसा, आगरा में कथित रूप से तालाब की ज़मीन पर बनी मज़ार व मस्जिद और संत कबीर नगर में कथित तौर पर अवैध रूप से बने मदरसों और मज़ारों पर बुलडोज़र चलाया गया। अनुमानतः पिछले कुछ वर्षों में 200 से अधिक मदरसों और दर्जनों मज़ारों पर अवैध बताकर प्रशासनिक कार्रवाई की जा चुकी है। उत्तराखंड सरकार ने “लैंड जिहाद” और अवैध क़ब्ज़ों से मुक्त कराने की आड़ में एक विशेष अभियान चलाया हुआ है। जिसके अंतर्गत सरकारी आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, राज्य में पिछले दो वर्षों के भीतर 450 से अधिक मज़ारों और लगभग 288 मस्जिदों व धार्मिक ढांचों को पूरी तरह ध्वस्त या क़ब्ज़ा मुक्त कराया गया है। इसके साथ ही दर्जनों मदरसों को सील भी किया गया है। देश की राजधानी दिल्ली में भी शहरी विकास, फ़्लाई ओवर निर्माण और फ़ुटपाथों को साफ़ करने के नाम पर दिल्ली विकास प्राधिकरण और लोक निर्माण विभाग द्वारा कई कार्रवाइयां की गईं। पिछले दो वर्षों में मध्य दिल्ली और दिल्ली-मथुरा रोड, सुनहरी बाग़ रोड जैसी प्रमुख सड़कों के किनारे बनी कई सदियों पुरानी मज़ारों, दरगाहों जैसे दरगाह पंच पीरान और कुछ मस्जिदों को हटाया गया। दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड और केंद्र सरकार के बीच ऐसी क़रीब 123 ऐतिहासिक मुस्लिम संपत्तियों को लेकर क़ानूनी विवाद भी चल रहा है। इसी तरह गुजरात और राजस्थान के अहमदाबाद, जूनागढ़ और राज्य के कुछ तटीय व ग्रामीण इलाक़ों में कई मस्जिदों, मज़ारों और क़रीब 3 मदरसों को ढहाया जा चुका है। राजस्थान के सीमावर्ती ज़िलों और जयपुर जैसे नूरानी मस्जिद में सड़क चौड़ीकरण और सरकारी भूमि पर बने अवैध ढांचों को हटाने के दौरान वक़्फ़ बोर्ड की आपत्तियों के बावजूद कुछ मस्जिदें और मदरसे हटाए गए हैं। महाराष्ट्र, हरियाणा,असम,महाराष्ट्र और हरियाणा में भी ऐसी कार्रवाइयां होती रही हैं। मुंबई के बांद्रा और गोरेगांव इलाक़े में और हरियाणा के नूंह व गुरुग्राम क्षेत्र में दंगों के बाद या कुछ चुनिंदा धार्मिक ढांचों और उनके आसपास की दुकानों व मदरसों को अवैध बताकर हटाया गया। मानवाधिकार संगठन और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे मुस्लिम संगठनों का आरोप है कि हाल के महीनों में देश के विभिन्न राज्यों में 23 से अधिक प्रमुख मस्जिदों और मदरसों को बिना उचित क़ानूनी प्रक्रिया या बिना पूर्व नोटिस के निशाना बनाया गया है। परन्तु प्रशासन का हमेशा यही रुख़ रहता है कि ऐसी कार्रवाइयां पूरी तरह से निष्पक्ष हैं और केवल कोर्ट के आदेशों या सरकारी भूमि से ‘अवैध अतिक्रमण’ हटाने के लिए ही की जाती हैं।

अपनी इसी धर्मस्थान ध्वस्तीकरण अभियान के तहत उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित लगभग 100 साल पुरानी मस्जिद को भी गत 5 सितंबर 2026 की प्रातःकाल ज़िला प्रशासन द्वारा अदालत के आदेश का हवाला देते हुए बुलडोज़र से ढहा दिया गया। परन्तु इस मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद संभवतः न केवल सत्ता के मंसूबे धरे रह गए बल्कि यह कार्रवाई क़ानून से लेकर जनता की अदालत तक के स्तर पर सरकार पर भारी पड़ती नज़र आ रही है। सब से बड़ी बात तो यह कि अच्छी ख़ासी मुस्लिम आबादी रखने वाले इस ज़िले के मुसलमानों ने इतनी बड़ी घटना पर कोई उत्तेजना नहीं दिखाई और शांति व सद्भाव का परिचय देते हुये शहर का माहौल ठीक रखने में अपना योगदान दिया। यानी इस मस्जिद विध्वंस के आड़ में शहर को साम्प्रदायिक दंगों की आग में झोंकने की नफ़रती गैंग की योजना धरी की धरी रह गयी। दूसरी और उससे भी अहम बात यह रही कि कई भाजपा नेता समेत ज़िले के अनेक ज़िम्मेदार हिन्दू लोगों ने यहाँ तक कि मानवता प्रिय साधु संतों ने भी इस अवैध प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध किया और घटना पर दुःख व रोष जताया।

सहारनपुर में आम लोगों का आरोप है कि मस्जिद को ध्वस्त नहीं किया गया है बल्कि ऐसा कर संविधान की धज्जियां उड़ाई गई हैं। संविधान में जो अधिकार दिए गए हैं, उन्हें रौंदा गया है। मस्जिद 1911 से पहले की है, मस्जिद की मलकियत आज भी वहीद ख़ान याक़ूब ख़ान के नाम है। परन्तु सारी बातें प्रशासन के संज्ञान में लाने के बावजूद सिटी मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया और आदेश में केवल 30 दिन का समय दिया गया। अभी 22 दिन और बचे भी थे। परन्तु इसके बावजूद प्रशासन को न जाने ऐसी कौन सी इमरजेंसी थी कि रातों-रात चारो तरफ़ से मस्जिद को भारी पुलिस बल से घेर कर और कई बुलडोज़र एक साथ लगाकर गिरा दिया गया। लोगों का मत है कि यह मस्जिद पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं की गई है बल्कि देश के संविधान पर हथौड़ा चलाया गया है। लोगों ने इसे सहारनपुर के लोगों के लिए काला दिन बताया।” कई हिन्दू मर्द व औरतें इस मस्जिद के ढहाये जाने पर रोते बिलखते नज़र आये जबकि कई हिन्दुओं ने कहा किसी की इबादतगाह ढहाने पर जश्न मनाना हमारा हिन्दू धर्म नहीं सिखाता।

कहना ग़लत नहीं होगा कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट की इस प्राचीन व ऐतिहासिक मस्जिद के मलबे में तब्दील होने के बाद जहाँ एक तरफ़ मायूसी और आक्रोश की लहर है, वहीं नफ़रत के इस दौर में आपसी भाईचारे और इंसानियत की एक बेहद ख़ूबसूरत मिसाल सामने आई है। लोग साफ़ शब्दों में कह रहे हैं कि किसी धार्मिक स्थल के ध्वस्तीकरण पर केवल सत्ता-समर्थित लोग ही ख़ुश हो सकते हैं, लेकिन एक संवेदनशील और समझदार नागरिक ऐसी नाइंसाफ़ी का समर्थन कभी नहीं करेगा। मुस्लिम समाज को ढारस बंधाते हुए कई उदारवादी हिन्दू यह सन्देश देते नज़र आये कि —”वो आपकी इमारत तोड़ सकते हैं, लेकिन आपका हौसला नहीं तोड़ सकते ।” ऐसे सन्देश यह साबित करते हैं कि तमाम राजनीतिक कड़वाहटों के बावजूद इस देश की तासीर में मोहब्बत, समझदारी और इंसानियत की जड़ें आज भी बेहद गहरी हैं। हद तो यह कि एक प्रसिद्ध गोदी मीडिया एंकर ने भी इस कार्रवाई पर सवाल उठाए कि अगर मस्जिद अवैध है, तो उसी कलेक्ट्रेट परिसर में बना मंदिर वैध कैसे हो गया? दरसल मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद जहां सत्ता द्वारा फैलाई जा रही साम्प्रदायिक नफ़रत का चरमोत्कर्ष सामने आया है वहीं इस घटना से आहत हिन्दू समाज ने भी मुसलमानों के दुःख में शरीक होकर भारत के आदर्श धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का पुरज़ोर समर्थन किया है ।