प्रीति पाण्डेय
कांग्रेस के रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय सम्मेलन में राहुल गांधी के भाषण ने एक बार फिर सियासी गलियारों में बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर निशाना साधते हुए राहुल गांधी ने मंच पर ऐसा अंदाज अपनाया, जिसे पीएम मोदी की मिमिक्री के तौर पर देखा गया। विदेश नीति को लेकर टिप्पणी करने के बाद राहुल गांधी मंच पर मौजूद कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित की ओर बढ़े और उन्हें गले लगा लिया। इसके साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि क्या दुनिया के नेताओं को गले लगाना ही विदेश नीति का पैमाना है। राहुल गांधी के इस अंदाज के बाद सियासी तापमान तेजी से बढ़ा। बीजेपी और NDA के नेताओं ने इसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा से जोड़ते हुए राहुल गांधी पर निशाना साधा, जबकि कांग्रेस की तरफ से इसे सरकार की विदेश नीति पर राजनीतिक कटाक्ष के तौर पर पेश किया गया।
मंच पर ‘झप्पी’, निशाने पर मोदी की विदेश नीति
राहुल गांधी ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को लेकर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि विदेश नीति केवल व्यक्तिगत मेल-जोल या विदेशी नेताओं से आत्मीयता जताने तक सीमित नहीं हो सकती। इसी बात को समझाने के लिए उन्होंने मंच पर मौजूद संदीप दीक्षित को गले लगा लिया। इस दौरान दीक्षित की एक टिप्पणी पर कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने ठहाके भी लगाए। यह पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गया। राहुल गांधी का यह अंदाज 2018 की उस चर्चित घटना की याद भी दिला गया, जब अविश्वास प्रस्ताव पर अपने भाषण के बाद वे अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास पहुंचे और उन्हें गले लगा लिया था। उस समय भी राहुल गांधी की ‘झप्पी’ संसद की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनी थी।
राहुल बोले- भारत के हाथ से निकल गया कूटनीतिक मौका
राहुल गांधी ने विदेश नीति पर हमला केवल प्रधानमंत्री की शैली तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने हालिया अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का हवाला देते हुए कहा कि भारत के पास वैश्विक स्तर पर मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अवसर था, लेकिन देश उस मौके का फायदा नहीं उठा सका। उन्होंने ईरान के साथ भारत के पुराने संबंधों और अमेरिका तथा रूस के साथ भारत के रिश्तों का उल्लेख किया। राहुल गांधी का तर्क था कि इन रिश्तों के आधार पर भारत अंतरराष्ट्रीय तनाव कम करने की कोशिश कर सकता था। उनके मुताबिक, जिस भूमिका में भारत को आगे आना चाहिए था, वहाँ पाकिस्तान ने जगह बना ली। राहुल ने सवाल उठाया कि जब भारत के पास कूटनीतिक प्रभाव और कई देशों के साथ संवाद के रास्ते मौजूद हैं, तो वह सक्रिय भूमिका में क्यों नहीं दिखाई दिया।
चीन पर भी सरकार को घेरा
राहुल गांधी ने चीन के साथ सीमा विवाद का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन ने भारतीय सैनिकों की पेट्रोलिंग को लेकर प्रतिबंध लगाए और सरकार ने इस पूरे मामले को पर्याप्त गंभीरता से सामने नहीं रखा। उन्होंने गलवान घाटी की घटना के बाद प्रधानमंत्री के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें भारत की जमीन पर कब्जे से इनकार किया गया था। राहुल गांधी का दावा था कि बाद में सीमा पर बातचीत के दौरान चीनी पक्ष ने भारतीय नेतृत्व के उसी बयान का हवाला दिया। राहुल ने सरकार पर आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों के बजाय उसका ध्यान राजनीतिक व्यवस्था को मजबूत करने और प्रभावशाली कारोबारी समूहों के साथ संबंधों पर अधिक है। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप हैं, जिन पर सत्ता पक्ष की ओर से अलग-अलग मौकों पर जवाब दिए जाते रहे हैं।
PMO से जानकारी मिलने का दावा
अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने यह भी दावा किया कि उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय के भीतर से कई जानकारियाँ मिलती रहती हैं। उन्होंने यह दावा तो किया, लेकिन यह नहीं बताया कि ये जानकारियाँ उन्हें किस माध्यम से मिलती हैं। इस दावे ने भी राजनीतिक बहस को हवा दी है, क्योंकि राहुल गांधी ने अपने संबोधन में सरकार के भीतर कथित असंतोष और अंदरूनी गतिविधियों का भी उल्लेख किया।
‘इस्तीफा देने तक सोने नहीं देंगे’
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर भी तीखा राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने कहा कि विपक्ष सरकार के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेगा और जब तक दोनों नेता अपने पदों से इस्तीफा नहीं देते, तब तक उन्हें राजनीतिक दबाव से राहत नहीं मिलेगी। राहुल ने अपने भाषण में कहा कि विपक्ष का मकसद सरकार को लगातार घेरना है और वह पीछे हटने वाला नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री को लेकर दावा किया कि वे इन दिनों चैन से नहीं सो पा रहे हैं।
अमित शाह को लेकर भी निशाना
गृह मंत्री अमित शाह पर हमला बोलते हुए राहुल गांधी ने उनके राजनीतिक कद और संसद में उनकी मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अमित शाह को कभी चाणक्य तो कभी सरदार पटेल जैसी उपमाएँ दी जाती रही हैं, लेकिन संसद में उनकी गैरमौजूदगी को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। राहुल ने दावा किया कि सरकार पहली बार जनता के दबाव और विरोध की ताकत को महसूस कर रही है। उन्होंने छात्र आंदोलनों और अपने हालिया प्रदर्शनों का भी जिक्र किया।
पत्रकारों और पुलिसकर्मी का भी किया जिक्र
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री आवास के बाहर हुए प्रदर्शन का जिक्र करते हुए एक पुलिसकर्मी से हुई बातचीत की बात कही। उन्होंने दावा किया कि पुलिसकर्मी ने उन्हें वहाँ से हटने के लिए कहा था। उन्होंने कुछ पत्रकारों के साथ कथित निजी बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि कई पत्रकार उनसे यह स्वीकार करते हैं कि देश में जो कुछ हो रहा है, वह उन्हें भी सही नहीं लगता, लेकिन नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखने से बचते हैं। राहुल ने इसे अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक अधिकारों के बड़े सवाल से जोड़ते हुए कहा कि देश में लोगों को अपनी बात कहने का अधिकार मिलना चाहिए।
BJP ने खोला मोर्चा
राहुल गांधी की टिप्पणी के बाद बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रियाएँ तेजी से सामने आईं। निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के बयान और मंच पर उनके अंदाज पर सवाल उठाया। बीजेपी की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विदेशी नेताओं के साथ पुराने वीडियो और तस्वीरें भी साझा की गईं और राहुल गांधी की आलोचना की गई। स्मृति ईरानी ने भी राहुल गांधी का नाम लिए बिना सोशल मीडिया पर तंज कसा। उन्होंने अभद्र व्यवहार और राजनीतिक मर्यादा को लेकर निशाना साधा। वहीं, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े ने राहुल गांधी की टिप्पणियों को अशोभनीय बताते हुए कहा कि विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे गंभीर विषयों पर राजनीतिक संवाद में गरिमा बनाए रखना जरूरी है।
धामी बोले- भाषा दिन-ब-दिन खराब हो रही
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राहुल गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की भाषा दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। धामी ने प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए इस्तेमाल की गई भाषा पर आपत्ति जताते हुए इसे राजनीतिक शालीनता के खिलाफ बताया। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक राजनीति में असहमति की जगह है, लेकिन भाषा की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
चिराग पासवान ने भी जताई नाराजगी
बिहार में भी राहुल गांधी के बयान को लेकर NDA नेताओं ने मोर्चा खोल दिया। जदयू के संजय कुमार झा ने राहुल गांधी पर राजनीतिक मर्यादा की सीमा पार करने का आरोप लगाया। वहीं, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उम्र में राहुल गांधी से बड़े हैं और उनके लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है। चिराग ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार का विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन विरोध के दौरान भाषा की सीमा नहीं टूटनी चाहिए। उनके मुताबिक, लोकतंत्र की ताकत तर्क, संवाद और विचारों की टकराहट में है, व्यक्तिगत अपशब्दों में नहीं।
NDA नेताओं के निशाने पर राहुल
राहुल गांधी की टिप्पणी को लेकर सत्ता पक्ष की प्रतिक्रियाओं में एक बात समान रही—विरोध की राजनीति के बावजूद प्रधानमंत्री और संवैधानिक पदों की गरिमा बनाए रखने की जरूरत। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने राहुल गांधी के तेवरों को हताशा और निराशा से जोड़ते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की आलोचना करते समय भी राजनीतिक संवाद की एक सीमा होनी चाहिए। बीजेपी नेताओं ने राहुल के बयान को व्यक्तिगत हमले की राजनीति बताते हुए कांग्रेस पर भी निशाना साधा। दूसरी ओर, राहुल गांधी के भाषण का व्यापक संदेश सरकार की विदेश नीति, चीन सीमा विवाद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज को लेकर विपक्ष के हमले के रूप में सामने आया है।
विवाद अब सिर्फ ‘झप्पी’ तक सीमित नहीं
राहुल गांधी के मंच पर संदीप दीक्षित को गले लगाने वाला दृश्य भले ही इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित हिस्सा बन गया हो, लेकिन उनके भाषण का दायरा इससे कहीं बड़ा था। विदेश नीति, ईरान, चीन, सीमा सुरक्षा, संसद, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की भूमिका, छात्र आंदोलन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—राहुल ने कई मुद्दों को एक ही मंच से उठाया। सत्ता पक्ष ने जवाब में राहुल गांधी की भाषा और व्यवहार को मुद्दा बनाया है। ऐसे में आने वाले दिनों में बहस इस बात पर केंद्रित रह सकती है कि राजनीतिक विरोध की सीमा कहाँ तक होनी चाहिए और विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषयों पर सियासी कटाक्ष की स्वीकार्य मर्यादा क्या है। फिलहाल इतना साफ है कि मंच पर दिखाई गई राहुल गांधी की ‘झप्पी’ ने एक पुराने राजनीतिक प्रसंग की याद ताजा करने के साथ-साथ नई सियासी बहस को जन्म दे दिया है। विदेश नीति पर शुरू हुई यह बहस अब राजनीतिक भाषा, मर्यादा और विपक्ष-सत्ता के रिश्तों तक पहुंच चुकी है।





