एन जी भट्ट
राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों में महापौर, सभापति और अध्यक्षों के बाद अब सत्ता की दूसरी कमान के परिणामों ने स्थानीय राजनीति का नया गणित सामने रख दिया है। 22 सितंबर को हुए डिप्टी मेयर, उपसभापति और उपाध्यक्ष पदों के चुनावों में भाजपा ने अपनी बढ़त को काफी हद तक बरकरार रखा, लेकिन साथ ही कई जगह एक-एक वोट की ताकत, निर्दलीयों की भूमिका और क्रॉस-वोटिंग ने यह भी साबित किया कि स्थानीय राजनीति में केवल संख्या बल ही अंतिम निर्णायक नहीं है।
सात नगर निगमों के डिप्टी मेयर चुनाव में भाजपा ने छह पदों पर जीत दर्ज की है , जबकि पाली में कांग्रेस समर्थित निर्दलीय महबूब टी ने डिप्टी मेयर का पद हासिल किया। अजमेर में भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशियों को 40-40 वोट मिले और निर्धारित प्रक्रिया के तहत लॉटरी से भाजपा के हेमंत सांखला विजयी हुए। पाली में भी भाजपा और महबूब टी को 29-29 वोट मिले, लेकिन अंतिम फैसला महबूब टी के पक्ष में गया। इन परिणामों में बीकानेर सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत देता है। यहां महापौर पद कांग्रेस के अनिल कल्ला के पास गया था, लेकिन डिप्टी मेयर की कुर्सी भाजपा के पंकज गहलोत ने जीत ली। यानी एक ही नगर निगम में महापौर और डिप्टी मेयर अलग-अलग दलों के हो गए। यह परिणाम बताता है कि पार्षदों का मतदान हर पद पर एक जैसा रहे, यह जरूरी नहीं। अजमेर का परिणाम भी स्थानीय राजनीति के बदलते स्वरूप का महत्वपूर्ण उदाहरण है। निगम में कांग्रेस के 37, भाजपा के 32 और 11 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीते हैं। इसके बावजूद पहले महापौर और फिर डिप्टी मेयर पद भाजपा के खाते में गया। डिप्टी मेयर चुनाव में दोनों दलों के उम्मीदवारों को 40-40 मत मिलना बताता है कि निर्दलीयों और दूसरे पार्षदों के समर्थन ने मुकाबले को बेहद करीबी बना दिया। अंततः लॉटरी से भाजपा प्रत्याशी हेमन्त साँखला की जीत हुई।
पाली ने इसके विपरीत तस्वीर पेश की। यहां महापौर भाजपा की नमिता बुबकिया बनीं, लेकिन डिप्टी मेयर पद कांग्रेस समर्थित निर्दलीय महबूब टी के खाते में गया। 29-29 की बराबरी के बाद उनका जीतना यह संकेत देता है कि निर्दलीय पार्षद स्थानीय सत्ता-समीकरण में अभी भी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति हैं। भीलवाड़ा में भाजपा के राधेश्याम सोमानी निर्विरोध डिप्टी मेयर बने और उदयपुर में भाजपा के दिनेश भट्ट ने डिप्टी मेयर पद हासिल किया। अलवर में भाजपा के अजय पूनिया विजयी हुए। भरतपुर में भी भाजपा की अंबिका ने डिप्टी मेयर पद जीता। इस प्रकार सात निगमों की तस्वीर में छह पद भाजपा के पास और एक कांग्रेस समर्थित निर्दलीय के पास गया।
यह परिणाम उस व्यापक तस्वीर को भी मजबूत करते हैं जो एक दिन पहले निकाय प्रमुखों के चुनाव में सामने आई थी। 301 घोषित निकायों में भाजपा ने 197 और कांग्रेस ने 94 में बोर्ड बनाए। निर्दलीय सात निकायों में अध्यक्ष बने, जबकि आरएलपी, आम आदमी पार्टी और सीपीआई(एम) ने भी एक-एक निकाय में अध्यक्ष पद हासिल किया। फिर भी इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी केवल भाजपा की बढ़त है। साथ ही राजस्थान की स्थानीय राजनीति में निर्दलीय पार्षद, बागी उम्मीदवार और क्रॉस-वोटिंग अब सत्ता के समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। अजमेर और पाली में बराबरी तथा बीकानेर में महापौर और डिप्टी मेयर के अलग-अलग दलों में जाने से यह बात और स्पष्ट हुई है।
अब अगला बड़ा अध्याय जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगमों का है। इन तीन नगर निगमों के महापौर चुनाव 25 सितंबर और उसके बाद उपमहापौर चुनाव 26 सितंबर को होंगे। इसलिए राजस्थान की शहरी सत्ता की अंतिम तस्वीर अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है। 2026 के निकाय चुनावों का फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है—प्रदेश में भाजपा का व्यापक संख्यात्मक प्रभाव बढ़ा है, साथ ही स्थानीय सत्ता की असली चाबी कई जगह निर्दलीय पार्षदों और बदलते समर्थन-समीकरणों के हाथ में है।





