मिठास का कड़वा गणित — चीनी के भावों के उतार-चढ़ाव का असल खेल

The Bitter Math of Sweetness — The Real Game Behind Sugar Price Fluctuations

अशोक भाटिया

भारत में चीनी केवल रसोई का एक आवश्यक हिस्सा नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक और राजनीतिक ताने-बाने को नियंत्रित करने वाली एक बेहद संवेदनशील कमोडिटी भी है। हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में आई अचानक उछाल ने एक बार फिर उपभोक्ताओं की जेब पर असर डाला है और नीति-निर्माताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। खुदरा बाजार में चीनी के दाम अचानक प्रति किलो कई रुपये चढ़ गए हैं। आम उपभोक्ता के लिए यह केवल एक सामान्य महंगाई की मार हो सकती है, लेकिन राजनीतिक-आर्थिक चश्मे से देखें तो इसके पीछे ‘डिमांड और सप्लाई’ के पारंपरिक नियम से कहीं बड़ा और पेचीदा खेल चल रहा है। इस खेल में मौसम की अनिश्चितता, एथनॉल निर्माण की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय नीतियां, सरकारी अनुमानों के यू-टर्न, अंतरराष्ट्रीय बाजार का दबाव और सबसे बढ़कर, घरेलू बाजार के सटोरियों व रसूखदार जमाखोरों का सिंडिकेट शामिल है। चीनी के इस पूरे चक्रव्यूह को समझे बिना हम इसकी कीमतों के उतार-चढ़ाव के असल खेल को नहीं समझ सकते।

चीनी उद्योग का सबसे पहला और बुनियादी खेल गन्ने की पैदावार बनाम चीनी की ‘रिकवरी रेट’ के बीच छुपा होता है। अक्सर आम जनता और यहाँ तक कि सरकारें भी गन्ने की लहलहाती फसल देखकर यह मान लेती हैं कि इस साल चीनी का बंपर उत्पादन होगा। लेकिन हकीकत इसके उलट होती है। इस सीजन में भी गन्ने की फसल खेतों में खड़ी जरूर दिखी, लेकिन मौसम के मिजाज ने पूरा खेल बिगाड़ दिया। मानसून की अनिश्चितता और ऐन वक्त पर तापमान में आए असंतुलन के कारण गन्ने की फसल ‘रेड रोट’ जैसी फंगस जनित बीमारियों की शिकार हो गई। इसका सीधा असर गन्ने के अंदर मौजूद रस की मात्रा और उसकी गुणवत्ता पर पड़ा। जब यह गन्ना मिलों में पेराई के लिए पहुँचा, तो रिकवरी रेट, यानी गन्ने के वजन के मुकाबले चीनी निकलने का प्रतिशत काफी नीचे गिर गया। शुरुआती अनुमानों में जहां देश के भीतर करीब ३४३ लाख टन चीनी उत्पादन की उम्मीद जताई जा रही थी, वहीं यह रिकवरी रेट गिरने के कारण घटकर लगभग ३०६ लाख टन पर ही सिमट गया। यानी फसल दिखने में अच्छी थी, लेकिन मिलों से निकलने वाली चीनी का वास्तविक उत्पादन उम्मीद से ३७ लाख टन कम रहा। यह उत्पादन का पहला कड़वा सच है जो बाजार में कमी की शुरुआती बुनियाद रखता है।

चीनी के भावों में आए इस उबाल के पीछे सरकार की ‘एथनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी’ का भी एक बड़ा रणनीतिक हाथ है। कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए सरकार पेट्रोल में २० प्रतिशत तक एथनॉल मिलाने के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रही है। एथनॉल बनाने के लिए सबसे मुफीद और आसान जरिया गन्ने का रस या भारी शीरा होता है। जब चीनी मिलों को गन्ने के रस से सीधे एथनॉल बनाने की अनुमति मिली, तो मिल मालिकों के लिए यह अधिक मुनाफे का सौदा साबित हुआ। बाजार के विश्लेषकों का एक वर्ग यह आरोप लगाता रहा है कि भारी मात्रा में गन्ने के रस को एथनॉल निर्माण की तरफ मोड़ने के कारण घरेलू बाजार में चीनी का स्टॉक कम हुआ और कीमतें बढ़ीं। हालांकि, सरकार के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि इस साल उत्पादित कुल एथनॉल का लगभग ६८ प्रतिशत हिस्सा मक्का और खराब हो चुके अनाजों से आया है, और चीनी का केवल ९ प्रतिशत हिस्सा ही एथनॉल के लिए इस्तेमाल हुआ। इसके बावजूद, बाजार एक मनोवैज्ञानिक धारणा पर काम करता है। जैसे ही सटोरियों को यह संदेश जाता है कि गन्ना चीनी के बजाय ईंधन बनाने में जा रहा है, वे बाजार में कृत्रिम कमी का डर दिखाकर कीमतों को बढ़ाना शुरू कर देते हैं।

चीनी के खेल को नियंत्रित करने वाला तीसरा सबसे बड़ा खिलाड़ी खुद सरकार की व्यापारिक नीतियां और उनके बदलते आंकड़े हैं। चीनी एक ऐसी कमोडिटी है जिस पर सरकार की पैनी नजर होती है, लेकिन कई बार जमीनी हकीकत को भांपने में होने वाली देरी बाजार को पूरी तरह अस्थिर कर देती है। इस सीजन की शुरुआत में जब मिलों और सरकारी विभागों ने बंपर स्टॉक का अनुमान लगाया, तो सरकार ने चीनी के निर्यात को हरी झंडी दे दी। इसके तहत लगभग २० लाख टन चीनी देश से बाहर भेज दी गई ताकि मिल मालिकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के ऊंचे दामों का फायदा मिल सके और वे किसानों के गन्ने का भुगतान समय पर कर सकें। लेकिन जैसे ही मध्य-सीजन में कम रिकवरी के कारण चीनी का वास्तविक उत्पादन घटने लगा, सरकार को अपनी रणनीति अचानक बदलनी पड़ी। आनन-फानन में निर्यात पर रोक लगाई गई और घरेलू बाजार में आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तुरंत १० लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की घोषणा करनी पड़ी। सरकार की नीतियों में आया यह अचानक यू-टर्न बाजार के बड़े व्यापारियों के लिए एक स्पष्ट संकेत होता है। वे समझ जाते हैं कि सरकार के पास स्टॉक की कमी है, और यहीं से सट्टेबाजी का असली खेल शुरू होता है।

जब उद्योग जगत के शीर्ष संगठन ‘इंडियन शुगर एंड बायोएनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन’ के बयानों को देखा जाए, तो उनका स्पष्ट कहना है कि देश में चीनी की कोई वास्तविक या भौतिक किल्लत नहीं है। देश की आबादी की जरूरत को पूरा करने के लिए गोदामों में पर्याप्त चीनी मौजूद है। तो फिर दाम क्यों बढ़ रहे हैं? इसका जवाब है—जमाखोरी और कृत्रिम किल्लत का संगठित सिंडिकेट। यह खेल थोक व्यापारियों, बड़े डीलरों और वायदा बाजार के सटोरियों द्वारा खेला जाता है। जैसे ही मौसम की खराबी या आयात-निर्यात नीतियों में बदलाव की खबरें आती हैं, यह सिंडिकेट सक्रिय हो जाता है। विशेषकर त्योहारों के सीजन के दौरान, जब मिठाई और कोल्ड ड्रिंक निर्माताओं की मांग चरम पर होती है, ये बड़े डीलर एडवांस में ही चीनी का भारी स्टॉक दबा लेते हैं। मिलों से बाजार तक आने वाली सप्लाई चेन को जानबूझकर धीमा कर दिया जाता है। जब मांग बहुत ज्यादा हो और बाजार में माल कम दिखे, तो कीमतें अपने आप आसमान छूने लगती हैं। इस तरह बिना किसी वास्तविक कमी के, केवल कागजी और गोडाउन के स्तर पर कमी दिखाकर करोड़ों रुपये का मुनाफा कमाया जाता है।

चीनी केवल स्थानीय बाजार की वस्तु नहीं है, यह एक वैश्विक कमोडिटी भी है। जब भी दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देशों जैसे ब्राजील, थाईलैंड या भारत में मौसम बिगड़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंजों में चीनी के दाम तेजी से बढ़ने लगते हैं। भारतीय चीनी मिलें हमेशा इस फिराक में रहती हैं कि वे वैश्विक बाजार की इस तेजी का लाभ उठाएं। भले ही सरकार निर्यात पर पाबंदी लगा दे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी कीमतें घरेलू मिल मालिकों को एक मजबूत मोलतोल की शक्ति देती हैं। वे घरेलू बाजार में भी चीनी की एक्स-मिल कीमतें बढ़ा देते हैं। इसके अलावा, भारत में गन्ने की ‘उचित और लाभकारी मूल्य’ यानी एफआरपी सरकार तय करती है, जो हर साल किसानों के राजनीतिक दबाव में बढ़ानी पड़ती है। जब इनपुट कॉस्ट बढ़ती है, तो मिलें अपनी उत्पादन लागत निकालने और मुनाफा कमाने के लिए चीनी के दाम बढ़ाने को मजबूर हो जाती हैं, जिसका अंतिम बोझ आम उपभोक्ता पर ही पड़ता है।

चीनी के भावों के बढ़ने-घटने का यह असल खेल यह साबित करता है कि यह उद्योग केवल कृषि का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह राजनीति, कॉर्पोरेट मुनाफे और प्रशासनिक चूक का एक त्रिकोण है। सरकार ने हाल ही में इस बेकाबू होते खेल को रोकने के लिए कुछ कड़े प्रशासनिक कदम उठाए हैं, जैसे चीनी डीलरों के लिए ४०० टन की स्टॉक सीमा तय करना और कोल्ड ड्रिंक व मिठाई निर्माताओं जैसे बड़े उपभोक्ताओं पर १५ दिनों से अधिक का स्टॉक रखने पर पाबंदी लगाना। साथ ही मिलों को १५ अक्टूबर से ही पेराई शुरू करने का निर्देश दिया गया है ताकि त्योहारों में नई चीनी बाजार में आ सके। लेकिन ये सभी उपाय तात्कालिक और सामयिक राहत देने वाले ही हैं। यदि इस खेल को हमेशा के लिए बंद करना है, तो सरकार को एक दीर्घकालिक और स्थिर नीति बनानी होगी। गन्ने के रस से एथनॉल बनाने और चीनी बनाने के अनुपात को इस तरह संतुलित करना होगा कि वह मौसम की अनिश्चितता से प्रभावित न हो। साथ ही, कृषि और खाद्य मंत्रालयों के बीच उपग्रह आधारित सटीक फसल अनुमान प्रणाली विकसित करनी होगी ताकि नीतिगत यू-टर्न से बचा जा सके। जब तक जमाखोरी के सिंडिकेट को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाएगा और मिलों की वास्तविक वित्तीय स्थिति को पारदर्शी नहीं बनाया जाएगा, तब तक चीनी की मिठास के पीछे का यह कड़वा खेल हर कुछ सालों में इसी तरह आम जनता की जेब पर डाका डालता रहेगा।